मौनी अमावस्या: आइए जानें सनातन धर्म में क्या है ‘मौन’ की महिमा
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मौनी अमावस्या: आइए जानें सनातन धर्म में क्या है ‘मौन’ की महिमा

हमारे सनातन धर्म-दर्शन में मौन साधना की बड़ी महत्ता बतायी गयी है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jan 29, 2025, 10:07 am IST
inभारत
Mauni Amavasya 2025

Mauni Amavasya

हमारे सनातन हिन्दू धर्म में कुंभपर्व के दौरान मौनी अमावस्या के अमृत स्नान को सर्वाधिक पुण्यफलदायी यूँ ही नहीं माना गया है। हमारे सनातन धर्म-दर्शन में मौन साधना की बड़ी महत्ता बतायी गयी है। मानव मन के मर्मज्ञ हमारे वैदिक मनीषी ‘मौन’ को तपस्या का एक अनिवार्य अंग मानते थे। वेदों और उपनिषदों में ‘मौन’ को ब्रह्मचर्य, सत्य और संयम के साथ जोड़कर देखा गया है। वैदिक ऋषियों का प्रतिपादन था कि ‘मौन’ की साधना से ही ‘मुनि’ पद की प्राप्ति होती है। पौराणिक मान्यता है कि इसी शुभ दिन सृष्टि के आदि पुरुष महाराज मनु का जन्म हुआ था। शास्त्रज्ञों का यह भी मानना है कि इसी दिन ब्रह्मा जी ने मनु महाराज तथा महारानी शतरूपा को प्रकट करके सृष्टि की शुरुआत की थी।

आत्मा और परमात्मा के बीच संवाद स्थापित करता है ‘मौन’

‘मौन’ रहने से मन स्थिर होता है और विचारों की उथल-पुथल शांत हो जाती है। ‘मौन’ के माध्यम से आत्मा और परमात्मा के बीच सीधा संवाद स्थापित होता है। इसके साथ ही ‘मौन’ की साधना से वाणी से होने वाले पापों, झूठ और विवादों से भी सहज ही बचा जा सकता है। महर्षि पतंजलि ’’ योग सिद्धांत’’ में कहते हैं कि मौन साधना जीवन को संचालित करने का मूल मंत्र है। मौन हमारे चिंतन को विराट स्वरूप प्रदान करता है। मौन साधना से शरीर के मूलाधार से लेकर सहस्त्रार तक के षट्चक्र सहज ही प्रकृति से ऊर्जा संग्रह करने लगते हैं। मौन के द्वारा हम अपनी चित्तवृत्तियों को विचलित होने से बचा सकते हैं। सांसारिक झंझावतों से उपजने वाली मानसिक अशांति आत्मोकर्ष में बाधक होती है। इससे बचने के लिए मौन साधना एक अचूक उपायहै। ’’ योग सिद्धांत’’ में मौन व्रत की दो श्रेणियां बतायी गयी हैं। पहला, वाणी का ‘मौन’ और दूसरा मन का ‘मौन’। वाणी को वश में रखते हुए कम बोलना या नहीं बोलना बाहृय मौन की श्रेणी में आता है और मन को स्थिर रखना, बुरे विचार न लाना, आत्मतत्व में लीन होकर अध्यात्म विचार करना अंत: मौन की श्रेणी में आता है। हमारे ऋषियों-महर्षियों और संतों-मुनियों ने इन दोनों में अंत: मौन को प्रमुखता दी है। मौन को जीवन के मूल स्रोत के रूप में परिभाषित करने वाले गायत्री महाविद्या के महामनीषी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का कहना था कि वाणी पर नियंत्रण से मन को अपूर्व शांति तथा मस्तिष्क को विश्राम मिलता है, क्रोध का शमन होता है तथा आत्मबल में वृद्धि होती है। इसलिए सनातन धर्म में मौन को महाव्रत की संज्ञा दी गयी है।

शास्त्र कहते हैं –‘’मौन सर्वार्थ साधनम्’’ अर्थात मौन रहने से सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। इसके इतर जो वाणी पर संयम नहीं रखते, उनके अनावश्यक शब्द जंजाल उनकी अमूल्य प्राणशक्ति को व्यर्थ ही सोख डालते हैं। वे कहते हैं कि जैसा मन होगा, वैसा वचन और कर्म होगा। अनमने तरीके से किया गया कोई अनुष्ठान- विधान पूर्ण नहीं माना जा सकता। इसमें मन की शुद्धि बेहद जरूरी होती है और यह तभी पूरा होता है जब मन शांत, एकाग्र व मौन होता है।

