ब्रिटेन में रह रहे अफगानी शरणार्थियों के मामले ने फिर से मीडिया का ध्यान खींचा है। कई अफगान नागरिक यह दावा करते हैं कि उन्होंने ब्रिटेन की सेना के लिए काम किया था और तालिबान की हिटलिस्ट में हैं। इसके कारण वे सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, लेकिन इस दावे पर पहले भी सवाल उठ चुके हैं।
पूर्व इंटरप्रेटर के खुलासे
स्काई न्यूज से बात करने वाले पूर्व इंटरप्रेटर ने बताया कि कई लोग तालिबान के आते ही अफगानिस्तान छोड़कर भाग गए। उन्होंने कहा कि कई लोग नकली धमकी वाले खतों और उत्पीड़न के वीडियो बनाकर ब्रिटेन में प्रवेश पाने में सफल हुए। कुछ लोग केवल एक-दो दिन के लिए ब्रिटेन की सेना में इंटरप्रेटर रहे थे, फिर भी वे शरण लेने में सफल हुए।
नकली दस्तावेज और बच्चों के आयु में हेरफेर
कई शरणार्थियों ने झूठ बोलकर अपने बच्चों को ब्रिटेन लाया और उनकी उम्र 18 वर्ष से कम दिखाई, जबकि वे बड़े थे। इसके चलते ब्रिटिश स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा पर चिंता बढ़ गई है। अफगानिस्तान में छुट्टियाँ मनाते हुए कई शरणार्थियों की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर देखी गई हैं।
तालिबान के झूठे धमकी पत्र का बड़ा व्यापार
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि तालिबान से संबंधित झूठे खत और उत्पीड़न के मामले एक बड़ा व्यापार बन चुके हैं। एक नकली खत मंगवाने में 1,000 डॉलर से 1,500 डॉलर तक खर्च आता है। कई लोगों ने तालिबान द्वारा किये जाने का झूठा दावा कर ब्रिटेन में शरण ली।
सोशल मीडिया और सरकारी प्रतिक्रिया
कुछ शरणार्थियों की अफगानिस्तान में मौज-मस्ती की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, जिससे ब्रिटेन की नागरिक सुरक्षा और सरकार की नीति पर सवाल उठे। लोग हैरान हैं कि कैसे झूठे दावों के आधार पर हजारों अफगानी नागरिकों को सरकारी खर्च पर बसाया गया।











