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पीओजेके मांगे आजादी

पाकिस्तान ने अधिक्रांत कश्मीर के लोगों की बातें मानकर फिलहाल तो एक बड़े संकट को टाल दिया है। लेकिन शांति की यह कीमत कितने दिनों के लिए पर्याप्त होगी, यह देखने की बात है

Written byPanchjanyaPanchjanya
May 20, 2024, 02:17 pm IST
in विश्व, विश्लेषण, जम्‍मू एवं कश्‍मीर
पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के मुजफ्फराबाद में सड़कों पर उतरे हजारों प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान सरकार को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया

पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के मुजफ्फराबाद में सड़कों पर उतरे हजारों प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान सरकार को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया

बात चाहे जम्मू-कश्मीर की हो या फिर पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (पीओजेके) की, पिछले 10 साल के दौरान स्थितियां सिर के बल खड़ी हो गई हैं। आजादी के जिस तरह के नारे कभी जम्मू-कश्मीर में लगा करते थे, अब वे पीओजेके में लग रहे हैं।
खास तौर से 10 मई से लेकर 13 मई के बीच वहां जो हालात रहे, उससे दो बातें साफ हो गई हैं। पहली, फौज के बूते वहां के लोगों की आवाज को दबाने की रणनीति पाकिस्तान के लिए विस्फोटक साबित हो सकती है। दूसरी, फिलहाल तो किसी तरह लोगों की मांगों को मानकर पाकिस्तान ने विद्रोह को शांत करने में मोटे तौर पर सफलता पा ली है, लेकिन पाकिस्तान के आर्थिक और राजनीतिक हालात को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यह ‘शांति’ अस्थायी है और दशकों से भरे-बैठे लोगों का गुस्सा कभी भी एक चिंगारी से भड़क सकता है।

जबर्दस्त विरोध

आखिर पीओजेके में हुआ क्या? पीओजेके के लिए 11 से 13 मई तक का समय भारी रहा। सबसे पहले बात 11 मई की। नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन जम्मू कश्मीर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (जैक) ने पीओजेके में बुनियादी सुविधाओं की कमी, महंगी बिजली और गेहूं की सब्सिडी में कमी के खिलाफ प्रदर्शन का आह्वान कर पीओजेके की राजधानी मुजफ्फराबाद तक रैली निकालने का ऐलान किया था। पाकिस्तान ने आदत के अनुसार, जोर-जबर्दस्ती से मामले को दबाने की कोशिशों के तहत 11 मई को स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद जो हुआ उसका अनुमान सोशल मीडिया पर वायरल कई अपुष्ट वीडियो से लगाया जा सकता है।

जैसे ही सुरक्षाबलों द्वारा स्थानीय नेताओं की गिरफ्तारी और उनके साथ दुर्व्यवहार की बात फैली, लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर निकल आए और नारेबाजी करने लगे। तब भी सुरक्षाबलों को एहसास नहीं हुआ कि वे किस तरह की स्थिति को हवा दे रहे हैं। कई जगहों पर बेरहमी से लोगों को पीटा गया और फायरिंग भी हुई। मुजफ्फराबाद में आवासीय क्षेत्रों में पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े, जिसमें महिलाओं-बच्चों समेत कई लोग घायल हो गए। बेला नूर शाह इलाके में पुलिस ने एक ट्रांसफॉर्मर को उड़ा दिया, जिससे पूरा इलाका अंधेरे में डूब गया। इसके बाद प्रदर्शनकारी उग्र हो गए और उन्होंने पुलिस वाहन को तोड़ डाला। मुजफ्फराबाद में ही एक पुलिसकर्मी एक बच्चे पर टूट पड़ा और वहां मौजूद करीब 50 पुलिस वाले देखते रहे।

