बलूचिस्तान को आजाद कराने के बढ़ते जुनून के साथ-साथ खैबर पख्तूनख्वा और सिंध में जिस तरह के समीकरण बन रहे हैं, वे संकेत हैं कि आने वाले समय में पाकिस्तान के लिए कई मोर्चों पर सिरदर्द बढ़ने वाला है। एक भू-भाग के तौर पर उसका भविष्य कैसा है, यह इसी बात पर निर्भर करेगा कि वह इस चुनौती से कैसे निपटता है।
सबसे पहले बात हाल में हुए जाफर एक्सप्रेस अपहरण कांड की। पाकिस्तान सरकार ने 13 मार्च को ही यह कहते हुए इस अपहरण कांड का पटाक्षेप कर दिया था कि सेना के शार्प शूटरों ने 33 बलूच फिदायीन लड़ाकों को मारकर सभी बंधकों को रिहा करा लिया है। लेकिन बलूच सशस्त्र गुट बलोच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) का 48 घंटे का अल्टीमेटम 15 मार्च को खत्म हुआ। इसके बाद उसने सभी 214 बंधकों को मारने का दावा करके प्रकरण के खत्म होने की घोषणा की। बीएलए के मुताबिक पाकिस्तानी सेना के साथ 17 मार्च तक झड़प चली। बीएलए ने पाकिस्तान के दावे को बेबुनियाद बताते हुए चुनौती दी कि अगर उसने सभी बंधक छुड़ा लिए गए हैं, तो उन्हें लोगों के सामने लाएं और उनकी संख्या बताएं।
मारे गए सैनिकों का ब्योरा
हालांकि पाकिस्तान सरकार ने ऐसी कोई जानकारी साझा नहीं की, लेकिन बीएलए ने मारे गए 214 बंधकों की जानकारी सार्वजनिक की है। बीएलए के मुताबिक इनमें 41वीं डिवीजन के 45 सैनिक, 17वीं आजाद कश्मीर रेजिमेंट के 56, ईएमई (कॉर्प्स आफ इलेक्ट्रिकल एंड मेकैनिकल इंजीनियर्स) सेंटर के 47, 25वीं बलोच रेजिमेंट के 15, छठी आर्मर्ड रेजिमेंट के 26 और इन्फैंट्री स्कूल के 25 सैनिक थे। बीएलए प्रवक्ता जीयंद बलोच ने बयान जारी कर यह जानकारी दी। बयान में कहा गया, ‘‘18 मार्च को आपरेशन दारा-ए-बोलन पूरा हो गया है। इसके दो चरण थे। पहला चरण फरवरी 2024 में पूरा हुआ, जिसके तहत पूरे मछ शहर पर कब्जा किया गया था। जाफर एक्सप्रेस पर हमले के साथ दूसरा चरण भी पूरा हुआ। कैदियों की अदला-बदली न करने और फौजी जिद के कारण जाफर एक्सप्रेस के बंधक 214 फौजियों को मार डाला गया है।’’
जीयंद बलोच ने कहा कि इन फौजी बंधकों के मामलों को ‘‘बीएलए के नियमों और अंतरराष्ट्रीय युद्ध कानूनों के मुताबिक बलोच नेशनल रेसिस्टेंस कोर्ट के सामने रखा गया और बलोचों के नरसंहार, लोगों को जबरन लापता करने और अन्य युद्ध अपराधों में लिप्तता के अकाट्य साक्ष्यों के आधार पर उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई गई।’’ यह भी साफ किया गया कि उसने अदालत के फैसले पर तत्काल अमल नहीं किया और बीएलए की ‘‘सीनियर कमांड काउंसिल ने काबिज फौज के सामने युद्धबंदियों की अदला-बदली की पेशकश की और इसके लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम भी दिया गया था।’’ इसके साथ ही बीएलए ने पंजाब की औरतों से अपील की कि वे अपने लड़कों को बलूचों के खिलाफ अभियान में शामिल होने से रोकें, क्योंकि आजादी की लड़ाई लड़ रहे बलूचों की पंजाब के लोगों से कोई दुश्मनी नहीं, लेकिन अगर ये लोग बलूचिस्तान में जुल्म ढाने में शामिल होंगे तो वे कफन में ही वापस लौटेंगे।
जीयंद बलोच ने न केवल मारे गए फौजियों की रेजिमेंटवार संख्या बताई, बल्कि यह भी बताया कि इस आॅपरेशन के दौरान बीएलए के 13 लड़ाके मारे गए, जिनमें फिदायीन मजीद ब्रिगेड के 6, फतेह स्क्वॉयड के 4 और एसटीओएस के 3 लड़ाके थे। बीएलए ने इनका पूरा ब्योरा जारी किया है।
