महानायक भगत सिंह: वामपंथी षड्यंत्र के शिकार? जानिए पूरी सच्चाई
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महानायक भगत सिंह: वामपंथी षड्यंत्र के शिकार? जानिए पूरी सच्चाई

महानायक सरदार भगत सिंह के विरुद्ध क्या षड्यंत्र है? किसने और क्यों किया और कर रहे हैं ? पहले आतंकवादी कहा गया अब महान् क्रांतिकारी माना जाने लगा?

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Mahak Singh
Sep 28, 2025, 01:27 pm IST
in भारत
महानायक सरदार भगत सिंह

महानायक सरदार भगत सिंह

महानायक सरदार भगत सिंह के विरुद्ध क्या षड्यंत्र है? किसने और क्यों किया और कर रहे हैं ? पहले आतंकवादी कहा गया अब महान् क्रांतिकारी माना जाने लगा? अचानक कैसे इतना लगाव हो रहा है? कितनी बड़ी विडंबना है कि हिंदी /उर्दू साहित्य का इतिहास लिखने वाले वामपंथी और कथित सेकुलर मूर्धन्य विद्वानों ने इन्हें क्रांतिकारी कवि के रूप में स्थान तक नहीं दिया? आईये जयंती पर जानते हैं ? परंतु सर्वप्रथम महान बलिदानी भगत सिंह की कालजयी रचनाएं देख लें,

1. “कमाल-ए बुजदिली है,
अपनी ही आंखों में पस्त होना।
अग़र थोड़ी-सी जुर्रत हो,
तो क्या कुछ हो नहीं सकता।
उभरने ही नहीं देतीं,
बेमायगी दिल की।
वरना कौन-सा कतरा है,
जो दरिया हो नहीं सकता।”

2. “जिंदगी तो अपने दम पर ही जी जाती है,
दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं।”

3.“इंकलाब जिंदाबाद”,और ये भी देखें,
” उसे फिक्र है,
हरदम नया तर्जे जफा क्या है,
हमें ये शौक देखें तो,
सितम की इंतिहा क्या है।
दहर से क्यों खफा रहें,
चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहां अदू(अत्याचारी, दुश्मन, बैरी) सही,
आओ मुकाबिला करें।
कोई दम का मेहमाँ हूँ,
ऐ अहले महफिल,
चिरागे शहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवा में रहेगी,
ख्याल की बिजली ,
यह मुश्ते खाक है,
फानी रहे या न रहे। ”

4. “लिख रहा हूँ मैं, जिसका अंजाम आज,
कल उसका आगाज आयेगा।
मेरे लहू का हर एक कतरा, इंकलाब लायेगा।
मैं रहूँ ना रहूँ, ये मेरा वादा है तुमसे,
मेरे बाद वतन पे मिटने वालों का सैलाब आयेगा।”

भगत सिंह को ‘आतंकवादी’ बताने की साजिश

सरदार भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर महानायक और अंग्रेजों के लिए यमदूत के समान थे। यहां उस षड्यंत्र का भंडाफोड़ किया जा रहा है कि कैसे सरदार भगत सिंह को पाश्चात्य इतिहासकारों और परजीवी इतिहासकारों ने आतंकवादी बताया तो इन्हीं के स्वरों को साधते हुए शातिर वामपंथी इतिहासकारों ने मार्क्सवादी साहित्य पढ़ने के कारण उन्हें वामपंथी चाशनी में लपेटने की कोशिश की है, जबकि ऐसा नहीं है। वामपंथियों को जब यह एहसास हुआ कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान नगण्य सा है ,तो भगतसिंह को अपनी विचारधारा में समेटने लगे और इसको अंजाम तक वामपंथी इतिहासकार विपिन चंद्रा ने पहुंचाया। जब उन्होंने सरदार भगत सिंह को क्रांतिकारी आतंकवादी बताया, परंतु इससे विवाद बढ़ गया और उनके चार सह लेखकों ने पुस्तक में संशोधन कर क्रांतिकारी समाजवादी रखना स्वीकार किया।

भगत सिंह पर वामपंथी और आयरिश क्रांतिकारियों का मिला-जुला प्रभाव

भगत सिंह पर वास्तविक प्रभाव किसका पड़ा था, यह बात इससे अच्छी तरह समझी जा सकती है कि 20 वीं सदी के दूसरे दशक में जब भगत सिंह और सहदेव, “हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन”, (HSRA ) के लिए सदस्यों को भर्ती कर रहे थे तब उसकी पहली शर्त यह होती थी, कि हर नए सदस्यों ने निकोलई बुखारीन और एवगेनी परोबरजहसंस्की की “ऐबीसी ऑफ़ कम्युनिज्म”, डेनियल ब्रीन की “माय फाइट फॉर आयरिश फ्रीडम” और चित्रगुप्त (जो एक छद्म नाम था) की “लाइफ ऑफ़ बैरिस्टर सावरकर” पढ़ी हुयी हो।

