आज अगर नई पीढ़ी के जो भी युवा बच्चे टीवी और सोशल मीडिया पर धर्मेन्द्र के निधन की खबरें और उन पर बन रहे स्पेशल शो देख-पढ़ रहे होंगे, उन्हें ये जानकर हैरानी हो सकती है कि उनकी किसी भी मूवी को ना तो फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था और ना ही उनकी किसी मूवी को नेशनल अवॉर्ड के ही लायक समझा गया। बावजूद इसके जिस मूवी में वो होते थे, उनके बड़ा कोई स्टार होता ही नहीं था, और ना ही एक्टर।
आप सुपर स्टार्स के नाम सुनेंगे तो अक्सर लाइन से दिलीप कुमार, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के नाम आते हैं। इन सभी को अलग-अलग वक्त में फिल्मी दुनिया का नंबर 1 अभिनेता बोला गया है, सुपरस्टार बोला गया है। लेकिन धर्मेन्द्र तो अमिताभ से भी 9 साल पहले इस इंडस्ट्री में आए थे और पिछले साल ही उनकी एक फिल्म रिलीज हुई है। उनका तो एक ऐसा दौर था, जो 70 साल से हर सुपरस्टार के समानांतर चल रहा था।
पहले अभिनेता जो टैलेंट हंट के जरिये फिल्मों में आए
ऐसे में ये हैरानी स्वाभाविक है कि उन्हें फिल्म फेयर ने किसी फिल्म के लिए किसी साल सर्वश्रेष्ठ अभिनेता क्यों नहीं चुना? उस पर जब आपको ये पता चले कि धर्मेन्द्र इस इंडस्ट्री के पहले अभिनेता थे, जो टैलेंट हंट के जरिए फिल्मी दुनिया में आए थे। वो तो लुधियाना के अपने गांव में रह रहे थे, अध्यापक पिताजी से पढ़ने से ज्यादा फिल्मों में दिमाग लगाने के चलते काफी मार खाते थे। ऐसे में टैलेंट हंट का विज्ञापन आया तो पिताजी ने भी मजाक में हां कर दिया कि जा आजमा कर खुद को देख ले। तब के धरम सिंह देयोल को भी नहीं पता था कि इस प्रतियोगिता के विजेता वही होंगे। फिल्मों को लेकर उनकी दीवानगी भी आम नहीं थीं, सुरैया की एक मूवी तो वो 40 बार देखकर आए थे।
उन्हें फिल्म फेयर और यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स द्वारा आयोजित इस टैलेंट हंट में ‘फ्रेश फेस ऑफ द ईयर’ का खिताब मिला और इनाम में मिली फिल्म अर्जुन हिंगोरानी की ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’, इस मूवी में उनके साथ कुमकुम और बलराज साहनी थे। 4 लाख के बजट वाली मूवी के लिए कहा जाता है कि उन्हें बस 51 रुपए मिले थे, लेकिन फिल्म फेयर ने उन्हें इंडस्ट्री में लांच तो किया, लेकिन कभी कोई अवॉर्ड नहीं दिया। जबकि उन्हें फिल्म फेयर में 6 बार नॉमिनेट किया गया था, 4 बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए, ये फिल्मे थीं फूल और पत्थर, मेरा गांव मेरा देश, यादों की बारात और रेशम की डोरी। इनसे पहले एक बार ‘आई मिलन की बेला’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता और सबसे आखिर में ‘नौकर बीवी का फिल्म’ में सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार के लिए नॉमिनेट किया गया था। आखिर में उन्हें 1997 में फिल्म फेयर ने लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार देकर इतिश्री कर ली।
दिलों में राज करने वाले धरम पाजी को किसी अवॉर्ड की जरूरत भी नहीं
कांग्रेस की सरकारों में भी कभी उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों या पद्मश्री के लिए उपयुक्त नहीं समझा गया। उनके खाते में बस एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार है, जो उन्हें सनी की फिल्म ‘घायल’ के प्रोडयूसर होने के नाते मिला था, अभिनय के लिए नहीं। वरना जिन लोगों ने ‘शोले’ और ‘चुपके चुपके’ जैसी फिल्में देखी होंगी, वो खुद जान सकते हैं कि अमिताभ के मुकाबले वो कहां थे। जब हेमा मालिनी राजनीति में बीजेपी के साथ उतरीं तो धर्मेन्द्र भी चले आए, बीजेपी की टिकट पर बीकानेर से सांसद बने, लेकिन उनको जल्द समझ आ गया कि राजनीति उनके बस की बात नहीं, सो दोबारा मैदान में नहीं उतरे। कांग्रेस सरकार को भी लगा होगा कि अब तक उन्होंने धरमजी की अनदेखी की थी, 2012 में उनको पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। लेकिन धरम अपने में ही मगन रहने वाले बंदे थे, अपना फार्म हाउस पर काम करना और रोज नए नए दिलचस्प शेर रचना, इसी में उनका मन लगता था।
