“मिसाइल मैन” और “जनता के राष्ट्रपति” के नाम से विख्यात भारत रत्न डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सिर्फ एक वैज्ञानिक या राष्ट्रपति ही नहीं थे, बल्कि लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत थे। मिसाइल मैन के नाम से प्रसिद्ध भारतीय गणराज्य के ग्यारहवें निर्वाचित राष्ट्रपति भारत रत्न अब्दुल कलाम ने सिखाया कि जीवन में परिस्थिति कैसी भी हो, जब आप अपने सपने को पूरा करने की ठान लेते हैं तो उसे पूरा अवश्य करें।
युवाओं के प्रेरणास्रोत
वैज्ञानिक और युवाओं के आदर्श डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन सादगी, कर्तव्यनिष्ठा और उच्च आदर्शों का प्रतीक हैं। उनका पूरा नाम डॉ. अवुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम था। डॉ. कलाम ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में चार दशकों तक मुख्य रूप से एक वैज्ञानिक और विज्ञान प्रशासक के रूप में काम किया और वे भारत के नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम और सैन्य मिसाइल विकास प्रयासों में भी शामिल रहे। उन्होंने तीन महान शिक्षकों विक्रम साराभाई, प्रोफेसर सतीश धवन और ब्रह्म प्रकाश जी के अधीन काम करते हुए उनसे बहुत कुछ सीखा। वे 2002 में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के समर्थन और उम्मीदवार के रूप में भारत के राष्ट्रपति चुने गए। पांच वर्ष की अवधि पूरी करने के बाद, वे शिक्षा, लेखन और सार्वजनिक सेवा के अपने नागरिक जीवन में लौट आये। वे वैज्ञानिक और अभियंता (इंजीनियर) के रूप में विख्यात थे।
आदर्श जीवन और भारत के लिए उनकी दूरदृष्टि
कलाम अपने व्यक्तिगत जीवन में पूरी तरह अनुशासन का पालन करने वालों में से थे। वह कुरान और भगवद गीता दोनों का अध्ययन करते थे और जीवन भर शाकाहारी रहे। भारत को महाशक्ति बनने की दिशा में कदम बढाते देखना उनकी दिली चाहत थी। उन्होंने कई प्रेरणादायक पुस्तकें भी लिखीं और हमेशा भारत के आम लोगों के लिए प्रौद्योगिकी को सुलभ बनाने की वकालत की।
डॉ. कलाम का प्रारंभिक जीवन
डॉ. कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम (तमिलनाडु) के धनुषकोडी गाँव में एक साधारण मुस्लिम परिवार में हुआ था। इनके पिता जैनुलाब्दीन न तो ज़्यादा पढ़े-लिखे थे, न ही पैसे वाले थे बल्कि नाव चलाकर आजीविका चलाते थे जबकि माँ, आशियम्मा इनके जीवन का आदर्श थीं। अब्दुल कलाम के जीवन पर इनके पिता का बहुत प्रभाव रहा। वे भले ही पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उनकी लगन और उनके दिए संस्कार अब्दुल कलाम के बहुत काम आए। डॉ. कलाम को अपने पिताजी से विरासत के रूप में ईमानदारी और आत्मानुशासन, तथा माँ से ईश्वर में विश्वास और करुणा का भाव मिला। बचपन में ही उन्होंने जीवन की कठिनाइयों का सामना किया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। वे बचपन से ही अत्यंत मेधावी, अनुशासित और स्वप्नद्रष्टा थे। पाँच वर्ष की अवस्था में रामेश्वरम की पंचायत के प्राथमिक विद्यालय में उनका दीक्षा-संस्कार हुआ था। इनके शिक्षक इयादुराई सोलोमन ने इनसे कहा था कि जीवन मे सफलता तथा अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था, अपेक्षा इन तीन शक्तियो को भलीभाँति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहिए। पांचवी कक्षा में पढ़ते समय इनके अध्यापक इन्हें पक्षी के उड़ने के तरीके की जानकारी दे रहे थे, लेकिन जब छात्रों को समझ नही आया तो अध्यापक उनको समुद्र तट ले गए जहाँ उड़ते हुए पक्षियों को दिखाकर अच्छे से समझाया, इन्ही पक्षियों को देखकर कलाम ने तय कर लिया कि उनको भविष्य में विमान विज्ञान में ही जाना है।
