माँ लक्ष्मी व रुक्मिणी संवाद में आदर्श कुटुम्ब व्यवस्था की झलक
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माँ लक्ष्मी व रुक्मिणी संवाद में आदर्श कुटुम्ब व्यवस्था की झलक

महाभारत के दान पर्व से प्रेरित माँ लक्ष्मी और रुक्मिणी संवाद: लक्ष्मी किन घरों में निवास करती हैं? परिवार व्यवस्था, लिव-इन रिलेशन की कुरीतियाँ और हिंदू जीवन पद्धति का महत्व। दीवाली पर पढ़ें आदर्श कुटुंब निर्माण के सूत्र।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Oct 18, 2025, 11:46 am IST
in विश्लेषण
Maa lakshmi Dhanteras

प्रतीकात्मक तस्वीर

माँ लक्ष्मी व रुक्मिणी संवाद: सर्वोच्च न्यायालय ने ठीक ही कहा है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति है, जिसकी एक एक परम्परा सुव्यवस्थित जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करती है। जिस जीवन शैली को आज भारतीय जीवन पद्धति कहा जाता है उसका स्रोत हमारी परम्पराएं एवं धर्म शास्त्र हैं। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि अगर भारतीय जीवन प्रणाली के बारा जानना हो तो उपनिषदों के अध्ययन से यह सहजता से किया जा सकता है।

दिवाली महालक्ष्मी से जुड़ा पर्व है, यह विश्वास किया जाता है कि इस दिन माँ लक्ष्मी सभी घरों में प्रवेश करती हैं और जो स्थान उन्हें भा जाए वहीं पर निवास करती हैं। महाभारत में कथा है कि एक बार देवी रुक्मिणी ने महालक्ष्मी जी से पूछ लिया कि आप किस-किस घर में निवास करती हैं और कौन से घर आपको पसन्द नहीं हैं। इस पर माँ लक्ष्मी बताती हैं –

वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे, दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने।

अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे, जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्णसत्त्वे।।

स्वधर्मशीलेषु च धर्मवित्सु, वृद्धोपसेवानिरते च दान्ते।

कृतात्मनि क्षान्तिपरे समर्थे, क्षान्तासु दान्तासु तथाबलासु।।

वसामि नारीषु पतिव्रतासु, कल्याणशालासु विभूषितासु।

(महाभारत, अनु., दानपर्व 11/6,10,14)

अर्थात् :- माँ लक्ष्मी उन घरों में निवास करती हैं जहां पुरुष सौभाग्यशाली, निर्भीक, सच्चरित्र तथा कर्तव्यपरायण हैं। जो अक्रोधी, भक्त, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तत्वसम्पन्न होते हैं। धर्मज्ञ और गुरुजनों की सेवा में सतत निरत रहते हैं। जिन घरों की महिलाएं ऐसी हों कि जिनको देख कर सबका मन प्रसन्न हो जाता है, जो शीलवती हों, सौभाग्यवती हों, गुणवती,  पतिपरायणा, सबका मंगल चाहने वालीं, सद्गुण सम्पन्न हों, माँ लक्ष्मी उनके घरों में निवास करती हैं।

लक्ष्मी किन पुरुषों को छोड़ चली जाती हैं –

नाकर्मशीले पुरुषे वसामि, न नास्तिके सांकरिके कृतघ्रे।

न भिन्नवृत्ते न नृशंसवर्णे, न चापि चीरे न गुरुष्वसूये।।

चाल्पतेजोबलमसत्त्वमाना:, क्लिशयन्ति कुप्यन्ति च यत्र तत्र।

न चैव तिष्ठामि तथाविधेषु, नरेषु संगुप्तपमनोरथेषु।।

(महा. अनु. दानपर्व 11/7-8)

अर्थात् :- जो पुरुष अकर्मण्य, नास्तिक, वर्णसंकर, कृतघ्र, दुराचारी, क्रूर, चोर तथा गुरु जनों के दोष देखने वाले हों, उनके घर में माँ लक्ष्मी निवास नहीं करती। जिनमें तेज, बल, सत्व और गौरव की मात्रा बहुत थोड़ी है, जो हर बात में खिन्न हो उठते हैं, जो मन से दूसरा भाव रखते हैं और ऊपर से और दिखते हैं ऐसे मनुष्यों के घरों में लक्ष्मी निवास नहीं करतीं।