एक और बड़ा हमला
फौज और बलूच लड़ाकों के बीच जारी झड़प के बीच बीएलए ने 16 मार्च को एक और बड़े हमले को अंजाम दिया। यह हमला नुश्की में सेना के एक काफिले पर किया गया, जिसमें 90 फौजी मारे गए। इस हमले को मजीद ब्रिगेड ने अंजाम दिया। जीयंद बलोच ने बयान जारी कर इसकी जानकारी दी। यह हमला पाकिस्तान को अफगानिस्तान से जोड़ने वाले आरसीडी (रीजनल कोआपरेशन फॉर डेवलपमेंट) हाईवे, जिसे एनएच-25 भी कहते हैं, पर रखसान मिल के पास हुआ। सेना के इस काफिले में आठ बसें थीं। हमले में आईईडी का इस्तेमाल किया गया। एक बस के परखच्चे उड़ गए, जबकि हमले के बाद घात लगाए बलूच लड़ाकों ने और भी बसों पर धावा बोला। बीएलए इस हमले के बारे में विस्तार से जानकारी देगी। इसमें मारे गए फौजियों का आंकड़ा बढ़ भी सकता है।
राजनीतिक कार्यकर्ता जफर बलोच कहते हैं, ‘‘बलूचिस्तान को आजाद कराने का संघर्ष नए दौर में पहुंच गया है और साफ है कि आने वाले समय में खून-खराबा बढ़ने वाला है। यह एक खतरनाक दौर का आगाज है।’’ पाकिस्तान सशस्त्र बलों की मीडिया और जनसंपर्क शाखा आईएसपीआर ने कहा है कि बलोचों के इस हमले से ‘युद्ध के नियम’ बदल गए हैं। इस पर बीएलए का कहना है, ‘‘युद्ध के नियम हमने नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना ने बदले हैं। हम इन बदले हुए नियमों को स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं और सेना को उसी की भाषा में जवाब देंगे।’’
पश्तूनों का साथ
इन दो हमलों के अलावा क्वेटा से लेकर ग्वादर तक कई छोटे-छोटे हमले हुए, जिनमें सेना को निशाना बनाया गया। उधर, अफगानिस्तान से लगती सीमा से भी बड़े संकेत मिल रहे हैं। 14 मार्च को तड़के खैबर जिले में एक सैन्य चौकी पर हमला हुआ, जिसमें कम से कम तीन पाकिस्तानी सैनिकों मारे गए। सेना की जवाबी कार्रवाई में चार हमलावर भी मारे गए। इस हमले की जिम्मेदारी हाफिज गुल बहादुर गुट ने ली है। अनुमान है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के सहयोग से यह हमला किया गया।
लेकिन इन हमलों से इतर भी कुछ हुआ है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। जिनेवा में की घटना शायद वैसी नहीं है, जैसी दिख रही है। 15 मार्च को जिनेवा में पश्तून तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) ने एक कार्यक्रम आयोजित किया था, जिसमें बलूचिस्तान नेशनल मूवमेंट (बीएनएम) के अध्यक्ष डॉ. नसीम बलोच ने भाग लिया था। उन्होंने अपने संबोधन में जो कहा, वह महत्वपूर्ण है। नसीम बलोच कहते हैं, ‘‘आज मैं केवल एक व्यक्ति के तौर पर आपसे मुखातिब नहीं हूं।
मेरी आवाज हर उस बलोच मां की आवाज है, जो अपने लापता बेटे को खोज रही है, हर उस पख्तून पिता की आवाज है, जो अपने मार दिए गए बेटे का मातम मना रहा है और हर उस सिंधी परिवार की आवाज है, जो अपनों के वापस लौटने का इंतजार कर रहा है। बलोच और पख्तून मुल्कों का रिश्ता साझा खून, साझा इतिहास और साझा तकलीफों का है। हम सभी पर एक ही मुल्क ने जुल्म ढाए। बलूचिस्तान की पहाड़ियों से लेकर खैबर पख्तूनख्वा की घाटियों तक, पाकिस्तान ने युद्ध का मैदान और हमारे घरों को कब्रिस्तान बना दिया। दशकों से पाकिस्तान ने हमारे अस्तित्व को मिटाने के लिए युद्ध छेड़ रखा है। उसने हमारे गांवों पर बमबारी की, हमारे प्राकृतिक संसाधन लूटे, हमारी पहचान मिटाई और हमारी जमीन पर हमारे साथ दुश्मनों जैसा सलूक किया।’’
