जावेद अख्तर 'चंद्रलोक' पर तो बोलते हैं लेकिन 'तलवार द्वारा चांद के दो टुकड़े' किये जाने पर नहीं
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जावेद अख्तर ‘चंद्रलोक’ पर तो बोलते हैं लेकिन ‘तलवार द्वारा चांद के दो टुकड़े’ किये जाने पर नहीं

जावेद अख्तर ने कहा कि 20वीं और 21वीं सदी के लोग स्प्लिट पर्सनैलिटी वाले हैं। उन्होंने चांद का उदाहरण देकर कहा कि इसरो के वैज्ञानिक वहां रॉकेट भेज देते हैं, लोग चांद को चंद्रलोक भी मानते हैं और रॉकेट पहुंचने पर मंदिर में जाकर प्रार्थना करने लगते हैं।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Sep 3, 2024, 10:58 am IST
in मत अभिमत
जावेद अख्तर (फाइल चित्र )

जावेद अख्तर (फाइल चित्र )

जावेद अख्तर ने पिछले दिनों धर्म को लेकर बयान दिया। जावेद अख्तर स्वयं को नास्तिक कहते हैं और कई बार वे ऐसे वक्तव्य देते रहते हैं, जिससे उन्हें संतुलित माना जाए, मगर संतुलन की यह प्रक्रिया भी उनकी सच्चाई नहीं छिपा पाती है। उनका हिन्दू विरोधी चेहरा जो अमूनन फिल्मों से हमेशा झाँकता आया, वह भी हिंदुओं के खिलाफ इतना महीन नैरेटिव था कि वह अब जाकर समझ आता है।

जावेद अख्तर ने मुंबई में आयोजित एक समारोह में धर्म पर बात करते हुए कहा, ’20वीं और 21वीं सदी के लोग स्प्लिट पर्सनैलिटी वाले हैं। उन्होंने चांद का उदाहरण देकर कहा कि इसरो के वैज्ञानिक वहां रॉकेट भेज देते हैं, लोग चांद को चंद्रलोक भी मानते हैं और रॉकेट पहुंचने पर मंदिर में जाकर प्रार्थना भी करने लगते हैं।’

जावेद अख्तर दरअसल इसरो के वैज्ञानिकों की धार्मिक आस्था पर बात कर रहे थे। जावेद अख्तर खुद को नास्तिक कहते हैं और वे कम्युनिस्ट भी लगते हैं, मगर फिर भी उनकी सारी वैज्ञानिकता की दलीलें हिन्दू धर्म को बदनाम करने के इर्दगिर्द घूमती रहती हैं। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार जावेद आखर ने कहा कि ‘भारत में ISRO (इसरो) से एक आदमी जो कि चांद के एक हिस्से पर रॉकेट भेज सकता है…लेकिन चांद पर तो चंद्रलोक है, देवी-देवता रहा करते थे, आप वहां रॉकेट भेज रहे हो और जैसे ही पहुंच जाता है आप मंदिर चले जाते हो। यह स्किट्सफ्रीनिया है। मानव इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब आपका ज्ञान और सूचना और आपके धर्म की सोच नहीं मिल रही।’

आखिर जावेद अख्तर को आस्था से समस्या क्या है? जावेद अख्तर को इस बात से समस्या है कि भारत के जो भी स्पेस अभियान आरंभ हुए हैं या चलते हैं, उनमें लोग धार्मिक आस्था का भी प्रयोग करते हैं। जावेद अख्तर को इस बात पर आपत्ति है कि वैज्ञानिक मंदिरों में क्यों जाते हैं? मंदिरों के खिलाफ तो उनकी फिल्मों में विमर्श है । जब बात मंदिरों की होती है, तो जावेद अख्तर की मंदिरों से घृणा उनकी फिल्मों से भी झलककर सामने आती है। बात फिल्म शोले की। शोले फिल्म आज तक उतनी ही पसंद की जाती है, जितनी उस समय की जाती थी। मगर उस फिल्म में भी मंदिर को लड़की को वश में करने का स्थान और मस्जिद को पवित्र स्थान दिखाया गया।

इस फिल्म में बसंती को प्रेम जाल में फंसाने के लिए वीरू जाता है और भगवान की प्रतिमा के पीछे से भगवान बनकर आवाज निकालता है। मगर वहीं पूरे गाँव में एक मस्जिद है और उस मस्जिद में ऐसी कोई हरकत नहीं होती। मस्जिद में बेनागा नमाज आदि होती है। पूरे गाँव में एक ही सबसे जहीन परिवार है और वह है रहीम चाचा।

