देहरादून जिले के जौनसारी चकराता क्षेत्र की सीमा से लगे देवघार खत के सैंज तराणु में 48 साल बाद दिवाली का पारंपरिक त्योहार मनाया गया। हाथों में चीड़ की लकड़ी से बने हौले (मशाल) लेकर ढोल बाजे के साथ बड़ी संख्या में लोग दीपावली के लोक उत्सव को मनाने नवनिर्मित शेडकुडिया महाराज मंदिर प्रांगण में एकत्र हुए। अरसे बाद दिवाली के जश्न का उत्साह देखते ही बना। ग्रामीणों ने देवता के दरबार में लोक नृत्य की प्रस्तुति से सामाजिक खुशहाली की कामना की। मंदिर प्रांगण में पूरी रात नाच गाने का दौर चला। मंदिर में पूजन के लिए हनोल से महासू देवता का डोरिया लाया गया। सोमवार और मंगलवार शाम को ग्रामीणों ने जनजातीय समुदाय की संस्कृति के अनुरुप होलियाच के साथ दिवाली का परंपरागत जश्न मनाया।
जौनसार बावर की नौ खतों से जुड़े करीब सौ गांवों में लोक मान्यता एवं परंपरा के अनुरुप दीपावली में लोक उत्सव का जश्न पांच दिन चलता है। देवघार खत के सैंज तराणू में शेडकुडिया महाराज का प्राचीन मंदिर है। सैंज तराणू पंचायत के करीब 105 ग्रामीण परिवारों और सरकारी कर्मचारियों के सहयोग से कुछ समय पहले शेडकुडिया महाराज के नए मंदिर का निर्माण पहाड़ी शैली एवं वास्तुकला के हिसाब से किया गया। 30 मई से चार जून तक नए मंदिर की विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा की गई। शिखा पूजन के बाद रायगी मंदिर से शेडकुडिया महाराज की पालकी 48 वर्ष बाद बरवांश की पूजा अर्चना को नवनिर्मित मंदिर में विराजमान हुई थी। वर्ष 1977 के बाद देवता बरवांश की पूजा को प्रवास यात्रा पर नवनिर्मित मंदिर में विराजमान हुए। लोक मान्यता एवं परंपरा के अनुसार दीपावली में प्रसिद्ध महासू मंदिर हनोल से देवता का डोरिया पूजन के लिए लाया गया।
देवता की आज्ञा से नवनिर्मित मंदिर सैंज तराणू में साढ़े चार दशक बाद दिवाली मनाई गई। सोमवार व मंगलवार शाम को स्थानीय लोग ढोल रणसिंघे के साथ नाचते गाते होलियाच लेकर मंदिर प्रांगण में एकत्र हुए। बड़ी संख्या में जुटे ग्रामीणों ने चीड़ लकड़ी से बने हौले (मशाल) लेकर मंदिर प्रांगण में पूरी रात लोक नृत्य की प्रस्तुति से देवता की स्तुति की। स्थानीय लोगों ने परंपरागत तरीके से दिवाली का जश्न मनाया। महिलाओं व पुरुषों ने अलग अलग टोली में ढोल बाजे एवं हारुल के साथ तांदी नृत्य की प्रस्तुति से समा बांधा। अरसे बाद सैंज तराणू में दिवाली का परंपरागत जश्न मनने से लोगों का उत्साह देखते ही बना। क्षेत्र में पांच दिवसीय दीपावली के लोक उत्सव में पहले दिन जीशपिशा, दूसरे दिन रणदियाला व तीसरे दिन औंसा रात को पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ होलियाच के साथ दीवालिका परंपरागत जश्न मनाया गया। चौथे दिन बिरुडी का त्योहार मनाया गया। सामाजिक सौहार्द के प्रतीक बिरुड़ी में स्थानीय महिलाओं व पुरुषों ने एक दूसरे को अखरोट व धान की चिवड़ा मूडी भेंट की। पांचवें दिन जंदोई मेले में काठ से निर्मित हाथी नृत्य की प्रस्तुति के साथ दीपावली का समापन हुआ।
लंबे अंतराल के बाद सैंज तराणू में दिवाली मनाने को बाहर से नौकरीपेशा लोग बच्चों के साथ पैतृक गांव आए। घरों में महिलाओं ने मेहमान नवाजी को कई तरह के स्थानीय पकवान बनाए। सैंज तराणू में दीपावली को देखने आसपास क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। लोक संस्कृति के जानकारों ने समाज की नई पीढ़ी को पुरातन संस्कृति की विशेषता एवं महत्ता बताई।

















