हमारी संस्कृति में गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं, उसी प्रकार गौमाता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। गौमाता के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन पूजा की परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है। हिंदू धर्मावलंबी इस दिन घर के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली, चावल, फूल दही तथा तेल का दीपक जलाकर पूजन करते हैं। फिर गोवंश (गाय-बैल) को स्नान कराकर फूल माला, धूप, चन्दन आदि से उनका पूजन किया जाता है। गायों को मीठा खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है तथा प्रदक्षिणा की जाती है। उत्तर भारत खास तौरपर ब्रजमंडल में श्रद्धालु इस मौके पर ब्रजमंडल में गिरिराज गोवर्धन पूजा-प्रदक्षिणा भी करते हैं।
अहंकार विसर्जन का पर्व
यह पर्व वस्तुत: अहंकार विसर्जन का पर्व है। द्वापर युगीन इस पर्व का शुभारम्भ भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के मान-मर्दन के लिए किया था। इसके पीछे के रोचक पौराणिक कथानक से तमाम लोग भली भांति परिचित हैं। द्वापर युग में गोवर्धन पूजा से पूर्व ब्रजमंडल में देवराज इंद्र के पूजन की परम्परा थी मगर श्रीकृष्ण ने उस विधान को बदल कर उस गोवर्धन पर्वत के पूजन की परम्परा डाली जिसको अपनी कनिष्ठका पर धारणकर उन्होंने इंद्र के कोप से बृजवासियों की रक्षा की थी। कृष्ण के इस नवीन बदलाव के पीछे दो उद्देश्य थे पहला इन्द्र के अहंकार का नाश और दूसरा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना। होता यही है जब कोई क्रांतिकारी व्यक्ति समाज मे बदलाव लाता है तब रूढ़िवादी लोग इसे स्वीकार नहीं करते। अहंकारी लोगों को वह बदलाव नहीं पचता। कुछ ऐसा ही हुआ था ब्रज में। इन्द्र ने मूसलाधार बारिश कर दी। तब गोवर्द्धन को अंगुली पर उठाकर कृष्ण ने इन्द्र की प्रलयकारी वर्षा बेअसर कर दी। जब इंद्रदेव का अहंकार टूटा तो उन्होंने कृष्ण से माफी मांगी। भगवान ने इंद्र को माफ किया। इंद्र का अभिमान चूर होता देख प्रसन्न हुई गौ माता ने अपने दुग्ध से भगवान का अभिषेक किया और गोवर्धन भी भगवान के इस नवीन कृत्य से द्रवीभूत हो उठे। तब श्रीकृष्ण ने कृपा कर अपना करकमल उस पर रखा, तब से गोवर्द्धन की महिमा बढ़ गयी।
प्रकृति संरक्षण का मूल भाव
दरअसल गोवर्धन पूजा के पीछे भगवान श्री कृष्ण का प्रकृति संरक्षण का मूल भाव निहित है। गोवर्धन पूजा इस बात का प्रतीक है कि पर्वत प्रकृति का श्रंगार हैं। पहाड़ों से वर्षा होती है। पहाड़ों से वन पनपते हैं। पहाड़ों से हजारों नदियां निकलती हैं जो हमें शुद्ध जल देती हैं। सार रूप में कहें तो पहाड़ों के बिना हमारा जीवन व्यर्थ है। आज जिस तरह समूची दुनिया पर्यावरण प्रदूषण से कराह रही है। आधुनिक मशीनों से पहाड़ काटे जा रहे हैं। हम इन पहाड़ों पर कूड़ा कचरा और प्लास्टिक फैला कर पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं। ऐसे में गोवर्द्धन पूजा से हमें स्वच्छता और प्रकृति प्रेम का दिव्य संदेश मिलता है। भगवान कृष्ण ने गोकुल वासियों को तर्क दिया था कि गोवर्धन पर्वत हमारे गोधन का संवर्धन एवं संरक्षण करता है, जिससे पर्यावरण भी शुद्ध होता है। इसीलिए गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की भी पूजा की जाती है। यूं तो गोवर्धन ब्रज की छोटी पहाड़ी है, किन्तु इसे गिरिराज (अर्थात पर्वतों का राजा) कहा जाता है।