सहायक कमिश्नर को बंधक बनाया

जैसे-जैसे आम लोगों के खिलाफ हो रहे जुल्म की खबर फैली, लोगों का गुस्सा बढ़ता गया। कोटली के बरौनिया गांव में प्रदर्शनकारियों ने सहायक कमिश्नर को बंधक बना लिया। सहनसा में भी कई पुलिस अधिकारियों को लोगों ने बंधक बना लिया, जिन्हें बाद में प्रशासन के हवाले कर दिया गया। मीरपुर के अकालगढ़ में पुलिस फायरिंग में एक व्यक्ति की मौत हो गई और कई घायल हो गए। यहां प्रदर्शनकारियों की ओर से भी गोलियां चलाई गईं, जिसमें अदनान कुरैशी नाम का पुलिस अधिकारी मारा गया।

भारी फौज तैनात

11 मई के अनुभव के बाद पाकिस्तान ने फौज की भारी तैनाती कर दी। 50 वाहनों में सैनिक और 65 वाहनों में रेंजर्स को तैनात किया गया। साथ ही, बड़ी संख्या में कमांडो भी उतारे गए ताकि प्रदर्शन को काबू किया जा सके। लेकिन रावलकोट के बाहर संगोला गांव में बड़ी संख्या में लोगों ने फ्रंटियर कॉर्प्स की गाड़ियों को घेर लिया और दोनों ओर सड़कों को अवरुद्ध करके उन्हें एक तरह से बंधक बना लिया। उधर, गतिरोध खत्म करने के लिए सरकार के साथ ज्वाइंट एक्शन कमेटी की बातचीत बेनतीजा रही और कमेटी के नेता सरदार उमर नाजिर कश्मीरी ने मुजफ्फराबाद कूच का ऐलान कर दिया। सरकार ने आटे पर सब्सिडी मंजूर कर लोगों के गुस्से को ठंडा करने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने केवल इतने पर आंदोलन वापस लेने से इनकार कर दिया। 13 मई को कोहाला में प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान का झंडा उतारकर फेंक दिया। इसी दिन के एक वीडियो में पहाड़ी रास्ते पर सुरक्षाबलों के जवानों को पीट-पीटकर खदेड़ते आम लोग दिख रहे हैं। इसमें छह-सात वर्दी वालों को भागते देखा जा सकता है।

भारत में विलय के पोस्टर

पीओजेके में पाकिस्तान के लिए कैसी भावना भरी हुई है, इसका अनुमान इस पूरे प्रदर्शन के दौरान हुई कुछ बातों से लगाया जा सकता है। एक तो 11 मई को रावलकोट में एक पोस्टर चिपका दिया गया, जिसमें लिखा था कि पीओजेके का भारत के साथ विलय हो चुका है और उसके बाद वहां सैकड़ों लोगों ने नारेबाजी की। वहां के कई वीडियो वायरल हैं, जिनमें लोग आजादी के नारे लगा रहे हैं। इनमें लोगों को तरह-तरह के नारे लगाते सुना जा सकता है- ‘हम क्या चाहते हैं- आजादी’, ‘हम लेकर रहेंगे- आजादी’, ‘ये टुच्चे पुलिसवाले, ना भाई ना, ना भाई ना’, ‘ये पाकिस्तान की सरकार, ना भाई ना- ना भाई ना।’ एक प्रदर्शनकारी ने कहा- ‘‘ये लोग हमारा हक मारकर बैठे हैं। उनके हलक में हाथ डालकर हमें अपना हक लेना होगा। वे धमकी दे रहे हैं कि लाठीचार्ज करेंगे। मैं कहता हूं, करके दिखाओ।’’

