जिन्ना के देश के आतंक को समर्थन देने वाले Azerbaijan को नहीं मिली SCO सदस्यता, चीन की 'हां' के बाद भारत ने की थी 'ना'
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जिन्ना के देश के आतंक को समर्थन देने वाले Azerbaijan को नहीं मिली SCO सदस्यता, चीन की ‘हां’ के बाद भारत ने की थी ‘ना’

आपरेशन सिंदूर के दौरान अजरबैजान ने पाकिस्तान को सामरिक और रणनीतिक सहयोग दिया था और भारत की आलोचना की थी। यह भारत के लिए एक स्पष्ट संकेत था कि अजरबैजान उसकी सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज कर रहा है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Sep 3, 2025, 02:55 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव

अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव

जिन्ना के आतंकिस्तान देश का दोस्त अजरबैजान छटपटा रहा है और संभवत: इस ‘दोस्ती’ पर पछता रहा है। इस बार की शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में उसकी बड़ी तमन्ना थी कि इस महत्वपूर्ण गुट की सदस्यता मिल जाए, लेकिन भारत के उस प्रस्ताव पर कथित वीटो से ऐसा अवरोध लगा कि न तो पाकिस्तान उसके काम आया, न चीन। बहुपक्षीय मंच SCO पर भारत ने यदि ऐसा किया है तो यह उसके राष्ट्रीय हितों की रक्षा की रणनीति के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि भारत की ओर से इस पर अभी कोई प्रतिक्रिया देखने में नहीं आई है। लेकिन इस बात से एक बार फिर यह साफ होता है कि भारत की विदेश नीति अब स्वाभिमान और अपने मूल्यों के आधार पर चलती है।

एससीओ एक क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक सहयोग संगठन है जिसमें भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान और अनेक मध्य एशियाई देश शामिल हैं। यह मंच आतंकवाद, उग्रपंथ और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर सहयोग को बढ़ावा देता है। इस संगठन का सदस्य बनना किसी भी देश के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह उसे क्षेत्रीय निर्णयों में भाग लेने का अधिकार देता है।

भारत द्वारा अजरबैजान की सदस्यता पर वीटो लगाने के कुछ कारण तो तुरंत ध्यान में आते हैं। पहला, उसकी पाकिस्तान से निकटता। दुनिया जानती है कि अजरबैजान और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक साझेदारी है। दोनों देशों ने गत वर्षों में रक्षा, ऊर्जा और कूटनीतिक सहयोग को बढ़ावा दिया है। यह भारत के लिए चिंता का विषय है, विशेषकर इसलिए भी क्योंकि पाकिस्तान सिर्फ और सिर्फ भारत विरोध पर ही सांस लेता है।

आपरेशन सिंदूर के दौरान अजरबैजान और तुर्किए ने दिया था पाकिस्तान को समर्थन (Representational Image)

दूसरा कारण, ऑपरेशन सिंदूर में समर्थन करना। मई 2025 में भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादी शिविरों को ध्वस्त करने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ किया था। यह 22 अप्रैल के पहलगाम आतंकी हमले की जवाबी कार्रवाई ही थी। इस आपरेशन के दौरान अजरबैजान ने पाकिस्तान को सामरिक और रणनीतिक सहयोग दिया था और भारत की आलोचना की थी। यह भारत के लिए एक स्पष्ट संकेत था कि अजरबैजान उसकी सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज कर रहा है।

तीसी बड़ी वजह थी कश्मीर मुद्दे पर अजरबैजान का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के पाले में खड़े होना। ऐसा करना बेशक भारत की विदेश नीति की ‘रेड लाइन’ है, जिसे पार करना भारत के लिए अस्वीकार्य है। अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने भारत पर आरोप लगाया कि उसने ‘पाकिस्तान से अपनी नफरत’ के चलते उनके देश की सदस्यता रोकी। उन्होंने यह भी कहा कि भारत बहुपक्षीय मंचों पर द्विपक्षीय दुश्मनी को लाद रहा है। अजरबैजान ने खुद को एससीओ के लिए एक कीमती भागीदार बताया और दावा किया कि उसके सभी सदस्य देशों से अच्छे संबंध हैं, सिवाय भारत के।

हालांकि भारत ने इस मुद्दे पर अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन इसके पीछे की रणनीति स्पष्ट है। भारत क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना चाहता है। एससीओ में पहले से ही पाकिस्तान जैसा देश मौजूद है, जो भारत के साथ दुश्मनी को अपनी सत्ता नीति के तौर पर देखता है। अगर अजरबैजान को सदस्यता मिल जाती तो उस मंच पर दो भारत विरोधी देश सुर में सुर मिलाकर भ्रामकता ​फैलाते।

लेकिन इसका एक पक्ष यह भी है कि भारत और अजरबैजान का दुश्मन देश आर्मेनिया निकट आ रहे हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ रहा है। अजरबैजान की आर्मेनिया से दुश्मनी और नागोर्नो-काराबाख पर उसका आक्रमण भारत के लिए नैतिक और रणनीतिक चिंता का विषय है। इतना ही नहीं, अजरबैजान चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का समर्थक है, जिसका एक हिस्सा पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर से गुजरता है। भारत इसे अपनी संप्रभुता और अखंडता के लिए सीधी चुनौती मानता है और इस परियोजना का विरोधी रहा है।

अपने जख्म सालते हुए, अजरबैजान ने एक और बेमतलब का तर्क दिया है कि भारत ने एससीओ की ‘शंघाई भावना’ का उल्लंघन किया है। लेकिन भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति की प्राथमिकताएं अधिक महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में यदि भारत की ओर से ऐसा कोई वीटो हुआ है तो यह एक स्पष्ट संदेश है कि वह अपने रणनीतिक हितों से समझौता नहीं करेगा, चाहे वह कोई भी बहुपक्षीय मंच हो। अजरबैजान की एससीओ सदस्यता को रोकना एक ऐसा कदम है जो भारत की विदेश नीति में आत्मविश्वास और स्पष्टता को दर्शाता है। यह प्रकरण बताता है कि भारत अब केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभा रहा है।

Topics: पाकिस्तानPakistanभारतscoएससीओIndiaअजरबैजानChinaAzerbaijanveto
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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