राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक से लेकर अब तक के सभी यानि छहों संघ प्रमुखों के साथ जिन्होंने न केवल कार्य किया हो अपितु जीवंत संपर्क व तादात्म्य भी रखा हो ऐसे स्वयंसेवक संभवतः दो-पाँच भी नहीं होंगे। आदरणीय माधव गोविंद वैद्य ऐसे ही सौभाग्यशाली स्वयंसेवक थे। उनके देहांत पर अपने शोकसंदेश मे सरसंघचालक मोहनराव जी भागवत ने कहा – “अब बड़ी दुविधा होगी कि सलाह लेने किसके पास जायें?” यह कथन स्व. वैद्य जी के महत्व व भूमिका को स्पष्ट कर देता है।
स्व. एमजी वैद्य का निजी, पारिवारिक और सामाजिक जीवन संघ के संस्कारों का प्रतिबिंब था। उनके पुत्र श्रीराम वैद्य जो की प्रचारक होकर वर्तमान मे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विदेश कार्य को देखते हैं, नागपूर के महाविद्यालय में शिक्षारत थे; ने एक बार अपने महाविद्यालय में आवेदन देकर अपना शिक्षा शुल्क माफ करवा लिया। जब कुछ महीनों तक श्रीराम वैद्य ने अपने पिता से महाविद्यालय शुल्क हेतु राशि नहीं मांगी तो स्व. श्री वैद्य ने अपने बेटे से पूछा की कई दिन हो गए तुमने फीस हेतु पैसे नहीं मांगे तब राम वैद्य ने बताया की उन्होंने महाविद्यालय प्रशासन से अपनी फीस माफ करवा ली है। इस बात पर स्व. एमजी वैद्य बड़े नाराज हुये और उन्होंने आगे ऐसा करने हेतु मना किया और तुरंत महाविद्यालय को एक पत्र लिखा – “मैंने फीस की व्यवस्था पूर्व से ही बनाकर रखी हुई है और अब महाविद्यालय प्रशासन न केवल फीस माफी रद्द कर मेरे पुत्र से फीस ले बल्कि जो विलंब शुल्क बनता है वह भी साथ में ले। शुचिता, आत्मसम्मान व शुद्ध आचरण के ऐसे विशिष्ट आग्रही थे आदरणीय मा. गो. वैद्य।
संघ जो कि अपने प्रचार व आत्मप्रशंसा से मीलों दूर रहता है, ने देश में हुई कई विशिष्ट घटनाओं व विशेषतः 1992 की बाबरी विध्वंस की घटना के पश्चात समाज में अपनी भूमिका का स्पष्ट संदेश देने हेतु एक प्रचार विभाग के गठन की आवश्यकता आभास की। जब इस प्रचार विभाग का गठन हुआ तब मा. गो. वैद्य इस प्रचार विभाग के प्रथम प्रमुख यानि प्रवक्ता बने। सार्वजनिक जीवन वाले लोग व जनता से सीधे जुड़े हुये संगठन सामान्यतः प्रेस के लोगों के साथ बड़े ही विशाल हृदयता के साथ पेश आते हैं व उनके प्रति आग्रही व आकर्षण भाव को भी रखते हैं। स्व. श्री वैद्य इसके एकदम विपरीत थे। एक बार किसी बड़े राष्ट्रीय समाचार पत्र के पत्रकार ने स्व. श्री वैद्य से चर्चा हेतु समय मांगा, तो दोपहर 3 बजे का समय तय हो गया।
नियम के थे पक्के
हुआ कुछ यूं कि वह पत्रकार आधा घंटा विलंब से 3.30 पर पहुंचा तो श्री एमजी वैद्य ने मिलने से मना कर दिया और स्पष्ट कहा कि समय 3 बजे का तय था अतः अब चर्चा नहीं होगी। पत्रकार अवाक और हतप्रभ हो गया की सार्वजनिक जीवन में प्रचार की भूख वाले लोगों के मध्य ऐसा भी कोई व्यक्ति या संगठन हो सकता है। खैर, दूसरे दिन हेतु पुनः मिलने का समय पांच बजे का तय हुआ। दूसरे दिन वह पत्रकार समय पूर्व चार बजे ही आ गया, तब श्री मा. गो. वैद्य चाय पीते हुये स्वच्छंद भाव से कुछ पढ़ रहे थे। पत्रकार ने कहा कि लीजिये आज मैं समय पूर्व ही आ गया हूँ और आप भी फ्री हैं तो चर्चा कर लेते हैं, किंतु श्री वैद्य तो किसी और ही मिट्टी के बने हुये थे, उन्होंने दृढ़तापूर्वक उस पत्रकार से कहा कि जो समय नियत है उसी पर चर्चा होगी, आप या तो पांच बजे तक यहीं एक घंटा समय व्यतीत करें या जाकर पुनः पांच बजे आ जाएं।
समय व जीवन प्रबंधन के ऐसे कठोर आग्रही थे वे। यह समय प्रबंधन उनकी जीवन शैली मे मृत्युपर्यंत झलकता रहा। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे अंतर्मुखी, अंतर्तत्वी व अन्वेषी संगठन के प्रवक्ता की भूमिका सरल नहीं थी, वह भी तब जब आपके पास प्रवक्ता की भूमिका की कोई पिछली परंपरा या आदर्श नहीं था। श्री मा. गो. वैद्य को संघ के प्रवक्ता के निरापद, सर्वदा सापेक्ष किंतु सदैव निरपेक्ष भूमिका निर्वहन करने का अग्निपथ मिला था। उस कालखंड मे देश विभिन्न झंझावातों मे घिरा था व राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय मीडिया प्रतिदिन संघ से बड़े ही उलझन भरे प्रश्न पूछता रहता था। श्री एमजी जानते थे की इस अग्निपथ पर यदि वे झुलसे तो वे अकेले नहीं अपितु समूचा संगठन चोटिल होगा। इस अग्निपथ पर न केवल वे चले बल्कि निर्बाध, निर्विघ्न, निर्विकार चले। अपनी ऊर्जावान दायित्व यात्रा को यशस्वी बनाया उन्होने और एक उदाहरण प्रस्तुत कर दिया। इसे श्री वैद्य की पुण्याई या परीक्षा भी कह सकते हैं कि संघ के इस कंटकाकीर्ण प्रचारप्रमुख का दायित्व उनके दूसरे प्रचारक पुत्र श्री मनमोहन वैद्य को वहन करने का अवसर मिला।