इसलिए उपजा तनाव

प्रश्न यह है कि पिछले चंद वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि पीओजेके सुलगने लगा? इसकी मुख्य वजह यह है कि वहां के लोगों के सामने तुलना के लिए ऐसा जम्मू-कश्मीर था, जो कभी अशांत था। पाकिस्तान इस मामले में दोहरा खेल खेल रहा था। एक तो आतंकवाद के जरिये जम्मू-कश्मीर को अशांत करता और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पीओजेके में रहने वालों को संदेश देता कि वे बहुत अच्छी स्थिति में हैं। इसी कारण पीओजेके में कभी कोई जन आंदोलन नहीं हुआ। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। अनुच्छेद-370 और 35-ए हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में शांति है, चारों ओर से निवेश आ रहा है और वहां की खुशहाली देखकर पीओजेके के लोगों को महसूस होने लगा है कि इससे तो अच्छा था कि वे भारत के साथ रहते। उनका ध्यान इस ओर भी जा रहा है कि कैसे पंजाब के लिए सुख-सुविधा जुटाने के लिए पीओजेके के संसाधनों का दोहन हो रहा है और उन्हें उनका वाजिब हक नहीं दिया जा रहा है।

पाकिस्तान कुल 8,000 मेगावाट पनबिजली पैदा करता है, जिसमें 3,500 मेगावाट पीओजेके में बनती है। इसमें मंगला बांध (1,000 मेगावाट) और नीलम-झेलम परियोजना (969 मेगावाट) का सबसे अधिक योगदान है। पीओजेके में बनी बिजली को नेशनल ग्रिड में डालकर मुख्यत: पंजाब को भेज दिया जाता है। बिजली बनाने की लागत आती है 2 पाकिस्तानी रुपये प्रति यूनिट, जबकि इसे पीओजेके को बेचा जाता है 30 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से। इसके अलावा मंगला बांध समझौते के आधार पर पीओजेके प्रशासन को जो पानी पर रॉयल्टी मिलनी थी, वह 50 वर्ष से भी अधिक समय से नहीं दी जा रही, जो अरबों रुपये में होगी। अगर यह पैसा मिला होता तो इलाके में विकास की कई परियोजनाएं चलाई जा सकती थीं।

इसके साथ ही पाकिस्तान ने पीओजेके के लिए गेहूं को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है। पीओजेके के पहाड़ी भू-भाग गेहूं उत्पादन के लिए सही नहीं हैं और इसलिए पीओजेके को इसके लिए दूसरे इलाकों से होने वाली आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ता है। स्थिति यह है कि 40 किलो गेहूं की बोरी 3,100 पाकिस्तानी रुपये में मिलती है, जिसे खरीदना यहां की बड़ी आबादी के लिए संभव नहीं है। पाकिस्तान सरकार ने जरूरी खाद्य वस्तुओं पर सब्सिडी धीरे-धीरे खत्म कर दी, जिससे पीओजेके में संकट गहरा गया। आखिरकार ‘जैक’ को प्रदर्शन के लिए मजबूर होना पड़ा और जब प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने पीओजेके के लिए 23 अरब रुपये के पैकेज को मंजूरी दी तो मामला शांत हो गया। 13 मई को जारी अधिसूचना में घरेलू उपयोग के लिए बिजली की दरें 1 से लेकर 100 यूनिट के लिए 3 रुपये, 100 से 300 तक 5 रुपये और 300 यूनिट से ज्यादा खपत के लिए 6 रुपये प्रति यूनिट कर दी गई है। व्यापारिक प्रयोग के लिए बिजली दर 300 यूनिट तक के लिए 10 रुपये और उससे ज्यादा के लिए 15 रुपये प्रति यूनिट होगी। आटे की कीमत भी 77 रुपये प्रति किलो से घटाकर 50 रुपये प्रति किलो कर दी गई है।

पाकिस्तानी फौज ने सरकार विरोधी आवाजों को जोर-जबर्दस्ती से दबाने की कोशिश की और प्रदर्शन की खबरों को भी दबाया

क्या होगा आगे?