साफ है, बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा से लेकर सिंध तक पाकिस्तान की ज्यादतियों के खिलाफ ऐसा गठजोड़ तैयार हो रहा है, जो आतंकवाद को राजनीतिक लक्ष्यों को पाने के औजार के तौर पर इस्तेमाल करने वाले पाकिस्तान की नींद हराम कर सकता है। वैसे, जाफर एक्सप्रेस प्रकरण पर पाकिस्तान ने दावा किया था कि बलोच लड़ाकों को अफगानिस्तान से ‘आर्डर’ मिल रहे थे। बीएलए के साथ अफगानिस्तान ने भी इन आरोपों का खंडन किया था और कहा कि आजादी की लड़ाई लड़ रहे बलूच अपने दम पर इस लड़ाई को जारी रखे हुए हैं। क्या वाकई बलूचों और पख्तूनों के बीच किसी तरह का रिश्ता नहीं है? इस पर बीएनमएम के सूचना सचिव काजीदाद मोहम्मद रेहान कहते हैं, ‘‘बलूचों का किसी भी पख्तून संगठन के साथ कोई औपचारिक गठजोड़ नहीं है, लेकिन ऐसा नही कि दोनों कौमों के बीच कोई रिश्ता नहीं। बलूचों और पख्तूनों के बीच ऐतिहासिक तौर पर रिश्ते रहे हैं।’’
वहीं, जफर बलोच कहते हैं, ‘‘दर्द का रिश्ता सबसे बड़ा होता है। खास तौर पर तब यह और भी मजबूत हो जाता है, जब इस दर्द की वजह एक ही हो। बलूचों और पख्तूनों के मामले में वह वजह पाकिस्तान है।’’ डॉ. नसीम बलोच ने जिनेवा में अपने संबोधन में कहा भी कि ‘पाकिस्तान को हमारे हथियारों से खाफ नहीं, उसे खौफ है तो हमारी एकता से।’
खतरे की घंटी
बेशक बलूच और पख्तून गुटों में कोई औपचारिक गठजोड़ न हो, लेकिन अनौपचारिक तौर पर उनके संबंध बेहद गहरे हैं। हैरानी नहीं कि आने वाले समय में इन गुटों के बीच कोई औपचारिक गठबंधन भी हो जाए। इस मामले में बलूच राजी अजोही संगर (ब्रास) पर गौर करना चाहिए। बलूचिस्तान की आजादी के लिए सशस्त्र आंदोलन करने वाले इस गुट में शुरुआती तौर पर बीएलए, बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और बलूचिस्तान रिपब्लिकन आर्मी (बीआरए) थे। लेकिन 2020 में इसमें सिंधुदेश रिवॉल्यूशनरी आर्मी (एसआरए) को भी शामिल कर लिया गया। उसके बाद से ब्रास के आपरेशन में एसआरए के लड़ाके भी शामिल होते रहे। लेकिन अभी हाल ही में एक ऐसा फैसला हुआ है, जिससे अंदाजा होता है कि आने वाले समय में बलूचिस्तान से लेकर सिंध तक क्या हो सकता है। इसी मार्च के शुरू में ब्रास और एसआरए के बीच संयुक्त सैन्य कमांड स्थापित करने का फैसला हुआ है। जाहिर है कि इसका असर आने वाले समय में कई संयुक्त अभियानों के रूप में देखने को मिलने वाला है।
शक नहीं कि अफगानिस्तान से लेकर बलूचिस्तान और सिंध तक पाकिस्तान विरोधी गुट प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से एकजुट हो गए हैं और इस लिहाज से आने वाला समय अप्रत्याशित घटनाओं और नतीजों वाला हो सकता है। जफर बलोच कहते हैं, ‘‘आज के हालात के लिए केवल और केवल पाकिस्तान जिम्मेदार है। उसने बड़े जतन से कोने-कोने में ज्वालामुखी बना रखे हैं। कौन कहां से कब फट पड़े, कहना मुश्किल है!’’
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