आज देश बहन-भाई के प्यार का त्योहार रक्षाबंधन मना रहा है। बहनें अपने भाई की लंबी उम्र और तरक्की की कामना के साथ राखी बांध रही हैं, तो भाई अपनी बहन का हर सुख दुख में साथ देने का वचन दे रहा है। इस संबंध में अनेक कहानियां हैं। इसमें बहन की रक्षा के लिए भाई ने अपने प्राण की चिंता भी नहीं की तो कहीं बहन ने भाई की मृत्यु की सूचना मिलते ही अपने प्राण त्याग दिए।
बिहार के सीवान के भइया-बहनी मंदिर से ऐसी ही एक गाथा जुड़ी है। इस मंदिर को भाई-बहन के अटूट प्रेम एवं विश्वास के रूप में पूजा जाता है। मुगल शासनकाल में बना यह बिहार का एकमात्र मंदिर है, जहां भाई बहन की पूजा होती है। भाई बहन के पवित्र प्रेम के इस ऐतिहासिक स्थल पर बहनें पहुंचती हैं और भाई की खुशियां, उसकी तरक्की की कामना कर पूजा करती हैं।
यह ऐतिहासिक मंदिर सीवान जिले के महाराजगंज अनुमडंल मुख्यालय से 3 किलोमीटर दूरी पर भीखाबांध में दो वट वृक्ष के नीचे है। प्रचलित कथा के अनुसार 17वीं शताब्दी में मुगलों का शासन था। उस समय एक भाई रक्षाबंधन से दो दिन पूर्व अपनी बहन को उसके ससुराल से विदा कराकर अपने घर ले जा रहा था। इसी दौरान दरौंदा थाना क्षेत्र की रामगढा पंचायत के भीखाबांध गांव के पास मुगल सैनिकों की नजर उस डोली पर पड़ गई, जिसमें दोनों बहन भाई बैठे थे। मुगल सिपाही उस डोली को रोककर बहन के साथ गंदी हरकतें करने लगे।
जब भाई ने इसका विरोध किया तो मुगल सिपाहियों ने उसे बंदी बना लिया। भाई को असहाय जान बहन भगवान से अपनी आबरू बचाने के प्रार्थना करने लगी। कहा जाता है कि तब धरती फट गई और दोनों भाई बहन उसमें समाहित हो गए। जिस जगह पर दोनों बहन भाई धरती में समाहित हुए थे उस स्थान पर कुछ दिनों के बाद दो वट वृक्ष उग गए। जो बाद में फैलकर आपस में मिल गए। 12 बीघा में फैले इन वट वृक्षों को देख ऐसा लगता है जैसे दोनों एक दूसरे की रक्षा करते हों। स्थानीय ग्रामीणों ने यहां भाई बहन के पिंड के रूप में मंदिर का निर्माण कराया। वैसे तो यहां वर्ष भर पूजा होती है लेकिन रक्षाबंधन के दिन यहां पेड़ को राखी बांधने बहनें आती हैं और भाई की लंबी उम्र की कामना करती हैं।

















