‘आध्यात्मिक चेतना का सजीव रूप है धर्म’
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‘आध्यात्मिक चेतना का सजीव रूप है धर्म’

दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘कैंपस लॉ सेंटर’ ने ‘कर्तव्यम्’ नामक एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक संविधान व्याख्यान शृंखला की शुरुआत की।

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 5, 2025, 12:36 pm IST
inदिल्ली, संविधान
‘कर्तव्यम्’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

‘कर्तव्यम्’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

गत दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘कैंपस लॉ सेंटर’ ने ‘कर्तव्यम्’ नामक एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक संविधान व्याख्यान शृंखला की शुरुआत की। यह भारतीय संविधान के 75 वर्ष के स्मरणोत्सव पर भारत के दार्शनिक और संवैधानिक मूल्यों में कर्तव्य के सिद्धांतों को पुन: स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक पहल है। ‘कर्तव्यम्’ एक रूपांतरणकारी विधिक विमर्श का आरंभ करता है, जो अधिकार-केंद्रित व्यवस्था से हटकर कर्तव्य-आधारित व्यवस्था की ओर अग्रसर होता है। यह भारतीय संविधान की मूल भावना और संविधान सभा के दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करता है तथा मूल भारतीय दर्शन पर आधारित है, जहां ‘कर्तव्य’ को सामाजिक सद्भाव का आधार और स्वाभाविक धर्म माना गया है।

यह शृंखला 4 अप्रैल, 2025 से जनवरी, 2026 तक चलेगी, जिसमें 30 से अधिक प्रतिष्ठित न्यायविद्, विद्वान और अधिवक्ता सम्मिलित होंगे। इसमें 20 केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों तथा एन.एच.आर.सी. और एन.सी.डब्ल्यू जैसी वैधानिक संस्थाओं के साथ साझेदार सत्र आयोजित किए जाएंगे। इस पहल के ‘ज्ञान सहयोगी’ के रूप में ‘नॉलेज कलेक्टिव’ भागीदार है और इसमें ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से 5,000 से अधिक प्रतिभागियों के जुड़ने की अपेक्षा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह इस पहल के मुख्य संरक्षक हैं और कैंपस लॉ सेंटर की प्रभारी प्रोफेसर प्रो. (डॉ.) अलका चावला संरक्षक हैं। कार्यक्रम निदेशक हैं डॉ. सीमा सिंह। गत 22 अप्रैल को उद्घाटन व्याख्यान में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कर्तव्यम् को एक सार्थक कर्म का आह्वान बताया, जो लोकतंत्र में जनता की भागीदारी को सशक्त करता है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे ईमानदारी और अनुशासन के साथ जीवन व्यतीत करें और सार्थक संवाद के माध्यम से विकसित भारत के निर्माण में भूमिका निभाएं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने कर्तव्यम् को एक साधना बताया और कहा कि अधिकार और कर्तव्य सूर्य और सूर्य के प्रकाश की तरह अविभाज्य हैं।

भारत के महान्यायवादी आर. वेंकटरमणी ने कर्तव्य-केंद्रित दृष्टिकोण से विधान की पुनर्कल्पना का आह्वान किया और एक क्रांतिकारी ‘ह्यूमन ड्यूटीज़ एक्ट’ की संभावना की बात की। डॉ. अलका चावला ने कर्तव्यम् को ‘कर्तव्य, धर्म और सही दिशा में कर्म’ का प्रतीक बताया और पश्चिमी अधिकार-केंद्रित सोच से भारतीय सामूहिक आदर्शों की ओर परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया।

डॉ. सीमा सिंह ने संस्कृत धातु “ऋ” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था और उत्तरदायित्व का प्रतीक है और बताया कि अधिकार केवल कर्तव्यों के निर्वहन से ही प्राप्त होते हैं। डॉ. अंजु वाली टिक्कू ने कहा कि केवल भ्रातृत्व और सामूहिकता के माध्यम से ही समाज का वास्तविक विकास संभव है। दिल्ली विश्वविद्यालय, दक्षिण परिसर के निदेशक प्रो. श्रीप्रकाश सिंह ने भारतीय शिक्षा प्रणाली के उपनिवेशी प्रभाव से मुक्ति और एक कर्तव्य-सचेत नागरिक के निर्माण में कर्तव्य की भूमिका को रेखांकित किया।

छात्रों और शिक्षाविदों के लिए अवसर

कर्तव्यम् शृंखला के अंतर्गत छात्रों, शोधकर्ताओं, अधिवक्ताओं और शिक्षाविदों से शोध-पत्र आमंत्रित किए गए हैं। शीर्ष 100 प्रविष्टियों में से 25 छात्रों को सर्वोच्च न्यायालय और 50 छात्रों को दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं के साथ तथा शेष 25 छात्रों को राष्ट्रीय आयोगों में काम सीखने का अवसर मिलेगा।

इस आंदोलन से जुड़िए

कर्तव्यम् शृंखला का प्रसारण ‘हाइब्रिड मोड’ में किया जाएगा, जिसके सत्र दिल्ली विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट (kartavyam.du.ac.in) और कर्तव्यम् के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध होंगे। यह पहल भारत का सबसे बड़ा कर्तव्य-केंद्रित विधिक विमर्श बनकर अगली पीढ़ी के उत्तरदायी नागरिकों और विधिक चिंतकों को दिशा देगी। अधिक जानकारी एवं अपडेट हेतु संपर्क करें- ईमेल : [email protected] और वेबसाइट: kartavyam.du.ac.in।

Topics: दार्शनिक और संवैधानिक मूल्यकैंपस लॉ सेंटर. कर्तव्यम्भारतीय संविधान की मूल भावनाब्रह्मांडीय व्यवस्था
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