सलीम-जावेद की फिल्मों ने मंदिरों के विरुद्ध जो एजेंडा चलाया, वह चूंकि सफल नहीं हुआ, इसीलिए जावेद अख्तर अब उन वैज्ञानिकों को कोसने पर उतर आए हैं, जो भारत का नाम सारे विश्व में अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों के माध्यम से फैला रहे हैं। सलीम-जावेद की सबसे हिट फिल्मों में जंजीर और दीवार मानी जाती हैं। दीवार फिल्म और बिल्ला नंबर 786 सभी को याद होगा। और साथ ही यह भी याद होगा कि अमिताभ बच्चन का किरदार हमेशा ही मंदिर जाने से कतराता था। फिल्म में निरूपा रॉय ने विजय की माँ का किरदार निभाया है। निरूपा रॉय मंदिर जाती हैं, मगर अमिताभ बच्चन अर्थात विजय मंदिर नहीं जाता है।

विजय के किरदार को फिर बिल्ला नंबर 786 का महत्व समझाने के लिए रहीम चाचा आते हैं। वे विजय को प्रेरित करते हैं कि वह बिल्ला नंबर 786 हमेशा अपने साथ रखे। फिर उसके बारे में तमाम बातें बताते हैं और साथ ही विजय की मौत इसी कारण होती है कि वह बिल्ला नंबर 786 उसके हाथ से छूटकर उसकी पहुँच से दूर हो जाता है। और फिर विजय अंतिम समय में मंदिर जाता है। हताश, निराश और टूटा हुआ। सलीम-जावेद की जोड़ी ने हमेशा मंदिरों को नैराश्य स्थल के रूप में प्रतिस्थापित करने का प्रयास किया। हालांकि जावेद अख्तर “ओ पालनहारे” लिखकर बैलेंस भी बनाते हुए दिखाई दिए, मगर लगान फिल्म में जब श्रीकृष्ण के साकार रूप से प्रार्थना की जा रही है, तो उन्हें भजन में “निर्गुण” बताकर क्या स्थापित किया जा रहा है। हालांकि इसके लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि श्रीकृष्ण तो साकार और निराकार की परिभाषा से परे हैं।

परंतु फिर भी जब जावेद अख्तर वैज्ञानिकों द्वारा मंदिर जाने पर अपनी खीज प्रकट करते हैं, तो यह खीज और घृणा इसलिए नहीं है कि वैज्ञानिक मंदिर जा रहे हैं, बल्कि इसलिए है कि कम्युनिस्ट फिल्मों के माध्यम से एक सुनियोजित हिन्दू घृणा फैलाने के बाद भी भारत की आम जनता और वैज्ञानिक भी मंदिर जा रहे हैं। वही मंदिर जो जावेद अख्तर की फिल्मों के अनुसार लड़की को वश में करने वाले हैं, जहां पर जाकर मौत होती है और बिल्ला नंबर 786 ज़िंदगी बचाता है, आज भी असंख्य लोगों की आस्था का केंद्र बने हुए हैं।

होली के जिस पर्व को जावेद अख्तर जैसे लोगों ने केवल लड़की छेड़ने जैसा अवसर बना दिया और लिख दिया “रंग बरसे, भीगे चूनर वाली रंग बरसे!” और शोले फिल्म में होली को लड़की पटाने का अवसर दिखाया, फिर भी अभी तक लोग होली क्यों मना रहे हैं? जावेद अख्तर की खीज इसीलिए है कि बिल्ला 786 और मस्जिद को महान बताने वाला उनका एजेंडा लोग समझने लगे हैं और जावेद अख्तर के एजेंडे को समझने लगे हैं। खुलकर आस्था का प्रदर्शन करते हैं, वही आस्था जिस पर वे मनोरंजन के नाम पर प्रहार करते आ रहे थे।

क्योंकि यदि वे सच्चे अर्थों में नास्तिक होते तो चंद्र लोक के साथ यह भी उल्लेख कर सकते थे कि कैसे एक विश्वास चाँद के तलवार द्वारा दो टुकड़े किये जाने की बात करता है।

 

Topics: रहीम चाचासनातन धर्ममंदिरमस्जिदहिंदू धर्मविजयइसरोजावेद अख्तरशोले फिल्म
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