सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (19 अगस्त) को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) द्वारा दायर एक याचिका को खारिज कर दिया। एक नाबालिग मुस्लिम लड़की के निकाह को जायज ठहराने वाले पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के 2022 के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया था कि पॉक्सो के तहत नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाना अपराध है और मजहब के आधार पर बालिकाओं के यौन शोषण को अनुमति देना धर्म निरपेक्षता संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर चिंता व्यक्त करते हुए मंगलवार (19 अगस्त) को इस संबंध में एक्स पर पोस्ट किया। प्रियंक कानूनगो ने अपनी पोस्ट में लिखा, “एक नाबालिग मुस्लिम लड़की की शाादी को जायज ठहराने वाले हाई कोर्ट के आदेश को राष्ट्रीय बाल आयोग ने मेरे अध्यक्ष रहते हुए सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। पॉक्सो के तहत नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाना अपराध है और मजहब के आधार पर बालिकाओं के यौन शोषण को अनुमति देना धर्म निरपेक्षता संवैधानिक सिद्धांत के विरुद्ध है। उस वक्त हमारी दलीलों से सहमत होकर माननीय न्यायालय ने तत्काल देश की लड़कियों के पक्ष में आदेश दिया था।”
उन्होंने इस फैसले को बच्चों के भविष्य के लिए खतरा बताते हुए आगे लिखा, “आज इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई हुई। जानकारी मिली है कि दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से पूर्व में नियुक्त किए गए NCPCR के वरिष्ठ वकील की अनुपस्थिति में लगभग एकतरफा सुनवाई के आधार यह केस खारिज कर दिया गया है। यह शरिया के आधार पर देश चलाने जैसा है। कोर्ट ने नाबालिग की सहमति को आधार माना है यह चिंताजनक है। इसी तरह के एक और मामले में कल फिर सुनवाई होनी है। यदि बच्चों को सेक्स की सहमति दे दी गई तो बर्बादी होगी। हे भगवान भारत के बच्चों की रक्षा करिए,आपका ही सहारा है।”
एनसीपीसीआर इस मुकदमे से अनजान है: सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि एनसीपीसीआर इस मुकदमे से अनजान है। उसे हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है। पीठ ने पूछा कि एनसीपीसीआर को धमकियों का सामना कर रहे दंपत्ति के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रदान करने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती क्यों देनी चाहिए? पीठ ने यह भी कहा, “एनसीपीसीआर के पास ऐसे आदेश को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है। अगर दो नाबालिग बच्चों को हाई कोर्ट द्वारा संरक्षण दिया जाता है, तो एनसीपीसीआर ऐसे आदेश को कैसे चुनौती दे सकता है। यह बेहद अजीब है कि एनसीपीसीआर, जिसका काम बच्चों की सुरक्षा करना है, ने ऐसे आदेश को चुनौती दी है।”
