यहां यह ध्यान रखने वाला तथ्य है कि ऊपर उल्लेखित तीनों पुस्तकों में किसी के भी लेखक ,लेनिन और कार्ल मार्क्स नहीं है। साम्राजयवाद के विरुद्ध क्रांति की प्रेरणा जितनी उन्हें वामपंथियों के तौर तरीकों से मिली थी, उतनी ही उन्हें आयरलैंड के क्रांतिकारियों से मिली थी।

यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है की एच. एस. आर. ए. (HSRA) , रामप्रसाद बिस्मिल और चन्द्रशेखर आज़ाद की एच. आर. ए. (HRA) का नया स्वरूप था ,जिसका नामकरण, आयरिश रिपब्लिकन आर्मी से प्रेरित हो कर ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी’ रखा गया था। इससे पूरी तरह स्पष्ट है कि भगत सिंह और उनके साथियों का वामपंथी विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं था। ऊपर की किताबों में सबसे महत्वपूर्ण किताब चित्रगुप्त की “लाइफ ऑफ़ बैरिस्टर सावरकर” थी।

सावरकर की जीवनी

यह पुस्तक ‘विनायक दामोदर सावरकर’ की जीवनी थी जो उन्होंने छद्म नाम चित्रगुप्त के नाम से लिखी थी। इस पुस्तक को पढ़ना और समझना हर एच.एस.आर.ए.के क्रांतिकारी सदस्य के लिए अनिवार्य था। केवल यही ही नहीं , वरन् इस प्रतिबंधित पुस्तक को छपवाया और उसका वितरण भी करवाया जाता था। जब लाहौर अनुष्ठान के बाद क्रांतिकारियों की गिरफ्तारियां हुईं थी तब यही एक ऐसी किताब थी जो सारे क्रांतिकारियों के पास से जब्त की गयी थी।

अब आप लोग यह समझ सकते हैं कि क्यों कांग्रेस ने, वामपंथियों के झूठ को प्रचारित होने दिया है। कांग्रेस, हमेशा से सावरकर और भगत सिंह के बीच के सत्य को जहां दबाकर रखना चाहती थी, वहीं ‘सावरकर’ के विशाल व्यक्तित्व और उनकी आज़ादी की लड़ाई में योगदान को,दुष्प्रचार के माध्यम से कलंकित करके, राष्ट्रवादी विचारधारा को दबाये रखना चाहती थी।

स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी कवियों के साथ साहित्यिक अन्याय

भगत सिंह और उस काल के सभी क्रन्तिकारी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सावरकर जी से न केवल प्रभावित थे बल्कि ये नवजवान एक सच्चे राष्ट्रवादी थे। उनकी भारत के भविष्य को लेकर दृष्टि बिलकुल स्पष्ट थी। वो भारत को, अंग्रेजो की गुलामी से ही केवल स्वतंत्र नहीं कराना चाहते थे, वरन वो भारतवासियों के राजनैतिक के साथ,सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता का भी सपना देखते थे।

वामपंथी और कांग्रेस दोनों ने ही भारत के इतिहास का न केवल मान-मर्दन किया है बल्कि सरदार भगत सिंह ,चंद्रशेखर आजाद , सुखदेव और राजगुरु जैसे बलिदानियों का केवल अपमान किया है। विदेशी आक्रांताओं का गुणगान किया है और भारत के राष्ट्रीय नायक- नायिकाओं तथा चरित्रों की छवि धूमिल की है। अत: स्वाधीनता के अमृत काल में इनका शमन आवश्यक है।

इतिहास में महारथी भगत सिंह के साथ जो अन्याय हुआ है उसका परिहार तो हो रहा है, परंतु हिंदी /उर्दू साहित्य के इतिहास में कब महारथी रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह और अशफाक उल्ला खान को कवि के रुप सम्मिलित किया जाएगा? तो क्या यहां भी लिब्रान्डू और लाल श्वानों का षड्यंत्र रहा है? यक्ष प्रश्न है?विडंबना है!!! क्योंकि सम सामयिक रचनाओं की दृष्टि से स्वाधीनता संग्राम के मध्य इनकी कालजयी रचनाएं सर्वोत्कृष्ट हैं किंतु हिंदी साहित्य का इतिहास इस संबंध में मौन है। इनकी रचनाएं कब शालाओं और महाविद्यालय के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित होंगी?

Topics: Bhagat Singh and SavarkarConspiracy of leftist historiansBhagat singhBhagat Singh's poemsBhagat Singh the revolutionaryBhagat Singh's ideology
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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