कहना न होगा कि श्री एमजी वैद्य के पुत्र एम एम वैद्य जो कि संघ के प्रचारक भी हैं; ने भी अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुये इस दायित्व को सार्थक किया और आज वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सह सरकार्यवाह की भूमिका में शोभायमान हैं। द्वितीय पुत्र श्री राम वैद्य भी अपने प्रचारक जीवन में वर्तमान विश्वविभाग में यूरोप क्षेत्र कार्य देख रहे हैं। साहित्य सृजन हेतु वे अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से भी किसी भी प्रकार समय निकाल ही लेते थे। उनकी पुस्तक “हिन्दुत्व” का हिंदी व मराठी में प्रकाशन हुआ। इसी तरह हिंदू संगठन, हिंदू हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र (मराठी), शब्दांच्या गाठीभेटी (मराठी ), राष्ट्र, राज्य आणि शासन (मराठी), ज्वलन्त प्रश्न- मूलगामी चिंतन , रविवार चा मेवा (मराठी), काश्मीर -समस्या व समाधान (मराठी व हिंदी), आपल्या संस्कृतीची ओळख (मराठी), अभिप्राय (मराठी), राष्ट्रीयत्वाच्या सन्दर्भात -हिन्दू, मुसलमान व ख्रिस्ती (मराठी), शब्ददिठी शब्दमिठी (मराठी), मेरा भारत महान (मराठी, हिन्दी व अंग्रेजी), काल, आज आणि उद्या (मराठी व हिन्दी), संघबंदी, सरकार आणि श्रीगुरुजी (मराठी), धर्मचर्चा, सुबोध संघ (मराठी व हिन्दी), ठेवणीतले संचित, विचार विमर्श, तरंग भाष्यामृताचे, रंग माझ्या जीवनाचे, मैं संघ में मुझमें संघ, (हिंदी आत्मवृत्त) आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजे गए थे गोविंद वैद्य जी
श्री मा. गो. वैद्य को महाराष्ट्र सरकार का ‘महाकवि कालिदास संस्कृत साधना पुरस्कार, राष्ट्रसन्त तुकडोजी जीवनगौरव पुरस्कार, डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान, का ‘बौद्धिक योद्धा’ सम्मान, राजमाता विजयाराजे सिंधिया पत्रकारिता सम्मान, श्यामरावबापू कापगते स्मृति प्रतिष्ठान का ‘जीवन गौरव व राष्ट्रसेवा’ पुरस्कार, गणेश शंकर विद्यार्थी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार, महाराष्ट्र विधानमंडल का कृतज्ञता सम्मान, नागपुर श्रमिक पत्रकार संघ का लोकमान्य तिलक पत्रकारिता पुरस्कार, कविगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय का ‘महामहोपाध्याय’ सम्मान, मुंबई पत्रकार संघ का जीवन गौरव पुरस्कार जैसे कई अन्य सम्मान व पुरस्कार प्रदान किए गए हैं।
8 वर्ष की अल्पायु में बने स्वयंसेवक
आठ वर्ष की अबोध बालक की आयु से 97 वर्ष की आयु तक संघ की शाखा जाने वाले व्रती स्वयंसेवक रहे वे। संभवतः यही कारण रहा कि वे विपरीत ध्रुवों पर भी चैतन्य रहे। मिशनरी कालेज हिस्लाप में उन्होंने दीर्घ समय तक नौकरी की किंतु कभी भी नौकरी की आड़ में अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं पर आंच नहीं आने दी। बाद में वे नरकेसरी प्रकाशन नागपूर के प्रमुख बने व “तरुण भारत” समाचार पत्र का संपादन करते हुये उसे शीर्ष पर पहुंचाया।
जो लोग संघ की भीतरी व्यवस्थाओं को समझते हैं उनके लिए स्व. एमजी वैद्य एक आश्चर्यमिश्रित श्रद्धा का केंद्र थे, क्योंकि गृहस्थ रहते हुये इतने निर्विकार भाव से संघकार्य करते रहना एक बड़ा ही दुष्कर, दुरूह व दुर्गम कार्य था, जिसे उन्होंने न केवल किया अपितु बड़े ही परिष्कृत व अनुकरणीय रीति, नीति पद्धति से किया। गृहस्थ होते हुये संघकार्य किस प्रकार करना इस विषय के वे “संदर्भग्रंथ” बन गए हैं।
11 मार्च 1923 को जन्में श्री वैद्य का जीवन गृहस्थ तपस्वी का, संघकार्य में अटूट निष्ठा का व निस्पृह साधना का रहा। यह भी सुखद संयोग व आश्चर्य ही है कि 19, दिसंबर की दोपहर जब 97 वर्ष की आयु में श्री एमजी वैद्य का देहांत हुआ तब उसी समय पर उनकी प्रस्तावना वाली एक ऐसी पुस्तक का विमोचन हो रहा था जिसमें परमपूजनीय ससंघचालक मोहनराव जी भागवत के 17 भाषण संकलित किए गए हैं।