इसे यह महत्व इसलिए प्राप्त है क्यूंकि यह भगवान कृष्ण के समय का एकमात्र स्थिर अवशेष है। द्वापर युग की यमुना नदी जहां समय-समय पर अपनी धारा बदलती रही है, वहीं गोवर्धन अपने मूल स्थान पर ही अविचलित रूप में विद्यमान है।
गोवर्धन पर्वतों का राजा और हरि का प्यारा
बल्लभ सम्प्रदाय के उपास्य देव श्रीनाथ जी का प्राकट्य स्थल होने के कारण इसकी महत्ता और बढ़ जाती है। गर्ग संहिता में इसके महत्व का कथन करते हुए कहा गया है – गोवर्धन पर्वतों का राजा और हरि का प्यारा है। इसके समान पृथ्वी और स्वर्ग में कोई दूसरा तीर्थ नहीं है। यद्यपि वर्तमान काल में इसका आकार-प्रकार और प्राकृतिक सौंदर्य पूर्व की अपेक्षा क्षीण हो गया है,फिर भी इसका महत्व कदापि कम नहीं हुआ है। मान्यता के अनुसार दीपावली के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नंदगाव से आकर गोवर्धन की सप्त कोसीय परिक्रमा लगायी थी, इसलिए दीपावली के दिन हजारों श्रद्धालु इस पर्व को मनाने यहां आते हैं और गोवर्धन परिक्रमा करते हैं। वर्तमान के अत्याधुनिक समाज में भी ये पौराणिक परम्पराएं हमें प्रकृति प्रेम की अनुपम प्रेरणा देती हैं।
माता यशोदा ने कान्हा को लगाया था छप्पन भोग
गोवर्धन पूजा के दौरान छप्पन भोग बना कर भगवान को भोग लगाये जाने की भी परम्परा है। अन्नकूट पूजा का यह उत्सव मन्दिरों में सामूहिक रूप से भी मनाया जाता है। इस अन्नकूट उत्सव के आयोजन के पीछे एक अत्यंत रोचक पौराणिक प्रसंग है। कहा जाता है कि माता यशोदा रोज अपने लाडले लाल को आठ बार भोग लगाती थीं। मगर गोवर्धन धारण के दौरान वे सात दिन बिना कुछ खाये पिये निराहार रहे। जब संकट टला तो माता यशोदा तथा ब्रजवासियों से मिलकर ने सात दिन की कसर एक दिन में ही पूरी कर दी। सात दिन के आठ भोग का हिसाब लगा 56 व्यंजन का भोग कान्हा को लगाया गया। तभी से अन्नकूट उत्सव की परम्परा पड़ गयी।
गोविन्द की उपासना के विभिन्न तरीकों में एक अहम सेवा अन्नकूट सेवा भी मानी जाती है। ‘श्रीमदभागवत’ के एकादश स्कंध में अन्नकूट के विषय में उल्लेख मिलता है- यद्धदिष्टतम लोके यच्चापि प्रियमात्मन:। ततन्निवेदयान्महन्म ।। अर्थात प्रकृति में मौजूद रसों का समावेश कर श्रीकृष्ण भक्ति के सोपान में अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता है। अन्नकूट का एक अन्य अर्थ अन्न का पहाड़ भी है। कथानक है कि कान्हा ने प्रत्येक ब्रजवासी को गोवर्धन पूजा के प्रसाद के लिए सामग्री लाने को कहा था। कहते हैं कि ब्रजवासियों द्वारा लायी गयी सामग्री की मात्रा इतनी ज्यादा हो गयी कि गोवर्धन पर्वत के समानांतर अन्न का पहाड़ बन गया। अन्नकूट महोत्सव के छप्पन भोगों में प्रकृति में मिलने वाले छह रस प्रमुख रसों – कड़वा, तीखा, कसैला, अम्ल, नमकीन और मीठा का समावेश होता है। इन छह रसों का समायोजित कर छप्पन भोग बनाया जाता है। इन रसों से चोस्य (चूसने वाले), लेस्य (चाटने वाले), भोज्य (खानेवाले), चव्य (चबाने वाले), भक्ष्य (भक्षण करने वाले) और पेय (पीने वाले) 56 प्रकार के व्यंजन बनाये जाते हैं।

















