पाकिस्तान में छूटे अपने कई रिश्तेदारों की तलवारों से काटकर मौत के घाट उतार दिए जाने की खबरें बाद में भी सुनने को मिलती रहीं। फौज की मदद से बाद में पिता सरदार जसवंत सिंह अपने गांव गए तो वहां हमारी कोठी,जमीन, दुकान पर मुसलमानों का कब्जा हो चुका था।
सरदार सुरजीत सिंह
निडाला (पाकिस्तान)
मैं अविभाजित भारत में सियालकोट जिले के निडाला कस्बे में रहता था। हमारे परिवार की हर तरफ अच्छी धाक थी। दादा सरदार लाभ सिंह और पिता सरदार जसवंत सिंह वहां किराने के बड़े कारोबारी थे। परिवार शानदार कोठी में रहता था, लेकिन बंटवारे की घोषणा होते ही सब कुछ खत्म हो गया।
बंटवारे के समय मेरी उम्र महज छह साल थी। जब भी पुरानी तस्वीरें मन में ताजा होती हैं, शरीर कांप उठता है। बंटवारे से पहले हमारा परिवार अपने कस्बे के अमीरों में से एक था, लेकिन सब कुछ वहीं खत्म हो गया। पाकिस्तान में चल-अचल संपत्ति गंवाने के बाद हमारे परिवार को जम्मू-कश्मीर के तवी कैंप में रहने को ठिकाना मिला था।
पाकिस्तान में छूटे अपने कई रिश्तेदारों की तलवारों से काटकर मौत के घाट उतार दिए जाने की खबरें बाद में भी सुनने को मिलती रहीं। फौज की मदद से बाद में मेरे पिता सरदार जसवंत सिंह अपने गांव गए तो वहां हमारी कोठी,जमीन, दुकान पर मुसलमानों का कब्जा हो चुका था। बचपन में अपने घर में हमने समृद्धि देखी थी, लेकिन फिर पूरा परिवार सड़क पर आ गया। कश्मीर कैंप से परिवार बाद में बरेली आकर बस गया।
गुजर-बसर को बहुत मेहनत की और फिर से खुशहाली का रास्ता तय किया। रा.स्व. संघ परिवार ने बरेली में पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए लोगों की हर संभव सहायता की। जीवन की कहानी अब बहुत आगे बढ़ चुकी है, लेकिन बंटवारे में मिले जख्म शायद ही कभी भर पाएंगे।
(लेखक – अरुण कुमार सिंह, अश्वनी मिश्रा, दिनेश मानसेरा एवं अनुरोध भारद्वाज)
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