इन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा जारी रखने के लिए अख़बार तक वितरित किया। कलाम ने 1950 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलजी से अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। स्नातक होने के बाद उन्होंने हावरक्राफ्ट परियोजना पर काम करने के लिये भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया। 1962 में वे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में आये जहाँ उन्होंने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अपनी भूमिका निभाई। परियोजना निदेशक के रूप में भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी 3 के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जिससे जुलाई 1982 में रोहिणी उपग्रह सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया था। इन्होंने भारत के पोखरण परमाणु परीक्षण (1998) में वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बन सका।
2002 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी समर्थित एनडीए घटक दलों द्वारा राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया, जिसका सभी दलों ने समर्थन किया। 18 जुलाई को नब्बे प्रतिशत बहुमत द्वारा भारत के राष्ट्रपति चुने गए और 25 जुलाई 2002 को संसद भवन के अशोक कक्ष में 11वें राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई। शपथ समारोह में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य तथा अधिकारीगण उपस्थित थे। इनका कार्याकाल 25 जुलाई 2007 को समाप्त हुआ। अपने अंतिम दिनों तक भी डॉ. कलाम काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग, भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद तथा भारतीय प्रबंधन संस्थान इंदौर में आगंतुक प्रोफेसर बने हुए थे। साथ ही भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान तिरूवंतपुरम् में कुलाधिपति तथा अन्ना विश्वविद्यालय चेन्नई में एयरो इंजीनियरिंग के प्रध्यापक के पद पर भी नियुक्त थे।
27 जुलाई 2015 की शाम अब्दुल कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलोंग में ‘रहने योग्य ग्रह’ पर एक व्याख्यान दे रहे थे जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा और ये बेहोश हो कर गिर पड़े। लगभग 6:30 बजे गंभीर हालत में इन्हें बेथानी अस्पताल में आईसीयू में ले जाया गया और दो घंटे के बाद इनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी गई। अस्पताल के सीईओ जॉन साइलो ने बताया कि जब कलाम को अस्पताल लाया गया तब उनकी नब्ज और ब्लड प्रेशर साथ छोड़ चुके थे।
पद्म विभूषण सम्मान
इनके 79 वें जन्मदिन को संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व विद्यार्थी दिवस के रूप में मनाया गया। भारत सरकार द्वारा इसरो और डी आर डी ओ में कार्यों के दौरान वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिये इन्हें 1981 में पद्म भूषण और 1990 में पद्म विभूषण का सम्मान प्रदान किया गया। 1997 में कलाम साहब को वैज्ञानिक अनुसंधानों और भारत में तकनीकी के विकास में अभूतपूर्व योगदान हेतु भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया| 2005 में स्विट्ज़रलैंड की सरकार ने डॉक्टर कलाम के स्विट्ज़रलैंड आगमन के उपलक्ष्य में 26 मई को विज्ञान दिवस घोषित किया| नेशनल स्पेस सोशायटी ने वर्ष 2013 में उन्हें अंतरिक्ष विज्ञान सम्बंधित परियोजनाओं के कुशल संचलन और प्रबंधन के लिये वॉन ब्राउन अवार्ड से पुरस्कृत किया। इन्हें बैलेस्टिक मिसाइल और प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास के कार्यों के लिए भारत में ‘मिसाइल मैन’ के रूप में भी जाना जाता है। वे कहा करते थे- “सपने वो नहीं जो हम सोते समय देखते हैं, सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते।”













