सनातन हिन्दू धर्म में देवाधिदेव महादेव भगवान शंकर की सर्वाधिक मान्यता है। श्रद्धालु लिंग स्वरूप व प्रतिमा दोनों ही स्वरूपों में महादेव का पूजन-वंदन करते हैं। यही वजह है कि देश में सर्वाधिक मंदिर भगवान शिव के ही हैं। पर क्या आप इस अद्भुत तथ्य से अवगत हैं कि हमारी देवभूमि भारत में केदारनाथ से रामेश्वरम तक देश में पांच शिव मंदिर एक सीधी ऊर्ध्व रेखा में स्थापित हैं।
अद्वितीय वास्तु और प्राचीन विज्ञान
देश के भौगोलिक मानचित्र में इस तथ्य की प्रमाणिकता को देखकर आप हैरत में पड़े बिना न रह सकेंगे। इक्कीसवी सदी का आधुनिक ज्ञान-विज्ञान तकनीकी कौशल की दृष्टि से भले ही कितना ही उन्नत क्यूँ न हो; पर प्राचीन भारत के विलक्षण मंदिर वास्तु विज्ञान के आगे आज के बड़े-बड़े वास्तु विशेषज्ञ भी दांतों तले अंगुलियां दबाने को मजबूर हैं। अनुपम वास्तुशिल्प के अन्यतम प्रतीक एक खड़ी रेखा में निर्मित हजारों साल पुराने इन पांच शिव मंदिरों का विवरण हमारे धर्मग्रंथों में भी मिलता है।
पांच प्रमुख शिव मंदिरों की श्रृंखला
ये पांच मंदिर हैं-श्री केदारनाथ मंदिर (उत्तराखण्ड), श्री कालेश्वरम (तेलंगाना), श्री एकम्बरेश्वर (तमिलनाडु), श्री चिदम्बरम (तमिलनाडु) और श्री रामेश्वरम (तमिलनाडु)। श्रावण मास के संदर्भ में प्रस्तुत हैं विलक्षण भौगोलिक संरचना पर आधारित इन अनूठे शिव मंदिरों से जुड़ी विभिन्न रुचिकर जानकारियां।
ज्योतिर्लिंग केदारेश्वर
उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग में समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित द्वादश ज्योतिर्लिगों में सर्वोच्च केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्रति श्रद्धालुओं की अनन्य आस्था है। इस केदारनाथ धाम का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में मिलता है। गिरिराज हिमालय के उतुंग केदार श्रृंग पर विनिर्मित इस पुराणकालीन मंदिर का निर्माण आखिर किस तकनीक से हुआ होगा जो 2013 की प्रलयंकारी जल प्रलय में भी सुरक्षित रहा!
केदारनाथ मंदिर का ऐतिहासिक निर्माण
पौराणिक मान्यता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण पांडवों के वंशज राजा जनमेजय ने कराया था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार कालांतर में विक्रम संवत 1076 से 1099 के मध्य मालवा के राजा भोज ने यहां कत्यूरी शैली में वर्तमान शिव मंदिर का निर्माण कराया था। इसके बाद 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने इसका जीर्णोद्धार कराया था।
त्रिलिंगा के श्री कालेश्वरम
एक सीधी रेखा में अवस्थित पांच विशिष्ट शिव मंदिरों में दूसरा अद्भुत मंदिर है तेलंगाना का श्री कालेश्वरम शिव मंदिर। पौराणिक मान्यता के अनुसार तेलंगाना की जिन तीन पवित्र पहाड़ियों पर भगवान शिव लिंगरूप में विराजमान हैं, उन त्रिलिंगों में श्री कालेश्वरम विशेष हैं।
कालेश्वरम का पौराणिक महत्व
कहा जाता है कि इन आदिकाल में इन पहाड़ियों पर सुर व असुरों के मध्य महासंग्राम हुआ था जिसमें महादेव शिव ने अपनी लीला से भगवान विष्णु की मदद से आसुरी शक्तियों का संहार किया था। तभी वे यहां मृत्यु के देवता श्री कालेश्वरम के रूप में प्रतिष्ठित हो गये।
कांची के एकम्बरनाथ
तमिलनाडु के कांचीपुरम का एकम्बरनाथ मंदिर भी एक सीधी रेखा में अवस्थित पंच शिव मंदिरों में तीसरा प्रमुख मंदिर है। खास बात यह है कि मंदिरों की नगरी कांची में पृथ्वी तत्व की आधारभूत परिकल्पना पर आधारित इस एकम्बरनाथ मंदिर का मुख्य आकर्षण इसके 1000 स्तम्भों का मंडप व कलात्मक मूर्तियां हैं।
पंच तत्व मंदिरों का महत्व
जानना दिलचस्प हो कि इस मंदिर के निकट ही जल तत्व पर आधारित तिरुवनैकवल मंदिर, वायु तत्व पर आधारित श्रीकालाहस्ती मंदिर और अग्नि तत्व पर आधारित तिरुवन्नमलई मंदिर स्थापित हैं। पंच तत्वों के इस विशिष्ट मंदिर समूह के कारण यह स्थल “पंचस्थानम” के नाम से लोकप्रिय है।
चिदंबरम के नटराज
पंच विशिष्ट शिव मंदिरों की इस श्रंखला में चौथा प्रमुख मंदिर है दक्षिण भारत का चिदंबरम मंदिर। भगवान शिव के नटराज स्वरूप को समर्पित 40 एकड़ क्षेत्र में विस्तृत इस भव्य मंदिर के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव ने यहीं पर ‘आनंद तांडव नृत्य’ की प्रस्तुति की थी।
चिदंबरम मंदिर की कला और कारीगरी
द्रविड़ मंदिर वास्तु शैली में निर्मित चिदंबरम का नटराज मंदिर दक्षिण भारत के मंदिरों में अद्वितीय एवं अप्रतिम माना जाता है। यहां भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित नटराज की तांडव नृत्य की 108 मुद्राएं मूर्तियों में अंकित हैं। मंदिर में आकर्षक कास्य प्रतिमाएं और भव्य गोपुरम विशेष आकर्षण का केंद्र हैं।
श्रीराम के रामेश्वरम
सीधी उर्ध्व रेखा में अवस्थित पंच शिवमंदिरों की इस पंक्ति का अंतिम प्रमुख मंदिर है ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना त्रेता युग में स्वयं भगवान राम ने की थी। यह पवित्र मंदिर जगदगुरु आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख धामों में भी एक है।
रामेश्वरम मंदिर का वैभव
तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित यह पौराणिक मंदिर दक्षिण की काशी की मान्यता प्राप्त है। मंदिर का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा माना जाता है। यहां विभीषण द्वारा स्थापित नौ ज्योतिर्लिंग भी मौजूद हैं। ऐतिहासिक ताम्रपट से पता चलता है कि 1173 ईस्वी में श्रीलंका के राजा पराक्रम बाहु ने मूल लिंग वाले गर्भगृह का निर्माण करवाया था।











