बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की प्रचंड विजय के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो बड़े दावे किये। पहला यह कि “हो सकता है कांग्रेस का एक और बड़ा विभाजन हो।” दूसरा यह कि “बिहार ने, बंगाल में, भाजपा की जीत का रास्ता भी बना दिया है।” नरेंद्र मोदी, बिहार के नतीजों के बाद, भाजपा मुख्यालय में पार्टी के कार्यकर्ताओं को सम्बोधित कर रहे थे।
एन.डी.ए. ने चुनाव प्रचार में जनता के सामने अपने पांच घटक दलों को “पांडव” बताकर प्रस्तुत किया था। इशारा साफ था कि वह एक ‘धर्मयुद्ध’ लड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री ने, अपने शुक्रवार के सम्बोधन में कहा कि लोकतंत्र की जननी, बिहार की भूमि, ने ये साबित कर दिया है कि “झूठ हारता है।”
कांग्रेस को परजीवी करार दिया
ऐतिहासिक विजय के बाद, तीखा प्रहार करते हुए, नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को “परजीवी” करार दिया, जो अपने सहयोगी दलों के वोट निगलना चाहती है। मोदी ने कहा कि कांग्रेस और राजद का झगड़ा अब “खुल कर” सामने आने वाला है। प्रधानमंत्री ने, कांग्रेस को, “एम.एम.सी.” नाम देते हुए, विस्तार से समझाया कि ये “मुस्लिम लीगी और माओवादी कांग्रेस” है। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के अंदर एक अलग धड़ा पैदा हो रहा है जो “नामदारों” से बेहद निराश है।
रेड कॉरिडोर की दिलाई याद
माओवादी हिंसा के दौर में कुख्यात ‘रेड कॉरिडोर’ की याद दिलाते हुए पी.एम. ने कहा कि “आतंक के वो दिन इतिहास बन गए हैं।” मोदी ने स्मरण कराया कि उन दिनों माओवादी प्रभावित क्षेत्र में वोटिंग दोपहर 3 बजे समाप्त हो जाती थी। इस चुनाव में वोटिंग केवल “दो चरणों” में हुई, और वो भी 5 बजे शाम तक। लोगों ने “एक उत्सव की तरह वोट दिया है।”
जंगलराज पर पीएम का प्रहार
उन्होंने जंगल राज से आज की तुलना की और कहा कि उन दिनों “सरे आम मतदान केंद्रों पर हिंसा होती थी। मतपेटियां लूटी जाती थीं। आज वही बिहार रिकॉर्ड मतदान कर रहा है। शांतिपूर्ण मतदान कर रहा है।” वर्ष 1995 में, डेढ़ हजार से ज़्यादा पोलिंग बूथों पर रीपोलिंग हुई थी। वर्ष 2000 में, करीब डेढ़ हज़ार बूथों पर फिर से चुनाव कराना पड़ा था। लेकिन इस चुनाव में एक भी बूथ पर दोबारा पोलिंग की नौबत नहीं आयी।
एमवाई की नई परिभाषा
नरेंद्र मोदी ने कहा कि “बिहार के लोगों ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।” बिहार ने 2010 के बाद का सबसे बड़ा जनादेश एनडीए को दिया है। मुस्लिम-यादव, यानी MY, के सन्दर्भ में पी.एम. ने कहा कि “एक पुरानी कहावत है, लोहा लोहे को काटता है।” बिहार में कुछ दलों ने तुष्टिकरण वाला MY, फार्मूला बनाया था। “पर आज की इस जीत ने एक नया सकारात्मक MY फार्मूला दिया है, और ये है महिला और यूथ।”
मोदी-नीतीश की जोड़ी का चला जादू
प्रदेश की राजनीति को समझने वाले विश्वास के साथ कह सकते हैं कि बिहार में जो हुआ है वो तो होना ही था। मोदी-नीतीश की जोड़ी ने ये साबित कर दिया है कि नेता और जनता के बीच का भरोसा कितना बड़ा जादू कर सकता है। बिहार का मतदाता मूल रूप से इतना परिपक्व है कि वह धर्म और अधर्म के बीच अपने विवेक से फैसला करने में माहिर है।
जनता के सामने एक तरफ़ 1990 से 2005 तक के लालू काल के जंगल राज की यादें थीं। दूसरी तरफ नीतीश कुमार के पिछले 20 साल का सुशासन। वोटर की ओर से सबसे बड़ा सन्देश यह है कि उसे जंगल राज से सख़्त एलर्जी है। और वो उन लोगों को बिलकुल भी मौक़ा देने को तैयार नहीं है जो खुद करोड़ों रुपये की चोरी के केसों में ज़मानत पर बाहर हैं।
न्याय और अन्याय के बीच निर्णय देने में जनता ने सामूहिक रूप से यह व्यक्त किया है कि लालू यादव के 15 साल के जंगल राज के दौरान जो युवाओं और व्यवसायियों का प्रदेश से पलायन हुआ था, उसकी माफ़ी नहीं मिल सकती।
नीतीश ने विकास की रेखा खींची
नीतीश कुमार के शासन के दौरान जो सड़कों का अभूतपूर्व निर्माण हुआ है, उसने गाँव से शहर से जोड़ा, बच्चों को स्कूल और कॉलेज से जोड़ा, और किसान को बाज़ार से जोड़ा। एम्बुलेंस को गरीब ग्रामीणों तक पहुंचाया, और निर्धन रोगियों को गावों से अस्पतालों तक पहुंचाने का साधन बनाया। अब डॉक्टर गांव में जाकर इलाज करते हैं।
नीति और अनीति के बीच फैसला करते समय जनता ने इस बात को ध्यान में रखा कि लालू के जंगल राज में भय का माहौल ऐसा था कि उद्यमी प्रदेश छोड़ कर भाग रहे थे। निवेश आने का तो सवाल ही कहाँ था? आज उद्यमी भी लौट रहे हैं, निवेश भी आ रहा है, और बिहार में रोज़गार भी बढ़ रहे हैं।
महिलाओं को मिली सुरक्षा
सदाचार और दुराचार के विषय पर निर्णय लेते वक़्त जनता ने याद रखा कि जंगलराज में महिलायें सबसे अधिक प्रताड़ित थीं। मोदी-नीतीश काल में महिलाओं को सुरक्षा तो मिली ही, साथ में 1 करोड़ 41 लाख महिलाओं को 10-10 हज़ार रुपये की “सीड मनी” दी गयी जिस से वो अपना मनचाहा रोज़गार शुरू कर सकें। वो भी इस आश्वासन के साथ कि जो महिलायें और अधिक प्रोत्साहित करने के योग्य पायी जाएंगी, उन्हें 2-2 लाख रुपये तक की धन राशि और दी जायेगी अपने उद्यम को आगे बढ़ाने के लिए। जैसी उम्मीद थी, वैसा ही हुआ। एन.डी.ए. को वोट देने में महिलाएं सबसे आगे रहीं।

















