जिन्ना का देश भारत दूसरी तरफ के जिस पड़ोसी से इन दिनों ‘मजहबी भाईचारा’ निभाते हुए ज्यादा करीब हो रहा है, वह भी उसके जितना ही कंगाल हो चला है। दोनों की नदीकी से यह हालत तो होनी ही थी। अक्खड़ और साजिशी दिमाग वाले पाकिस्तानी नेताओं की संगत अब बांग्लादेश की यूनुस सरकार पर जमकर असर दिखाने लगी है। हालत यह हो गई है कि पाकिस्तान की तरह अब ढाका के खजाने में भी सरकारी कर्मचारियों की पगार देने लायक पैसे नहीं हैं और गुस्साए कर्मचारी वित्त विभाग के अधिकारियों को ही बंधक बना रहे हैं। इन्हीं दोनों ‘मजहबी हमजोली’ देशों के दिमाग से बौराए नेताओं ने एक और थोथा शिगूफा छोड़ा है, ‘सार्क’ की तर्ज पर ऐसा कोई गुट बनाया जाए, जिसमें भारत शामिल न हो। भारत से ऐसा खौफ! इसी खौफ के चलते अब बांग्लादेश के विदेश सलाहकार तौहीद हुसैन का बयान आया है कि उनका देश ऐसे ‘गुट’ में जुड़ने को तैयार है।
डार ने छेड़े तार
दरअसल, यह शिगूफा कुछ दिन पहले, पाकिस्तान के विदेश मंत्री और उप प्रधानमंत्री इशाक डार ने छोड़ा था। तुर्की के उकसावे पर उछल रहा पाकिस्तान अब ‘खलीफा’ बनने के सपने पाल रहा है। वह अगुआ दिखना चाहता है इसलिए ऐसे गुट के जुमले उछालता रहा है जिसमें भारत सदस्य न हो। इस पुकार को बांग्लादेश की भारत से दुर्भावना पाले बैठी वर्तमान यूनुस सरकार ने सुना और अपनी हामी भेज दी।

इस तथाकथित क्षेत्रीय ‘गठजोड़’ को लेकर जिस प्रकार के बयान सामने आए हैं, वे दक्षिण एशिया की राजनीतिक और कूटनीतिक नजारे में एक साजिशी पहल की संभावनाएं दिखाते हैं। यह बेशक, पाकिस्तान की पारंपरिक भारत विरोधी रणनीति और समझ से उपजी बात है। पाकिस्तानी नेता इशाक डार का पिछले दिनों आया बयान बांग्लादेश, चीन और पाकिस्तान के मेल से एक ‘त्रिपक्षीय गुट’ की बात करता है। डार का कहना है कि इस प्रकार का गठजोड़ इस क्षेत्र की आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा जरूरतों को ‘बेहतर’ तरीके से पूरा कर सकेगा। कैसे? इसका कोई ठोस खाका पाकिस्तानी नेता ने सामने नहीं रखा। वैसे भी कोई ठोस नीति या योजना बनाना कूटनीति में अपरिपक्व उन नेताओं के वश की बात है भी नहीं।
उस तथाकथित पाकिस्तानी प्रस्ताव के जवाब में बांग्लादेश के विदेश सलाहकार तौहीद हुसैन का बयान भी गौर करने लायक है। वे कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ एक नया क्षेत्रीय गुट बनाया जा सकता है जिसमें भारत शामिल ना हो। यानी बांग्लादेश की ‘हां’ है। याद रहे, यह उस बांग्लादेश का विदेश ‘सलाहकार’ कह रहा है जिसकी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कोई पूछ नहीं है। लेकिन इससे बांग्लादेश की वर्तमान सरकार की भारत विरोधी सोच एक बार फिर से सामने आई है। जबकि एक तरफ यूनुस बार बार यह बयान उछालते रहे हैं कि ‘भारत के साथ उनके देश के संबंधों का अपना खास मायने रखते हैं।’
उल्लेखनीय है कि ‘सार्क’ यानी दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन की स्थापना 1985 में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, मॉलदीव और अफगानिस्तान के बीच हुई थी। ‘सार्क’ का उद्देश्य क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग बढ़ाना, कारोबारी सहूलियत और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए संवाद को बढ़ावा देना है।