लेकिन सच यही है कि कोई भी अवॉर्ड या कोई भी नंबर धर्मेन्द्र की जो इज्जत है, उसकी व्याख्या नहीं कर सकता। किसको याद है कि 1969 से लेकर 1975 तक लगातार उन्होंने 18 सुपरहिट फिल्में दी थी और 5 साल में से तीन साल उनकी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सबसे ज्यादा कमाई की थी। 1971 में ‘मेरा गांव मेरा देश’, 1973 में ‘जुगनू’ और 1975 में ‘शोले’ भी. कितने लोगों को याद है कि 70 के दशक में एक वक्त ऐसा भी आया था कि धर्मेन्द्र फिल्मों में सबसे ज्यादा पैसे लेने वाले अकेले अभिनेता बन गए थे, राजेश खन्ना को भी पीछे छोड़कर। भले ही वो समय सालों नहीं चला, लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता का पता चलता है।
रोल और डायलॉग हैं अमर
लोगों को याद रहते हैं तो उनके रोल… शोले का वीरू, धरमवीर का धरम, फूल और पत्थर का शक्ति, दिल ने फिर याद किया और अनुपमा का अशोक, सत्यकाम का सत्यप्रिय, मेरा गांव मेरा देश का अजीत, लोफर व पत्थर और पायल का रंजीत, यादों की बारात और पॉकेटमार का शंकर, चुपके चुपके का डॉ परिमल त्रिपाठी, राम बलराम का राम, बंटवारा का सुमेर सिंह औऱ तहलका के मेजर धरम सिंह लोग आसानी से भूलते नहीं है. उनके यादगार रोल्स पर भी कई फिल्में अलग से बन गईं, जैसे वीरू दादा आदि।
हां लोगों को उनके रोल के अलावा जो नहीं भूलेगा वो हैं उनके अमर डायलॉग्स। जब पिछली बार उनकी मृत्यु की गलत खबर मीडिया में चली तो लोगों ने उसके मीम्स भी उनके ही डायलॉग्स से बनाए थे, ‘गांव वालो अब मरना कैंसल’, इलाका कुत्तों का होता है शेरों का नहीं, हम तो वो बला है जो शीशे को पत्थर से तोड़ दे आदि।
आसान नहीं था उनके लिए काजल की कोठरी में जाकर भी बिना काजल लगाए वापस आना। वो इतने दिनों तक इतनी बड़ी फिल्मों में काम करते रहे, फिर भी उनको गाली देने वाले लोग आपको नहीं मिलेंगे। वो राजनीति में आए और वापस भी चले गए, लेकिन उनके दुश्मन नहीं मिलेंगे। उन्होंने फिल्मों में रहते हुए कभी कोई कैम्प नहीं बनाया और ना ही किसी कैम्प के हिस्सा बनकर रहे। कम फिल्में और ज्यादा उम्र के बावजूद राजेश खन्ना की तरह उनको किसी विवाद ने छुआ तक नहीं। दो-दो परिवारों को बिना किसी बड़े झगड़े के साथ लेकर चलना आसान था क्या?
सम्मान और सलीका किसी से सीखना है, तो धरम पाजी से सीखिए
तभी तो लोग उनके बारे में कहते हैं कि सम्मान और सलीका किसी से सीखना है, तो धरम पाजी से सीखिए। ये भी सीखिए कि नई प्रतिभा को भी सम्मान दिया जाए। ‘दिल आशना है’ के जरिए जब शाहरूख खान को हेमा मालिनी लांच कर रही थीं, तब धर्मेन्द्र ने कहा था कि ये तो ‘इंगलिश एक्टर जैसा है, बहुत ऊपर जाएगा’। कभी धर्मेन्द्र को विदेशी मैगजीन ने दुनिया के टॉप 10 आकर्षक मर्दो की सूची में रखा था। बॉलीवुड के ही-मैन धर्मेन्द्र ने ऐसे समय दुनिया को अलविदा कहा जब 13 दिन बाद उनका जन्मदिन है और 17 दिन बाद उनकी सबसे चर्चित फिल्म ‘शोले’ पुराने क्लाइमेक्स के साथ नए रूप में रिलीज होने जा रही है, IFFI में उसका गाला प्रीमियर हो रहा है।