लक्ष्मी को कौन सी महिलाएं पसन्द नहीं –

प्रकीर्णभाण्डामनवेक्ष्यकारिणीं,

सदा च भर्तु: प्रतिकूलवादिनीम्।

परस्य वेश्माभिरतामलज्जा, मेवंविधां तां परिवर्जयामि।

पापामचोक्षामवलेहिनीं च, व्यपेतधैर्यां कलहप्रियां च।।

निद्राभिभूतां सतं शयाना। मेंविधां तां परिवर्जयामि।

(महाभारत दान पर्व)

अर्थात् :- जो महिलाएं अपने घर के सामान की चिन्ता नहीं करतीं, बिना सोचे-विचारे काम करती हैं, पति के प्रतिकूल बोलती हैं, पराए घर से अनुराग रखती हैं, निर्लज्ज पापकर्म में रुचि रखने वाली हैं, अपवित्र चटोरी हैं, अधीर, झगड़ालू तथा सदा सोने वाली हैं ऐसी स्त्रियों के घर को लक्ष्मी छोड़ जाती है।

हमारी इन परम्परागत चर्चाओं के बीच एक सच्चाई यह भी है कि आज का युवा वर्ग शादी जैसे पारिवारिक बन्धनों से मुक्त हो सहचर्य जीवन (लिव इन रिलेशन) की ओर आकर्षित हो रहा है। यह लिखते हुए भी लज्जा महसूस हो रही है कि गत समय सार्वजनिक तौर पर कुछ सिलेब्रेटीज ने यह कहा कि शादी से पहले ‘टेस्ट ड्राईव’ (शारीरिक आनन्द) लेने में कोई बुराई नहीं। इसके विपरीत कुछ धर्माचार्यों ने अपनी बात कही तो हमारे बुद्धिजीवियों का एक वर्ग व उनका पूरा ईको सिस्टम देश की परम्परा व रिती रिवाजों को विस्मृत कर न केवल इन सेलेब्रिटीज की हां में हां मिलाने लगा बल्कि धर्माचार्यों को खलनायक के रूप में पेश किया जाने लगा।

लिव इन जैसी कुरितियों के दुष्परिणाम

यह ठीक है कि निजता के नाम पर पश्चिमी जगत् की लिव इन जैसी कुरीती को देश में वैधानिक मान्यता मिलती जा रही है परन्तु यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस नई व्याधि के दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। महिलाओं की हत्या कर उन्हें कुक्कर में पकाने, शादी के दो दिन बाद ही पति या पत्नी की हत्या जैसी बातें सामान्य होती जा रही हैं। नई जीवन शैली में और भी बहुत कुछ ऐसा गलत हो रहा है जिसका जिक्र करना भी शर्मनाक लगता है।

हमारी परिवार व्यवस्था न केवल प्रमाणिक मानी जाती है बल्कि यह हमारी संस्कृति का आधार स्तम्भ भी है। पारिवारिक मर्यादा में रह कर भी हम जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं तो भटकने से क्या लाभ? माँ लक्ष्मी व रुक्मिणी संवाद में आदर्श कुटुम्ब व्यवस्था निहित है। इसी मार्ग पर चल कर ही हम सुखी, समृद्ध व स्वस्थ परिवार और इन गुणों से सम्पन्न समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।

Topics: आदर्श परिवार व्यवस्थाDiwali Mahalakshmi pujaमहाभारत दान पर्व लक्ष्मीहिंदू जीवन पद्धति उपनिषदलिव इन रिलेशन दुष्परिणामदीवाली महालक्ष्मी पूजाMother Lakshmi Rukmini dialogueLakshmi residence storyideal family systemMahabharata charity festival Lakshmiमाँ लक्ष्मी रुक्मिणी संवादHindu way of life Upanishadलक्ष्मी निवास कथाill effects of live in relationship
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