बोधि प्राप्ति के बाद सात दिनों तक ‘मौन’ रहे थे महात्मा बुद्ध

कहते हैं कि महात्मा बुद्ध को जब बोधि प्राप्ति हुई तो वे सात दिनों तक मौन ही रहे। जब मौन समाप्त हुआ तो उनके शब्द थे, ‘’जो जानते हैं, वे मेरे कहे बिना भी जानते हैं और जो नहीं जानते, वे मेरे कहने पर भी नहीं जानेंगे।‘’ बुद्ध जब भी बोले उनके मुख से निकले शब्दों ने मौन का सर्जन किया, इसीलिए तो वे मौन की प्रतिमूर्ति कहे जाते हैं। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि चुप रहने से व्यक्ति की मानसिक शक्ति बढ़ती है जो कार्यक्षमता और सूक्ष्मदर्शिता को कई गुना बढ़ा देती है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में भी ‘मौन’ की महत्ता प्रमाणित

जानना दिलचस्प हो कि अब आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी मौन के महत्व को प्रमाणित कर चुका है। जहां शोर उच्च रक्तचाप, सरदर्द और हृदयरोग इत्यादि देता है वहीं मौन इन सबके लिए औषधि का कार्य करता है। वैज्ञानिक शोधों से प्रमाणित हो चुका है कि एक व्यक्ति की शारीरिक रूप से आठ घंटे तक श्रम करने में जितनी ऊर्जा व्यय होती है, उतनी मात्र घंटा भर बोलने में खर्च हो जाती है।

मौनी अमावस्या के दिन अमृतमय हो जाता है संगम का कण कण

सुखद संयोग है कि इस वर्ष 144 वर्षों बाद तीर्थराज प्रयाग में आयोजित सनातन आस्था के इस विराट समागम में देश दुनिया के श्रद्धालुओं का अपार जनसमूह उमड़ रहा है। इस वर्ष महाकुम्भ के दूसरे अमृत स्नान में 10 करोड़ लोगों के द्वारा आस्था की डुबकी लगाने की संभावना है। मौनी अमावस्या के अमृत स्नान की महत्ता के बारे में देश के जाने माने ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय का कहना है कि मौनी अमावस्या के दिन आकाश से ग्रह-नक्षत्रों की रश्मियां एवं सूर्य की किरण जल में पड़ने से जल सहित संगम का प्रत्येक कण अमृतमय हो जाता है, जो स्नानार्थियों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास करने के साथ उनके जीवन की पीड़ाओं को मुक्त कर, उनके पितरों को तारने की क्षमता रखता है। उनके अनुसार इस वर्ष मौनी अमावस्या पर बहुत ही शुभ योग का निर्माण हो रहा है। इस बार मकर राशि में एक साथ सूर्य, बुध और चंद्रमा की युति होगी जिससे त्रिवेणी योग का निर्माण होगा। इस योग में मौन रहकर गंगा स्नान और दान करने का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार माघ माह की मौनी अमावस्या तिथि 28 जनवरी को शाम 07 बजकर 32 मिनट से शुरू होकर 29 जनवरी को शाम 06 बजकर 05 मिनट पर खत्म होगी। अतः उदया तिथि की मान्यता के अनुसार स्नान-दान का यह महापर्व 29 जनवरी को मनाया जाएगा।

मौनी अमावस्‍या के दिन संगम में स्‍नान करने आते हैं पितृगण

देश के जाने माने भागवत कथा वाचक देवकीनंदन ठाकुर कहते हैं कि शास्‍त्रों में इस बात के उल्‍लेख मिलतेहैं कि जहां माघ की संक्रांति काल में देवगण प्रयाग के त्रिवेणी घाट पर आकर अदृश्‍य रूप से संगम में स्‍नान करते हैं, वहीं मौनी अमावस्‍या के दिन पितृगण संगम में स्‍नान करने आते हैं। इस दिन मौन व्रत रखकर किया गया गंगा स्नान व जप, तप, ध्यान व हवन पूजन कई गुना पुण्यफल देता है। इस कारण इस दिन मन, कर्म तथा वाणी से किसी के लिए भी अशुभ नहीं सोचना चाहिए। उनके मुताबिक इस दिन गायत्री महामंत्र के आलावा ‘’ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम: ‘’ तथा “ॐ नम: शिवाय “मंत्र का मौन जप महान पुण्यफलदायी होता है।

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