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होम भारत

आहत हिंदुओं का सहारा बने स्वयंसेवक

1934 में पंजाब में संघ ने जब काम शुरू किया था, तब परिस्थितियां प्रतिकूल थीं। मात्र 10 वर्ष में ही पूरे पंजाब के चप्पे-चप्पे तक स्वयंसेवकों की फौज खड़ी हो गई, जो विभाजन के दौरान हिंदुओं के लिए देवदूत बनकर आए और उन्हें हर तरह की मदद की

Written byमाणिक चंद्र वाजपेयी एवं श्रीधर पराडकरमाणिक चंद्र वाजपेयी एवं श्रीधर पराडकर
Aug 12, 2024, 09:02 am IST
in भारत, विश्लेषण
एक राहत शिविर

एक राहत शिविर

अविभाजित पंजाब में जब संघ का कार्य शुरू हुआ, तब वहां का हिंदू समाज असंगठित था। हिंदुओं के मंदिरों को तोड़ना, भ्रष्ट करना, स्त्रियों का अपहरण, कन्वर्जन आदि घटनाओं के रूप में मुसलमानों के आक्रमण हिंदू समाज पर प्राय: होते रहते थे। मुस्लिम संगठित थे और हिंदू असंगठित होने के कारण उनके अत्याचारों के शिकार होते रहते थे। मुसलमानों के अत्याचारों से रक्षा के लिए हिंदू समाज की ओर से कोई सामूहिक प्रयत्न की योजना नहीं थी। अपने-अपने संप्रदाय, जाति, उपासना मार्ग और छोटे स्तर पर बिरादरियों के आधार पर आत्मरक्षा के उपाय किए जाते थे। हिंदू संगठन के काम को तो सांप्रदायिक कह कर उसकी निंदा की जाती थी।

पंजाब में मुस्लिम लीग काफी प्रभावी थी। लाहौर व अमृतसर उसकी गतिविधियों के केंद्र थे। उसका सैनिक संगठन था-मुस्लिम नेशनल गार्ड्स। इसके अलावा ‘खाकसार दल’ भी प्रभावी सैनिक संगठन था। इसकी शाखाएं सारे पंजाब में थीं। इसे सामान्यजन बेलचा पार्टी कहते थे, क्योंकि ये बेलचा लेकर ही प्रदर्शन व कार्यक्रम करते थे। ‘अहरार पार्टी’ भी मुसलमानों की एक अन्य प्रभावी संस्था थी। यद्यपि ये संस्थाएं अलग-अलग थीं, परंतु सभी मिलकर मुसलमानों के दिलों में हिंदुओं के प्रति घृणा के भाव पैदा कर रही थीं। हिंदुओं में आर्य समाज अत्यंत प्रभावी था। उसने ही पंजाब में युवकों को पहले से ही हिंदुत्व के विचारों से ओत-प्रोत कर रखा था। इसका लाभ संघ के विस्तार में भरपूर मिला। सनातन धर्म सभा ने भी काम किया था। पंजाब की खराब स्थिति देखकर डॉ. हेडगेवार ने 1937 में तीन तरुण प्रचारकों को पंजाब भेजा। के.डी. जोशी को स्यालकोट, दिगंबर पातुरकर (राजाभाऊ) को लाहौर और मोरेश्वर मुंजे को रावलपिंडी। इन तीनों ने अथक मेहनत और लगन से संघ कार्यों का विस्तार किया। इस तरह 1934 में संघ सेवा कार्य का जो बीज रोपा गया था, 10 वर्ष में वह वट वृक्ष बनकर समूचे पंजाब में फैल गया।

