गाजा में इस्राएल—हमास के बीच युद्धविराम अभी पूरी तरह अमल में नहीं आया है कि पाकिस्तान—अफगानिस्तान सीमा पर एक नया मोर्चा खुलता दिख रहा है। एक दिन पहले अफगान फौज ने पाकिस्तान के ढेरों सैनिकों को ढेर करके एक कड़ा संकेत दिया है। 50 से ज्यादा सैनिक और चौकियां खोने के लिए जिन्ना के देश ने अपने जख्म सालते हुए अब एक ऐसा बयान दिया है संकेत दिया है कि अभी चिंगारी बुझी नहीं है और पाकिस्तान उस इलाके में जल्दी ही कोई नई शरारत को अंजाम देने की फिराक में है।
इस्लामाबाद ने घोषणा की है कि ‘अगर अफगानिस्तान में मौजूद किसी आतंकी संगठन ने पाकिस्तान की जमीन पर हमला किया तो पाकिस्तान की सेना अफगानिस्तान के अंदर घुसकर कार्रवाई करेगी’। क्षेत्र में संघर्ष थमा हुआ है लेकिन तनाव अभी भी सुलग रहा है। अफगानियों ने जिन्ना के देश की कई चौकियां कब्जा ली हैं। जानकारों का मानना है कि यह बयान न सिर्फ पाकिस्तान की सैन्य और कूटनीतिक बौखलाहट की ओर एक इशारा है बल्कि दक्षिण एशिया में एक नई अस्थिरता के उभरने की चेतावनी जैसी भी है।
पीछे का इतिहास खंगालें तो पाकिस्तान–अफगानिस्तान संबंध दशकों से अविश्वास और टकराव भरे रहे हैं। दोनों देशों के बीच 2,600 किलोमीटर लंबी ड्यूरंड रेखा कभी भी पूरी तरह स्वीकार नहीं की गई है। पाकिस्तान इस सीमा को ‘वैध’ मानता है, जबकि अफगानिस्तान सरकार का दावा है कि यह रेखा ‘औपनिवेशिक दौर की थोपी’ गई सीमा है।
तालिबान के अफगानिस्तान पर नियंत्रण के बाद पाकिस्तान को लगता था कि काबुल में अब बैठी हुकूमत उसके इशारों पर चलेगी और वह वहां अपनी मनमानी करते हुए भारत के हितों को बाहर कर देगा। उसे लगता था कि नई अफगान सरकार तहरीके तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे गुटों पर सख्ती करेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। TTP के जिन्ना के देश पर हमले अब भी जारी हैं। कहना न होगा, टीटीपी पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां के लिए गले की फांस जैसा बना हुआ है।

दोनों के बीच ताजा तनाव तक उभरा जब गत सप्ताह अफगान-पाकिस्तान सीमा पर झड़पें हुईं, जिसमें पाकिस्तान को करारी चोट खानी पड़ी। कई सैन्य चौकियों पर अफगान बलों ने कब्जा करके पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया। यह घटना पाकिस्तान की पहले से जर्जर सैन्य छवि को और धूमिल करने वाली है। दुनिया भर के मीडिया में छपीं पाकिस्तानी झंडे में लिपटे ताबूतों की तस्वीरें जिन्ना के देश को हंसी का पात्र बना रही हैं। वह कट्टर मजहबी उन्मादी देश पहले से ही आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है।
इन हालात में पाकिस्तान का ‘अंदर जाकर कार्रवाई’ करने वाला बयान वास्तव में एक प्रकार की ‘मानसिक प्रतिक्रिया’ है, जो सिर्फ उसकी बौखलाहट ही दिखाती है। वह दिखाना चाहता है कि हालात अब भी उसके काबू में हैं, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान उसकी कमजोरी का प्रमाण है, न कि ताकत का।
उधर काबुल में बैठी तालिबान सरकार ने पाकिस्तान की इस धमकी को ‘संप्रभुता का उल्लंघन’ बताया है और कहा है कि किसी भी सीमा पार कार्रवाई को ‘युद्ध की शुरुआत’ माना जाएगा। यह चेतावनी दोनों देशों के बीच रिश्तों को और तनावपूर्ण बना रही है। तालिबान पाकिस्तान पर पहले अनेक बार आरोप लगा चुका है कि वह अपनी नाकामी का ठीकरा अफगानिस्तान पर फोड़ता है। तालिबान नेतृत्व का यह भी मानना है कि पाकिस्तान अमेरिका के दबाव में अपनी सीमाओं पर आतंकवाद के खिलाफ दिखावटी अभियान चलाता है, लेकिन असल में वह ‘दोहरी चाल’ चल रहा है।
जैसा पहले बताया, वर्तमान में पाकिस्तान कई स्तरों पर संकट में है। एक ओर आर्थिक दिवालियापन और राजनीतिक अस्थिरता है, तो दूसरी ओर देश के भीतर टीटीपी के हमलों की बढ़ती घटनाएं हैं। टीटीपी ने पिछले दो साल में पाकिस्तान के दर्जनों सैन्य ठिकानों, थानों और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले किए हैं। पाकिस्तान के लिए यह एक चुभने वाली स्थिति है। एक तरफ तो उसे तालिबान से राजनयिक संबंध बनाए रखने हैं, ताकि सीमा स्थिर रहे, तो दूसरी ओर उसे तालिबान पर दबाव बनाना है कि वह टीटीपी को काबू करे। अफगानिस्तान को धमकी देना इस संघर्ष के बीच की कूटनीतिक रणनीति है, जो उसे न तो सुरक्षा देती है, न स्थिरता।
देखने वाली बात यह भी है भारत अफगानिस्तान में मानवीय और विकास सहायता के माध्यम से अपनी उपस्थिति बनाए हुए है। अगर दोनों देशों में संघर्ष बढ़ता है, तो भारत के लिए रणनीतिक भूमिका बढ़ सकती है, लेकिन साथ ही सीमा पार आतंकवाद का खतरा भी बढ़ सकता है। उधर चीन पाकिस्तान का आका है ही, लेकिन अफगानिस्तान में अस्थिरता उसकी ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना के लिए खतरा बन सकती है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान गत कुछ दिनों से जो अमेरिका के साथ गलबहियां कर रहा है उससे जिन्ना के देश के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर बेवजह फूले हुए हैं और वह अपनी ‘ताकत’ दिखाने को बेचैन हैं। आपरेशन सिंदूर में भारत से बुरी तरह पिटे पाकिस्तान ने भारत को भी धमकियां देनी बंद नहीं की हैं।
वैसे ‘अंदर जाकर हमले’ की धमकी देना पाकिस्तान की फौज के लिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन वर्तमान हालात में यह कदम उल्टा पड़ सकता है। अफगानिस्तान अब 1990 वाला कमजोर देश नहीं, बल्कि एक संगठित तालिबान हुकूमत के नियंत्रण में है।
यदि पाकिस्तान ने वास्तव में अफगान सीमा के भीतर कार्रवाई की, तो उसे अंतरराष्ट्रीय निंदा, आर्थिक प्रतिबंध और घरेलू विद्रोह तीनों का सामना करना पड़ सकता है।

















