चीन ने भारत की सरहद के ठीक सटकर हाल में युद्धाभ्यास किया है। इसमें अत्याधुनिक हथियारों के साथ पाकिस्तान के साथ संयुक्त रूप से किया गया यह अभ्यास बताया तो गया दोनों देशों की सेनाओं में बेहतर तालमेल विकसित करने के लिए था, लेकिन कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि बात इतनी भर नहीं है। कम्युनिस्ट चीन के पैंतरे और बर्ताव कुछ अलग ही दास्तां बयां करते हैं। भारत की सीमा से सटकर जो भाव दिखाया गया है वह संकेत कर रहा है कि चीन किसी ‘तैयारी’ में है।
भारत के लिए यह चीन और पाकिस्तान से जुड़ी यह सैन्य गतिविधि कोई नियमित युद्धाभ्यास नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक संकेत है। और इसे इसी रूप में शायद लिया भी जा रहा है। कारण? चीन की पीएलए की वेस्टर्न थिएटर कमांड और पाकिस्तानी सेना द्वारा किया गया संयुक्त सैन्य अभ्यास “वॉरियर IX” दो दिन पहले खत्म हुआ है। हुआ। इस अभ्यास को क्या भारत उसके ‘घोषित उद्देश्य’ ‘क्षेत्रीय शांति और स्थिरता’ मानकर ही नहीं बैठा रह सकता।
“वॉरियर IX” चीन और पाकिस्तान के बीच होने वाले युद्धाभ्यास आदि की लगातार चली आ रही कड़ी है, जिसमें दोनों सेनाएं संयुक्त ऑपरेशन, आतंकवाद-रोधी अभियान, पर्वतीय युद्ध और समन्वय क्षमता का अभ्यास करती हैं। दो दिन पहले खत्म हुए इस अभ्यास में पर्वतीय और कठिन भौगोलिक क्षेत्र में युद्ध की तैयारियों पर विशेष जोर दिया गया था। त्वरित हरकत में आना, हवाई परिवहन और लॉजिस्टिक मदद की क्षमता का भी परीक्षण किया गया। दोनों सेनाओं ने संयुक्त योजना, कमांड और नियंत्रण सिस्टम और संचार की जमकर परख की।

जैसा पहले बताया, चीनी सेना का आधिकारिक बयान इस अभ्यास को ‘क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बनाए रखने की क्षमता’ का परीक्षण बताता है, लेकिन व्यावहारिकता से आंके तो यह बयान कूटनीतिक भाषा बोलता प्रतीत होता है, जो असली रणनीतिक उद्देश्यों को छुपाने का काम करती मालूम देती है।
ध्यान रहे, भारत, चीन और पाकिस्तान—तीनों परमाणु हथियारों से लैस देश हैं और इनकी सीमा विवाद व संघर्ष की लंबी पृष्ठभूमि है। ऐसी स्थिति में चीन–पाकिस्तान संयुक्त सैन्य अभ्यास स्वाभाविक रूप से भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय बनता ही है। कई संकेत मिले हैं जो बताते हैं कि यह युद्ध अभ्यास अप्रत्यक्ष रूप से भारत के लिए सावधान रहने का संकेत है।
इसके कई कारण हैं। जेसे, चीन की वेस्टर्न थिएटर कमांड वही रणनीतिक मोर्चा है जो भारत के खिलाफ ऑपरेशन के लिए जिम्मेदार मानी जाती है, खासकर लद्दाख और अरुणाचल जैसे क्षेत्रों में यही कमांड सबसे पहले हरकत में आती रही है। पाकिस्तान की सेना भारत के पश्चिमी मोर्चे पर शरारतें करती ही रहती है। जब यही सेना चीन के साथ मिलकर अभ्यास करे तो भारत को दो मोर्चा से युद्ध की आशंका बनती है।
अभ्यास के नाम पर दोनों सेनाएं एक-दूसरे की प्रक्रियाओं, कम्युनिकेशन सिस्टम और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता के साथ तालमेल बिठा रही हैं, जो हो सकता है भविष्य की किसी संयुक्त या समन्वित दबाव की तैयारी हो। इसलिए, भले ही आधिकारिक स्तर पर इसे शांति और स्थिरता जैसे जुमलों में ढकने का प्रयास किया गया हो, लेकिन इसकी सामरिक भाषा भारत के लिए दबाव और संदेश, दोनों है।
विशेषज्ञों की चिंता का एक बड़ा कारण यह भी है कि पीएलए ने भारतीय सीमा से सटकर एक ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर बना लिया है और तैनाती की क्षमता विकसित कर ली है कि जरूरत पड़ने पर बहुत कम वक्त में उसके सैनिक और हथियार बड़ी तादाद में सीमा के पास पहुंचाए जा सकते हैं।
इसके लिए चीन ने सीमा के निकट हर मौसम में कारगर सड़कें, पुल, सुरंगें और रेलवे पटरियां तैयार कर ली हैं। कई एयरबेस और एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड बना लिए हैं, जहां से लड़ाकू जेट, ड्रोन और मालवाहक विमान संचालित हो सकते हैं। अग्रिम मोर्चों के नजदीक स्थायी सैनिक छावनियां, गोला-बारूद और ईंधन भंडारण की क्षमताएं हासिल की जा चुकी हैं।
कूटनीतिक स्तर पर चीन–पाकिस्तान की नजदीकी, चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और ग्वादर जैसे प्रोजेक्ट पहले ही भारत के लिए चिंता का विषय हैं, जिन पर इस तरह के सैन्य अभ्यास एक अतिरिक्त दबाव का काम करते हैं। भारतीय सेना को भी अपनी त्वरित तैनाती क्षमता, उच्च ऊंचाई पर युद्ध की तैयारी, लॉजिस्टिक सपोर्ट और टेक्नोलॉजी (ड्रोन, सैटेलाइट, साइबर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर) पर विशेष ध्यान बनाए रखना होगा।
भारत ने लद्दाख, पूर्वी लद्दाख, अरुणाचल और पूर्वोत्तर में सड़क–रेल–हवाई संपर्क बढ़ाने, नए पुल और सुरंग बनाने, और अतिरिक्त सैनिक तैनात करने जैसे कदम उठाए ही हुए हैं। इसके साथ ही, भारत ने दूसरे देशों के साथ जिनमें क्वाड के अमेरिका, फ्रांस आदि भी शामिल हैं, के साथ रक्षा साझेदारी और युद्ध अभ्यास बढ़ाए हैं।

