70-70 घंटे कर्फ्यू

विभाजन के समय पंजाब के दंगा पीड़ितों की सहायता के लिए दो संस्थाएं कार्यरत थीं। इनमें एक थी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों द्वारा गठित ‘पंजाब रिलीफ कमेटी’। इसका गठन उस समय हुआ था, जब मार्च 1946 में पश्चिम और पश्चिमोत्तर प्रांतों से हिंदू लुट-पिट कर लाहौर की ओर आ रहे थे या शरणार्थी शिविरों में शरण लिए हुए थे। उन्हें सब प्रकार की सहायता की आवश्यकता थी, क्योंकि बिना कुछ सामान व धन लिए उन्हें पाकिस्तान से भागना पड़ा था। अधिकांश तो मात्र तीन वस्त्रों में ही थे। शिविरों में अन्न, वस्त्र, औषधि, पौष्टिक आहार और सेवा कार्यों की बहुत आवश्यकता थी। सरकार की ओर से कुछ स्थानों को छोड़कर और कोई प्रबंध नहीं था। 70-70 घंटे के कर्फ्यू लगते थे। उस समय नन्हें-मुन्नों को दूध, दवाई, भोजन की व्यवस्था स्वयंसेवक करते थे। धीरे-धीरे कमेटी का कार्यक्षेत्र बढ़ता गया। निर्वासितों की सेवा के अलावा समिति को कई अन्य दायित्व भी निभाने पड़ रहे थे। जैसे-दंगों के दौरान संकटग्रस्त क्षेत्रों में फंसी महिलाओं, बच्चों व बूढ़ों को निकाल कर शिविरों या सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना, मुहल्लों में जान हथेली पर रखकर पहुंचना, वहां फंसे अपने भाइयों को संरक्षण देना, हमलावरों को सबक सिखाना तथा घायलों को अस्पताल ले जाकर उनके उपचार की व्यवस्था करना। मृतकों के शवों का अंतिम संस्कार करना। आग बुझाने के साधन उपलब्ध कराना। सेना की सहायता से अपहृत महिलाओं को अपहर्ताओं के कब्जे से छुड़ाकर लाना आदि।

रिलीफ कमेटी ने अनेक विभाग स्थापित किए थे, जैसे-संग्रह विभाग, सेवा विभाग, यातायात विभाग, शिविरों में सामान पहुंचाने और वहां की व्यवस्था का विभाग। बड़ी संख्या में लोगों का कत्ल किया जा रहा था। आतंकवाद इतना अधिक था कि परिवार व मुहल्ले वाले अंत्येष्टि के लिए शव श्मशान ले जाने में भी डरते थे। इसलिए स्वयंसेवकों ने शवदाह विभाग भी खोला था। इसमें कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के पास ट्रक भी थे। जहां से फोन आता, कार्यकर्ता वहां पहुंच जाते थे। शवदाह के लिए रावी के निकट स्थित श्मशान घाट पर लकड़ियों की व्यवस्था की गई थी। जिस घर में शव होने की सूचना मिलती, 10-10 की टोलियों में स्वयंसेवक तुरंत पहुंच जाते थे तथा विधिवत क्रियाकर्म करवा कर परिवार वालों को सुरक्षित घर पहुंचाते थे। इससे समाज को बड़ी राहत मिलती थी। वहीं, विविध कार्यों में लगे स्वयंसेवकों को अपनी कोई चिंता नहीं रहती थी। बस उन्हें सौंपा गया काम ही उनकी प्राथमिकता रहती थी। वे सबेरे निकलते थे और कभी-कभी तो उन्हें शाम तक भोजन आदि के दर्शन भी नहीं होते थे।

हजारों विस्थापितों को भोजन

20 अगस्त को शकरगढ़ तहसील और गांवों में गड़बड़ शुरू हो गई, तो वहां के हिंदू गुरुदासपुर आ गए। उन्हें पत्तन नदी पार कराने में पंजाब रिलीफ कमेटी ने मदद की। गुरुदासपुर मंडी में लगभग 4,000 विस्थापितों के लिए शिविर स्थापित किया और सबके लिए भोजन आदि का प्रबंध भी किया। 15 दिन तक यह व्यवस्था रही। इतने दिन में लोग अपनी-अपनी सुविधा के स्थानों पर चले गए या बसा दिए गए। इसी तरह, धर्मवाल में भी सहायता समिति का काम चल रहा था। वहां भी नांगेवाल और शकरगढ़ के लोग आए थे। वहीं, समिति के बटाला शिविर में सितंबर तक 1,000 लोगों को भोजन आदि उपलब्ध कराया गया।

