सम्पादकीय

वक्फ संशोधन विधेयक : तुष्टीकरण की राजनीति पर संवैधानिक अंकुश

भारत का संविधान किसी जाति, मत या मजहब में भेद नहीं करता। वह हमें एक वचन देता है-हम सब एक हैं। लेकिन जरा सोचिए, जब इस वचन को कोई राजनीति का मोहरा बना ले तो क्या हो?

Published by
हितेश शंकर

इस देश में किसी गरीब किसान की जमीन, किसी शिक्षक का स्कूल या किसी बूढ़ी मां की झोपड़ी अगर एक संस्था की मनमानी से छीन ली जाए, तो ऐसे में संविधान सिर्फ किताब तक रह जाता है। उदाहरण के लिए, सौराष्ट्र के किसी गांव में कोई व्यक्ति अपने जीवन भर की पूंजी और आने वाली पीढ़ियों के सपने साकार करने के लिए एक छोटा-सा स्कूल खोलता है।

गांव के बच्चे, जो शहर तक नहीं पहुंच सकते, उस स्कूल में पढ़ते, सपने बुनते हैं। लेकिन एक दिन एक कागज आता है-आपकी जमीन अब वक्फ संपत्ति है। क्यों? क्योंकि 70 साल पुराने किसी दस्तावेज में दर्ज है कि वहां कभी एक टीन की मस्जिद थी, जिसका आज न कोई साक्ष्य है, न अवशेष। वह व्यक्ति न्यायालय में गुहार लगाता है। लड़ते-थकते अंतत: वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला अंतिम मान लिया जाता है। दुखद…उसे न्याय नहीं मिला। इससे भी दुखद यह कि उसे न्याय मांगने का भी हक ही नहीं।

यह सिर्फ उदाहरण की बात नहीं है। दिल्ली में पुरानी हवेलियां, भोपाल में सरकारी भवन, उत्तर प्रदेश के गांवों के खेत, दक्षिण भारत में पूरे के पूरे गांव और मंदिर संपत्तियां वक्फ के दावों में जकड़ी हुई हैं। संपत्ति का अधिकार, जो संविधान ने हर नागरिक को दिया है, वहां खामोश है। यह ‘पंथनिरपेक्षता’ है या बेजा अधिकारों को पोसती ‘शर्मनिरपेक्षता’!

कल्पना कीजिए, यदि किसी राज्य में मंदिर बोर्ड को यह अधिकार मिल जाए कि, वह किसी भी संपत्ति को ‘देवस्थान’ घोषित करके बिना किसी प्रक्रिया के अधिग्रहित कर ले। तब भी मीडिया चुप रहेगा? क्या अदालतें आंखें मूंद लेंगी? नहीं। लेकिन जब यही काम वक्फ बोर्ड करता है, तो हम इसे ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ कहकर चुप हो जाते हैं। क्यों?

आपको याद है! एर्नाकुलम के एक कॉलेज में मुस्लिम छात्रों के लिए अलग प्रार्थना, कोझिकोड में मुस्लिम छात्राओं के लिए अलग ड्रेस कोड लागू करने की कोशिश की गई। क्या यह ‘समावेशन’ है? या अलग पहचान की दीवारें खड़ी करने का खतरा और षड्यंत्र?
ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि संविधान की भावना के अनुरूप कदम बढ़ाना चाहिए कि नहीं? समझिए, वक्फ संशोधन विधेयक क्यों जरूरी है! यह विधेयक कहता है-

  • अब किसी भी संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित करने से पहले न्यायिक जांच अनिवार्य होगी।
  • हर व्यक्ति को वक्फ के किसी भी निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार मिलेगा।
  • वक्फ बोर्ड अब जवाबदेह और पारदर्शी होगा। उसका धन, उसका प्रबंधन, उसकी गतिविधियां…सब निगरानी में आएगा।
  • वक्फ ट्रिब्यूनल अब अंतिम प्राधिकारी नहीं होगा, उच्च न्यायालय में अपील संभव होगी।
  • वक्फ बोर्डों को सार्वजनिक संस्थाओं की तरह जवाबदेह बनाया जाएगा। इसकी नियमित ऑडिट, सार्वजनिक रिपोर्टिंग और जांच
    हो सकेगी।

मानना चाहिए कि संवैधानिक समरसता की ओर यह एक साहसिक कदम है। यह विधेयक एक समुदाय को राष्ट्र से जोड़ने का प्रयास है- भय या विशेषाधिकार के माध्यम से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, समान अधिकार और उत्तरदायित्व के आधार पर। यह विधेयक सिर्फ कानूनी नहीं है। यह एक प्रयास है, संविधान और समाज को बचाने का। यह बताता है कि मुसलमान सिर्फ वोट बैंक नहीं हैं, उन्हें अधिकार चाहिए। उन्हें शिक्षा, रोजगार और न्याय की मुख्यधारा से जोड़ा जाना चाहिए, न कि मजहब के नाम पर अलग करके उन्हें राजनीति का ईंधन बनाया जाना चाहिए। मुसलमान भी बाकी सबकी भांति देश के बराबरी के नागरिक हैं। उनके लिए वही कानून, वही नियम, वही अधिकार होने चाहिए, जो हिंदू, सिख, ईसाई या अन्य सबके लिए हैं।

यह विधेयक बताता है कि अल्पसंख्यक संरक्षण और तुष्टीकरण में फर्क होता है। संरक्षण वह होता है, जो सबके साथ न्याय करे। तुष्टीकरण वह है, जो संविधान के सिद्धांतों को दरकिनार कर एक वर्ग को विशेषाधिकार दे। मुस्लिम समुदाय के साथ दोहरी राजनीति का खेल कब बंद होगा! यह तुष्टीकरण बनाम सशक्तिकरण का प्रश्न है। उन्हें समानता की बजाय जैसे भी हो, लामबंद करने की राजनीति पूरे समुदाय को मुख्यधारा में समाहित करने की बजाय कट्टरता की घुट्टी पिलाकर अलग-थलग ही करती है। विचार करने की बात यह है कि वक्फ संशोधन विधेयक क्यों एक क्रांतिकारी कदम है। किसी संपत्ति पर वक्फ का दावा अब पारदर्शी प्रक्रिया से ही संभव होगा। किसी भी व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया का पूरा अवसर मिलेगा।

आज भारत उस चौराहे पर है, जिसके एक ओर वह राजनीति है, जो मजहब के नाम पर विशेषाधिकार बांट कर वोट बटोरना चाहती है। दूसरी ओर वह संविधान है, जो सबको साथ लेकर चलता है। एक भारत, एक न्याय की बात करता है। इसलिए वक्फ संशोधन विधेयक उस संविधान के साथ खड़े होने का एक ऐतिहासिक मौका है।
हम कहें – ना कोई बड़ा, ना कोई छोटा-सब नागरिक समान,
ना कोई विशेषाधिकार, ना कोई भेदभाव-केवल न्याय।
यही हमारा धर्म है। यही भारत है।

x@hiteshshankar

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