इंटरनेशनल ओलंपियाड ऑन एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिज़िक्स (IOAA) द्वारा आयोजित ओलंपियाड से इजराइल को प्रतियोगिता से बाहर करने के फ़ैसले के बाद भारत के वैज्ञानिक समुदाय में गहरी नाराजगी देखने को मिल रहा है. बता दें कि 11 से 21 अगस्त तक मुंबई में आयोजित इस ओलंपियाड में 63 देशों के हाईस्कूल विद्यार्थी और उनके मार्गदर्शक वैज्ञानिक शामिल हुए.
इजराइल के भाग लेने पर आपत्ति
कार्यक्रम से पहले कुछ वैज्ञानिकों व शिक्षाविदों ने IOAA बोर्ड को एक याचिका सौंपी थी. इसमें मांग की गई थी कि इजराइल को राष्ट्रीय टीम के रूप में भाग लेने की अनुमति न दी जाए. हालांकि- याचिका में यह भी कहा गया था कि इज़राइली छात्रों को व्यक्तिगत रूप से प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन वे अपने देश का झंडा या नाम लेकर न उतरें.
याचिका में कहा गया था कि गाज़ा में इज़राइल के लंबे सैन्य अभियान में अब तक 60,000 से अधिक फ़िलिस्तीनी, जिनमें हज़ारों बच्चे शामिल हैं,मारे जा चुके हैं. साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि इज़राइल ने फ़िलिस्तीन को इस ओलंपियाड में पूरी टीम भेजने से रोका है.
IOAA की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, 120 सदस्यीय बोर्ड ने इस मुद्दे पर लंबी चर्चा के बाद निर्णय लिया कि भविष्य की प्रतियोगिताओं में इज़राइली विद्यार्थी और उनके मेंटर भाग ले सकेंगे, लेकिन देश का नाम राष्ट्रीय ध्वज या अन्य पहचान चिन्हों का उपयोग निलंबित रहेगा.
भारतीय वैज्ञानिकों ने जाताया विरोध
इस निर्णय के बाद भारत के लगभग 300 वैज्ञानिकों के समूह ने तीखी आपत्ति जताई. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR), IISER, IITs, HBCSE और जेएनयू जैसे प्रमुख संस्थानों के प्रोफेसर, निदेशक और कुलपति शामिल इस समूह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा कि हम IOAA के दौरान कुछ भारतीय शिक्षाविदों के आचरण पर गंभीर चिंता और कड़ा विरोध दर्ज कराना चाहते हैं. यह प्रतिष्ठित ओलंपियाड विज्ञान, युवा प्रतिभा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का उत्सव होना चाहिए था, लेकिन कुछ अकादमिकों ने इसे अपनी वैचारिक मुहिम का मंच बना दिया.
पत्र में वैज्ञानिकों ने खासकर अनीकेत सुळे, आलोक लाढा, अशोक सेन, निस्सिम कनेकर, सुव्रत राजू, संदीप त्रिवेदी, रविंदर बन्याल और रोनक सोनी के नाम लिए और आरोप लगाया कि उन्होंने इज़राइल को निलंबित कराने के लिए अभियान चलाया. साथ ही सरकार से मांग की गई कि इन शिक्षाविदों और उनके संस्थानों के खिलाफ सख़्त और उचित कार्रवाई की जाए.
सोशल मीडिया पर भी हो रही बहस
वहीं यह विवाद अब सोशल मीडिया तक भी पहुंच गया है. एक याचिकाकर्ता वैज्ञानिक ने लिंक्डइन पर लिखे अपने पोस्ट में 300 वैज्ञानिकों के समूह की आलोचना की कि वे अपने सहयोगियों की छवि धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं, बजाय इसके कि उन्हें अकादमिक स्वतंत्रता का बचाव करना चाहिए था.

















