रेयर अर्थ मैग्नेट्स, जो इलेक्ट्रिक कारों, हवाई जहाजों के इंजनों और मिलिट्री रडार जैसी हाई-टेक चीजों के लिए बेहद जरूरी हैं, इन पर चीन ने कंट्रोल्स और सख्त कर दिए हैं। बीजिंग अब भारत से वादा मांग रहा है कि जो हैवी रेयर अर्थ मैग्नेट्स हम देते हैं, वो अमेरिका को री-एक्सपोर्ट न हों। ये सब अमेरिका-चीन के ट्रेड टॉक्स का हिस्सा लगता है, जहां चीन ये मैग्नेट्स को बारगेनिंग चिप की तरह इस्तेमाल कर रहा है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ये कदम आने वाले हाई-लेवल मीटिंग्स से ठीक पहले उठाया गया है, जैसे डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की साउथ कोरिया वाली मुलाकात।
चीन की एक्सपोर्ट रूल्स में सख्ती क्यों?
चीन दुनिया के 90% से ज्यादा प्रोसेस्ड रेयर अर्थ एलिमेंट्स और मैग्नेट्स बनाता है। ये 17 रेयर अर्थ एलिमेंट्स हाई-टेक इंडस्ट्री का दिल हैं। लेकिन अब बीजिंग ने इनके प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी पर रिस्ट्रिक्शंस बढ़ा दी हैं। खासतौर पर, डिफेंस और सेमीकंडक्टर यूजर्स को एक्सपोर्ट लिमिट करने का प्लान है। एक सोर्स ने बताया, “चीन हैवी रेयर अर्थ मैग्नेट्स पर ज्यादा टाइप्स को कवर करने वाली रूल्स ला रहा है।” ये कदम ट्रेड नेगोशिएशंस में चीन को मजबूत बनाते हैं, क्योंकि बिना इनके EVs, एयरक्राफ्ट और मिलिट्री गियर रुक सकते हैं।
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भारत से क्या वादा मांगा गया?
भारत के कंपनियों को चीन ने साफ कहा है – जो मैग्नेट्स हम सप्लाई करेंगे, वो सिर्फ लोकल यूज के लिए होंगे, अमेरिका को न भेजना। इंडियन फर्म्स ने एंड-यूजर सर्टिफिकेट्स जमा किए हैं, जिसमें वादा है कि ये मैग्नेट्स मास डिस्ट्रक्शन वेपन्स बनाने में न इस्तेमाल होंगे। लेकिन चीन यहीं रुक नहीं रहा। वो भारत से वासेनार अरेंजमेंट के मुताबिक एक्सपोर्ट कंट्रोल गारंटीज मांग रहा है। ये इंटरनेशनल एग्रीमेंट ड्यूल-यूज टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर पर ट्रांसपेरेंसी लाता है, जिसमें 42 देश शामिल हैं। भारत साइनेटरी है, लेकिन चीन नहीं। अभी तक इंडियन गवर्नमेंट ने ये रिक्वेस्ट एग्री न की है। एक इनसाइडर ने कहा, “हमारी समझ ये है कि चीन यूएस के साथ डील करना चाहता है और बिना गारंटी के सप्लाई रोक रहा है।”
अमेरिका की रिस्ट्रिक्शंस का कनेक्शनये सब अमेरिका की वजह से हो रहा है। यूएस ने चाइनीज टेक पर पाबंदियां लगाई हैं, तो चीन जवाब में रेयर अर्थ्स को हथियार बना रहा है। वो भारत जैसे देशों से डायवर्जन रोकने के लिए गारंटी लेना चाहता है, ताकि इनडायरेक्टली अमेरिका को न पहुंचे। इससे ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है, खासकर डिफेंस और हाई-टेक सेक्टर्स में। चीन की 90% प्रोडक्शन कैपेसिटी इसे लिवरेज देती है, लेकिन भारत जैसे इंपोर्टर्स को लोकल मैन्युफैक्चरिंग के लिए परेशानी हो सकती है।