अब सवाल उठता है कि आगे क्या होगा? क्या पाकिस्तान सरकार इस तरह सब्सिडी देती रहेगी? पाकिस्तान की जो आर्थिक हालत है, उसमें तो यह मुश्किल ही लगता है। पाकिस्तान ऋण डिफॉल्ट से बचने के लिए अरसे से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से बात कर रहा है। आईएमएफ की एक से एक अपमानजनक शर्तों को मानने के बाद अभी दस दिन पहले 1.1 अरब डॉलर का ऋण मंजूर हुआ है। आईएमएफ की शर्तों के अनुसार, पाकिस्तान को जनता से ज्यादा टैक्स वसूलना है और हर तरह की सब्सिडी खत्म करनी है। इसका एक और आयाम है- जलवायु परिवर्तन का हानिकारक प्रभाव।

सितंबर 2022 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव ऐंटोनियो गुतेरेस ने पाकिस्तान का दौरा किया था। उस साल जुलाई-अगस्त के दौरान पाकिस्तान में 30 वर्ष के औसत की तुलना में 190 प्रतिशत और सिंध में तो 466 प्रतिशत अधिक बारिश हुई थी। इससे पाकिस्तान को लगभग 30 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था। तब गुतरेस ने कहा भी था कि जलवायु परिवर्तन का असर सब ओर हो रहा है, लेकिन इसका सबसे ज्यादा खामियाजा कम आय वाले देशों को उठाना पड़ता है। जाहिर है, पाकिस्तान जिस आर्थिक दुर्दशा में फंसा हुआ है, उसके लिए यह स्थिति कोढ़ में खाज के जैसी है। कहने का तात्पर्य है, पाकिस्तान ने जो पैकेज पीओजेके की आग को ठंडा करने के लिए दिया है, उसे लंबे समय तक जारी रखने के लिए लोहे के चने चबाने पड़ेंगे। अगर किसी तरह ये सुविधाएं जारी भी रखी गईं तो क्या गारंटी है कि अन्य कारक फिर से पीओजेके के लोगों को आंदोलन के लिए मजबूर नहीं करेंगे? चाहे वह जम्मू-कश्मीर में विकास और संपन्नता की आए दिन आती खबरों से उठने वाली कसक हो या दुबई में ज्यादातर पाकिस्तानी नेताओं के आलीशान बंगलों की बात सुनकर दिल में उठने वाली हूक? अगर पाकिस्तान ने पैकेज रोक दिया, फिर तो पीओजेके में ऐसी आग भड़केगी जिसे बुझाने में सरकार की चूलें हिल जाएंगी।

यानी इधर कुआं, उधर खाई!

साफ है, पाकिस्तान ने पीओजेके में जो शांति ‘खरीदी’ है, उसकी कीमत चुकाने की फिलहाल तो उसकी हैसियत नहीं है। अपने दमनकारी संस्थागत बर्ताव से उसने पीओजेके के संसाधनों से पंजाब के लिए ‘नखलिस्तान’ तैयार करने की जो नीति अपनाई है, उसके खिलाफ ज्वालामुखी की तरह सुलगते पीओजेके के लोगों के गुस्से ने अब लावा बनकर फूटने का रास्ता देख लिया है। जब भी दबाव बनेगा, लावा बाहर निकल आएगा। वह कितना आएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दबाव कैसा है। अंत महबूबा मुफ्ती की बातों से। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाए जाने की संभावना के बारे में उन्होंने कहा था, अगर ऐसा हुआ ‘तो जम्मू-कश्मीर में तिरंगे को कंधा देना वाला कोई नहीं मिलेगा।’ आज जम्मू-कश्मीर में कहां-कहां तिरंगा लहरा रहा है, यह दुनिया देख रही है। अब तो पीओजेके में भी तिरंगे को थामने वाले हाथ दिखने लगे हैं।

Topics: Article 370 from Jammu and Kashmirपाञ्चजन्य विशेषजम्मू-कश्मीर में विकासdevelopment in Jammu and Kashmirइधर कुआंअंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशकउधर खाईपीओजेकेPOJKpeaceशांतिजम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370
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