महिलाओं पर पाबंदियों को लेकर चर्चा में रहने वाला ईरान एक बार फिर से चर्चा में है। इस समय ईरान की राजधानी (तेहरान) एक गंभीर संकट का सामना कर रही है। वहां केवल बारिश की ही खबरें अंग्रेजी और स्थानीय मीडिया में चल रही हैं।
बात यह कि परमाणु हथियारों का जखीरा होने के बाद खलीफा होने की आकांक्षा हो, मगर जब कुदरत बताए कि हुक्म आखिर चलता किसका है, या हुकूमत किसकी है, तो ऐसे में लोगों को समझ नहीं आता कि आखिर किया क्या जाए?
क्या है मामला?
ईरान में सरकार जहां चेता रही है कि पानी नहीं है तो वहीं मस्जिदों के इमाम सामूहिक नमाज पर जोर दे रहे हैं और यह भी कह रहे हैं कि बारिश हो, इसके लिए सब दुआ करें, नमाज पढ़ें। ईरान में नवंबर में केवल 1 मिलीमीटर बारिश हुई और यह सदियों में होने वाली एक घटना है। राजधानी में सालाना औसत बारिश लगभग 350 मिमी होती थी, लेकिन पिछले पांच वर्षों से पर्याप्त वर्षा नहीं हो रही है। ईरान में बर्फ की जो चादर छाती थी, वह पूरे देश में पिछले वर्ष की तुलना में 98.6% तक कम हो चुकी है और तेहरान में दैनिक तापमान 20 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया है, जोकि आम बात नहीं है। बारिश न होने से वहां कई समस्याएं हो रही हैं।

ईरान के राष्ट्रपति की चेतावनी
पिछले ही दिनों ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने चेतावनी दी कि अगर सर्दी से पहले बारिश नहीं होती है तो तेहरान को खाली भी करना पड़ सकता है। राजधानी में जो पाँच बांध जलापूर्ति करते हैं, उनमें से एक सूख चुका है और अन्य बांध भी क्षमता से कम हैं। पूरे देश में कमोबेश यही हालात हैं। पिछले 57 वर्ष की तुलना में इस साल लगभग 40% तक बारिश कम हुई है। इसलिए इमामों ने कहा कि बारिश के लिए सामूहिक रूप से नमाज पढ़ी जाए और नवंबर में ऐसा ही किया गया। मस्जिदों में नमाज पढ़ी गई कि बारिश हो। महिलाएं बुर्के में थीं और उन्होंने इस्लामी रवायतों के अनुसार ही पुरुषों से अलग जगह पर नमाज पढ़ी।
इस्लामी कानूनों का पालन न करने पर मिल रही सजा
जहां ईरान में बारिश न होने के कारण लोगों को परेशानी हो रही है तो वहीं कुछ लोगों का कहना है कि ऊपर वाला उन्हें इसलिए सजा दे रहा है क्योंकि इस्लामी कानूनों का पालन नहीं हो रहा है। गार्डिअन के अनुसार कुछ लोग यह कह रहे हैं कि इस सजा के माध्यम से ऊपरवाला कुछ पैगाम भेज रहा है। असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स के एक कंज़र्वेटिव सदस्य, अयातुल्ला मोहसेन अराकी ने ईरान की सड़कों पर खुलेआम होने वाली अय्याशी” और सूखे के बीच कनेक्शन बताया है। ईरान इंटरनेशनल इंग्लिश ने एक्स पर अराकी का बयान लिखा था। और कहा था कि यह इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकार अनिवार्य हिजाब को कड़ाई से लागू नहीं करवा पाई!
ग्रैंड अयातुल्ला जवादी अमोली ने चेतावनी दी: “कभी-कभी तहजीब से जुड़ी समस्याएं, सामाजिक कमियाँ, और पाप दया का आधार छीन लेते हैं।” कुछ सांसदों ने ईरान की सरकार पर यह आरोप लगाए कि चूंकि सरकार ने संसद द्वारा पारित “अनिवार्य हिजाब” का कानून कड़ाई से लागू नहीं करवाया है, इसलिए यह सूखा पड़ रहा है। इस पर राष्ट्रपति के समर्थकों ने पूछा कि फिर ऐसा क्यों है कि उस यूरोप में, जहां पर महिलाएं सिर खोल सकती हैं, वहाँ पर इतनी हरियाली क्यों है?
पर्यावरण पर काम करने वाले ईरान से निष्कासित
ऐसा नहीं है कि ईरान में ये समस्याएं आज पैदा हुई हैं। दरअसल वहाँ पर कई वर्षों से समस्याएं हो रही थीं। पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले कावेह मदानी बताते हैं कि कैसे उनसे कहा जाता था कि वे “वाटर बैंगक्रप्टी अर्थात पानी के क्षेत्र में दीवालिया होना” जैसे शब्दों का प्रयोग न करें। उन्होंने कहा कि जब पर्यावरण कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई होनी शुरू हुई थी तो उन्हें भी देश छोड़ना पड़ा था, और वर्तमान में वे कनाडा में यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट फॉर वाटर एनवायरमेंट एंड हेल्थ के प्रमुख हैं। लोग अब अजीब से सवाल पूछ रहे हैं। जैसे कि “क्या बादल वास्तव में चोरी हो गए हैं? क्या डीजल जलाने से बारिश नहीं हो रही है?”
सार्वजनिक रूप से नमाज को लेकर मीडिया में चुप्पी
एक बात जो हैरान करती है, वह यह कि बारिश न होने को लेकर जहां पर्यावरण से संबंधित कदम किसी भी सरकार द्वारा उठाए जाने चाहिए, तो वहीं ईरान में लोगों से कहा जा रहा है कि वे नमाज पढ़ें। मगर वामपंथी मीडिया इस घटना को लेकर एक प्रतिशत भी आलोचनात्मक नहीं है, जितना वह भारत में हिंदुओं की परंपराओं को लेकर होता है।
हर छोटी-छोटी भारतीय परंपरा का उपहास उड़ाने वाला वामपंथी मीडिया यह तो बताने में लगा है कि ईरान में बारिश के लिए दुआ करते हुए लोग रो रहे थे, मगर उसने यह नहीं लिखा कि “क्या दुआओं से बारिश होगी?” जैसी वह अक्सर भारतीय परंपराओं को लेकर लिखता रहता है?

