पाकिस्तान की शरारतें
हालांकि, ‘सार्क’ उतना कामयाब नहीं रहा क्यों पाकिस्तान ने इसमें सदा भारत विरोध की भूमिका ही रखी है, भारत के साथ राजनयिक तनाव बनाए रखे हैं। भारत की अगुआई वाले इस संगठन में सामूहिक रूप से सभी सदस्यों के हितों का संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण ही रहा है।
इसमें संदेह नहीं है कि आज दुनियाभर में क्षेत्रीय संगठन तेजी से उभर रहे हैं। यूरोशियाई आर्थिक संघ, आसियान, अफ्रीकी संघ आदि में सदस्य देशों ने साझा आर्थिक, सुरक्षा और राजनीतिक सहयोग में प्रगति की है। लेकिन इन संगठनों में सदस्यों की राजनीतिक और आर्थिक सामंजस्यता बनी रही है। ‘सार्क’ में पाकिस्तान की ‘फांस’ हर कदम पर रोढ़े अटकाती आ रही है।
अब तीन देशों के ‘सार्क’ की बात करके पाकिस्तान की मंशा शायद क्षेत्रीय संतुलन को अपने पाले में करने की हो तो उसमें आश्चर्य नहीं। खासकर यदि यह भारत को अलग रखकर कोई ‘गुट’ बनाता है तो खुद को कूटनीति और रणनीति का ‘माहिर’ ही समझेगा। और अब बांग्लादेश, जो ‘सहकारी वित्त नियोजन के विशेषज्ञ’ यूनुस की कमान में वित्तीय संकट झेल रहा है, पाकिस्तान की भारत विरोधी चाल को सराह रहा है तो इसके पीछे के संकेत भी साफ दिखते हैं। ये ‘दक्षिण एशियाई सहयोग’ के नाम पर मजहबी ‘ब्रदरहुड’ बढ़ाने की कवायद तो नहीं!
आका चीन की आड़
पाकिस्तान की बात करें तो वह बंटवारे के बाद से ही भारत से दुश्मनी पाले बैठा है। चार युद्धों में बुरी तरह पिटने के बाद भी दुनिया में आतंकवाद के पोषक के नाते अपने दामन पर लगे कलंक को गहरा करवा रहा है। वह दुनिया में भारत का तेज उभार बर्दाश्त कर ही नहीं सकता। इसलिए किसी न किसी बहाने भारत के प्रभुत्व को चुनौती देने की कोशिश करता है। चीन उसका आका बना हुआ है, जिसके कारण उसे रोटी खाने के पैसे मिलते रहे हैं। आज के भू राजनीतिक परिदृश्य में बांग्लादेश का साथ पाकर उसका क्या ही भला होगा, यह कूटनीति का कोई छात्र भी बता सकता है।

बांग्लादेश की बात करें तो एक तरफ वह भारत के साथ अपने ‘गहरे आर्थिक और सांस्कृतिक रिश्तों’ को महत्व देता है, लेकिन शेख हसीना के इस्तीफे के बाद से, सुर पाकिस्तान के सुर में ही मिलाता आ रहा है। तौहीद हुसैन का बयान उनके मन में पल रहे भारत विरोध को स्पष्ट करता है। लेकिन क्या वह ऐसा भारत विरोधी रुख अपनाकर देश के लिए दिक्कतें नहीं खड़ी कर रहे हैं? इस पर ढाका में बैठी मौजूदा सरकार को सोचने की जरूरत है।
तौहीद को शायद मालूम होगा कि भारत जैसे शक्तिशाली पड़ोसी के साथ से उनके देश की अर्थव्यवस्था को बल मिलता रहा है, व्यापार, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में भारत के किए कार्यों की वजह से। इसलिए वे किसी भारत से इतर किसी ‘गुट’ की व्यावहारिकता को जरूर तोल लें तो ये उनके देश के भले में ही होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि साजिश रचने में माहिर पाकिस्तानी नेताओं की क्षेत्रीय शक्ति समीकरण को बदलने की मंशा कहीं दक्षिण एशिया में ‘सहयोग’ के नाम पर कोई नया संकट न पैदा कर दे। यह क्षेत्र में कोई नया राजनीतिक तनाव न पैदा कर दे। यूं भी चीन के कंधों पर चढ़कर पाकिस्तान ने दुनिया में शांति और विकास से जुड़ी कोई बात तो न पहले कभी की है, न निकट भविष्य में उसके ऐसा करने का कोई संकेत ही दिखता है।
