डेराबाबा नानक में विस्थापितों का भार अधिक था। वहां के स्वयंसेवकों का पूरा ध्यान समिति के माध्यम से उनकी सेवा की ओर था। वहां से विस्थापितों की कम से कम एक ट्रेन रोज अमृतसर के लिए जाती थी। स्टेशन पर भोजन का पूरा प्रबंध रिलीफ कमेटी की ओर से होता था। इस शहर में 25,000 विस्थापित शिविरों में रहते थे। फिरोजपुर जिले के अबोहर में अप्रैल 1947 में रिलीफ कमेटी का गठन किया गया था। वहां बहावलपुर की मुस्लिम रियासत से विस्थापित लोग आ रहे थे। कमेटी ने हर प्रकार से उनकी सहायता की। जो आगे जाना चाहते थे, उन्हें स्टेशन ही नहीं पहुंचाया जाता था, बल्कि रास्ते के खर्च, किराये आदि की व्यवस्था भी की जाती। बच्चों के लिए लंगर में दूध का प्रबंध होता था। गर्भवती स्त्रियों के प्रसव की व्यवस्था की जाती थी तथा उन्हें पौष्टिक आहार उपलब्ध कराया जाता था।

इसी तरह, फिरोजपुर छावनी की रिलीफ कमेटी के अनुसार फिरोजपुर कमेटी द्वारा हर प्रकार की सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही थीं। स्वयंसेवक रोटियां एकत्रित कर स्टेशन पर पहुंचाते थे और नगर में स्थापित दो शिविरों में भी भेजते थे। एक लंगर अनाज मंडी में खोला गया था। वहां 60,000 लोगों को 15 दिन तक भोजन कराया गया, 25,000 को बर्तन, 200 कंबल और 2,000 मिट्टी के घड़े जरूरतमंदों को दिए गए। मुर्दों को कफन, लकड़ियां और बीमारों को औषधियां भी उपलब्ध कराई गईं। 20 लोगों को नौकरियां भी दिलाई गईं। अनाथों की देखभाल की गई। कई परिवार बसाए गए। कई को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए आवश्यक धन व सामग्री मुहैया कराई गई।

पंजाब सहायता समिति के शिविर पूर्वी पंजाब में फिरोजपुर, तरनतारन, गुरुदासपुर, मंडी, जलालाबाद, मुक्तसर, मोगा, जींद, तलवंडी, फाजिल्का, अम्बाला, अबोहर, जालंधर, गुड़गांव, पठानकोट, जम्मू आदि में भी स्थापित किए गए थे। राहत कार्यों की देख-रेख और अपहृत महिलाओं को निकालकर लाने के लिए केंद्र सरकार ने मृदुला साराभाई को नियुक्त किया था। वे तरनतारन में रिलीफ कमेटी द्वारा स्थापित सहायता केंद्र को देखने स्वयं आयी थीं। वहां स्वयंसेवकों की लगन, प्रामाणिकता, सेवा भावना व अनुशासन को देखकर वे अत्यंत प्रभावित हुई थीं तथा केंद्र को सहायता दिलवाने का आश्वासन दिया था। साथ ही उन्होंने वहां की समिति को प्रशस्ति पत्र भी दिया था।

इसी तरह, जम्मू-कश्मीर में पं. प्रेमनाथ डोगरा की अध्यक्षता में भी एक समिति गठित की गई थी। जम्मू-कश्मीर सहायता समिति द्वारा 15 मार्च, 1947 से 10 अक्तूबर, 1947 तक लगभग तीन लाख लोगों को किसी न किसी प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई गई और सैकड़ों परिवारों को बसाया गया। जम्मू से लेकर कठुआ तक 20 सहायता शिविर चल रहे थे। यहां की समिति के कार्यकर्ताओं ने लगभग 30,000 पंजाबी मुसलमानों की भी सहायता की। स्वयंसेवकों ने न केवल उनके लिए भोजन आदि की व्यवस्था की, अपितु उन्हें कठुआ सीमा से सुरक्षित पाकिस्तान भी पहुंचाया। पाकिस्तान से आने वाली हर ट्रेन पर स्वयंसेवकों की टोलियां रहती थीं। ज्योंही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकती थी, लोगों का जो भी थोड़ा-बहुत सामान होता, उसे स्वयंसेवक उतारते व बाहर रख देते। फिर उन्हीं पर आने वाले लोगों को बैठा देते थे। मंडी में लाला लक्ष्मणदास की सराय में भोजन बनता था। दिनभर लंगर चलता रहता था। वहां बच्चों के लिए दूध तथा रोगियों के लिए औषधि का भी प्रबंध रहता था।

पाकिस्तान में हिंदुओं पर बढ़ते हमलों को देखते हुए उनकी सुरक्षा के लिए स्वयंसेवकों को शस्त्रों की आवश्यकता महसूस हुई। इसके लिए समाज के अन्यान्य लोगों से संपर्क किया गया। लाहौर के एक स्वामी सत्यानंद जी थे, जो स्वयंसेवकों से स्नेह रखते थे और कभी-कभार उत्सव आदि में भी आए थे। वे अपरिग्रही थे, पैसे को छूते भी नहीं थे। जब स्वयंसेवकों ने उन्हें अपनी कठिनाई बताई और कहा कि 15,000 रुपये की आवश्यकता है, तो उन्होंने दूसरे दिन आने को कहा। दूसरे दिन जब स्वयंसेवक वहां पहुंचे तो स्वामी जी ने आलमारी की ओर इशारा किया। स्वयंसेवकों ने आलमारी खोली तो उनके आश्चर्य और आनंद का ठिकाना न रहा। उन्होंने देखा कि आलमारी में 15,000 रुपयों के नोटों के बंडल रखे हुए थे।

 ‘‘मैं अमृतसर से आया हूं। मेरे माता-पिता को सिखों ने काट डाला है। मैं बचकर भाग आया हूं। मुझे नवांकोट जाना है। वहां मेरे रिश्तेदार रहते हैं। पर मुझे पता नहीं नवांकोट कहां है। मैं वहां कैसे पहुंचूं?’’ -इंद्रजीत

भीमसेन सच्चर पंजाब कांग्रेस के बड़े नेता थे। मुस्लिम गुंडे उन्हें धमकी दे रहे थे। उन्हें अपनी जान-माल पर खतरा मंडराता नजर आ रहा था। संघ अधिकारियों को जब पता चला तो उनकी सुरक्षा हेतु उनकी कोठी पर स्वयंसेवक तैनात कर दिए। 4-4 स्वयंसेवक बारी-बारी से उनकी कोठी पर पहरा देते थे। सच्चर साहब को बिना बताए यह व्यवस्था की गई थी। वैसे तो पाकिस्तान से हिंदुओं को सैनिक सुरक्षा में भारत भेजा जा रहा था। बलोच सेना अत्यंत क्रूर थी। दुर्भाग्य से जब बलोच सेना की बारी आती तो वह रक्षक की जगह भक्षक बन जाती थी। स्वयंसेवकों ने सभी को आगाह कर दिया था कि कोई बलोच सेना के संरक्षण में भारत की ओर न जाए, फिर भी कई बार लोग धोखे में आ जाते थे।

17 सितंबर की बात है। एक बलोच फौजी टुकड़ी ट्रक में आई और भारत जाने के लिए एकत्रित हिंदू महिलाओं से कहा कि अपना जो सामान लेना है, उसे लेकर ट्रक मे बैठ जाओ। तुम्हें तुम्हारे आदमियों के ट्रकों के साथ में ले जाना है। बेचारी महिलाएं अपने आभूषण आदि लेकर ट्रक में बैठ गई। लेकिन ट्रक अमृतसर जाने की बजाए शहीदगंज गुरुद्वारे की ओर चल पड़ा। स्वयंसेवकों ने तुरंत इसकी सूचना गोरखा टुकड़ी को दी। स्वयंसेवकों को साथ लेकर गोरखा सैनिकों ने बलोच सैनिकों के ट्रक का पीछा किया। बलोच सैनिक ट्रक को शहीदगंज गुरुद्वारा होते हुए मिंटो पार्क की ओर ले गए। उन्होंने पुल के नीचे ट्रक खड़ा कर महिलाओं के गहने छीन लिए। तब तक आसपास गुंडे जमा हो गए थे। बलोच सैनिक अभी महिलाओं को उन गुंडों को सौंपने ही वाले थे कि गोरखा सैनिक पहुंच गए। महिलाएं तो बच गर्इं, पर बलोच सैनिक उनके गहने लेकर भाग गए।

बाल स्वयंसेवक भी पीछे नहीं

उन दिनों तरुण ही नहीं, बाल स्वयंसेवकों ने भी कमाल के साहस व सूझ-बूझ का परिचय दिया था। लाहौर में मुल्तान रोड पर एक सायं शाखा थी-रामनगर। उसके मुख्य शिक्षक सेवाराम और कार्यवाह मदनमोहन थे। इसी शाखा में आठवीं कक्षा का एक बाल स्वयंसेवक था-इंद्रजीत। सूचना मिली कि नवांकोट में मुसलमानों ने हथियारों का जखीरा इकट्ठा कर रखा है और वे उसका उपयोग हिंदुओं के विरुद्ध करने वाले हैं। लेकिन हथियार कहां रखे गए थे, इसकी जानकारी नहीं थी ताकि उसे पकड़वाया जा सके। इंद्रजीत को यह दायित्व सौंपा गया। उसने गजब की युक्ति निकाली। अपने कपड़े फाड़ डाले और स्टेशन पर जाकर रोने लगा, ‘‘मैं अमृतसर से आया हूं। मेरे माता-पिता को सिखों ने काट डाला है। मैं बचकर भाग आया हूं। मुझे नवांकोट जाना है। वहां मेरे रिश्तेदार रहते हैं। पर मुझे पता नहीं नवांकोट कहां है। मैं वहां कैसे पहुंचूं?’’

नेशनल गार्ड के लोगों ने पहले उसे भोजन कराया, फिर उसे नवांकोट ले गए। वहां वह तीन-चार दिन रहा और लीगियों के साथ इधर-उधर घूमा। उसने उस जगह का पता लगा लिया, जहां हथियार रखे गए थे। दरअसल, इंद्रजीत को अनाथ मुस्लिम बालक समझकर वहीं रखा गया था। तीन-चार दिन इधर-उधर घूमने के बाद वह यह कहकर वापस आ गया कि उसके रिश्तेदार नहीं मिले। वापस लौटकर उसने सारा भेद गुप्तचर टोली के प्रमुख हरबंसलाल को बता दिया। हरबंसलाल का वहां पदस्थ डोगरा सेना की टुकड़ी के प्रमुख से अच्छा परिचय था। वे उस टुकड़ी को लेकर इंद्रजीत के बताए स्थान पर गए और हथियारों का जखीरा पकड़ा गया।
(लेखक-द्वय की पुस्तक ‘ज्योति जला निज प्राण की’ के संपादित अंश)

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