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पर्यावरण चिंतन: चिंता का सबब बनते धू-धूकर जलते जंगल, सुलगते वन, सिसकता पर्यावरण

जंगलों में लगी आग से चारों ओर धुआं फैलने से जहां बड़ी मात्रा में वन सम्पदा नष्ट हो रही है, वहीं इससे पर्यावरण दूषित होने के साथ-साथ लोगों को सांस लेने में भी परेशानी हो रही है।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल
Apr 22, 2024, 04:09 pm IST
inपर्यावरण

गर्मी की शुरुआत होते ही हर साल देश के विभिन्न राज्यों में जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ने लगती हैं। उत्तराखण्ड के पहाड़ी अंचलों के जंगलों में तो आग लगने के मामले निरंतर बढ़ रहे हैं। शुष्क मौसम के कारण वातावरण में नमी कम होने से जंगलों के धधकने का सिलसिला काफी तेज हो गया है और चिंता की बात यह है कि जंगल में आग लगने की ऐसी घटनाओं के बढ़ने के साथ ही इन पर नियंत्रण पाना भी बेहद मुश्किल होता जा रहा है। वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक उत्तराखण्ड में इस फायर सीजन में अभी तक जंगलों में आग की करीब सौ घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें 100 हेक्टेयर से भी ज्यादा वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है। जंगलों में लगी आग से चारों ओर धुआं फैलने से जहां बड़ी मात्रा में वन सम्पदा नष्ट हो रही है, वहीं इससे पर्यावरण दूषित होने के साथ-साथ लोगों को सांस लेने में भी परेशानी हो रही है। तापमान में बढ़ोतरी के चलते उत्तराखण्ड में गढ़वाल, कुमाऊं, अल्मोड़ा, कर्णप्रयाग, चमोली, चंपावत, नैनीताल, पौड़ी, टिहरी, रुद्रप्रयाग सहित कई जनपदों के जंगल धधक रहे हैं। हालांकि सरकार द्वारा इस साल फायर सीजन में जंगलों को आग से सुरक्षित बचाने के खूब दावे किए गए थे, जगह-जगह क्रू सेंटर भी स्थापित किए गए थे लेकिन फायर सीजन शुरू होने से पहले ही जंगलों की सुरक्षा के ये तमाम दावे धराशायी हो गए। कई जगहों पर तो स्थिति यह है कि जंगलों में दावानल भड़कने के दो-तीन दिन बाद तक भी वन विभाग मौके पर पहुंचने में नाकाम रहा और जंगलों से उठती आग की भीषण लपटें सब कुछ राख करती चली गई। विशेषज्ञों के मुताबिक जंगलों में दावानल से बड़े पैमाने पर वन सम्पदा तो नष्ट होती ही है, पर्यावरणीय क्षति के साथ-साथ लोगों को जलवायु परिवर्तन का भारी खामियाजा भी भुगताना पड़ता है।

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार गर्मियों में जंगलों में आग तेजी से फैलती है। मौसम के मौजूदा मिजाज को देखते हुए आने वाले कुछ दिनों में इसे लेकर मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में शीतकाल में कम वर्षा और कम बर्फबारी के कारण भूमि और वातावरण में समय से पहले ही नमी समाप्त हो चुकी है, जिससे जंगलों में आग भड़क रही है। बारिश की कमी और तेजी से बढ़ते पारे के कारण वनों में छोटे जलाशयों का अभाव होने से आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। जंगलों का पूरी तरह सूखा होना आग लगने के खतरे को बढ़ा देता है। कई बार जंगलों की आग जब आसपास के गांवों तक पहुंच जाती है तो स्थिति काफी भयवाह हो जाती है। दो साल पहले उत्तराखंड के जंगलों में लगी ऐसी ही भयानक आग में अल्मोड़ा के चौखुटिया में छह गौशालाएं, लकड़ियों के टाल सहित कई घर जलकर राख हो गए थे और वहां हेलीकॉप्टरों की मदद से बड़ी मुश्किल से आग बुझाई जा सकी थी।

जंगलों में आग के कारण वनों के पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता को भारी नुकसान होता है। प्राणी सर्वेक्षण विभाग का मानना है कि उत्तराखंड के जंगलों में तो आग के कारण जीव-जंतुओं की साढ़े चार हजार से ज्यादा प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। वनों में आग से पर्यावरण के साथ-साथ वन सम्पदा का जो भारी नुकसान होता है, उसका खमियाजा लंबे समय तक भुगतना पड़ता है और ऐसा नुकसान साल-दर-साल बढ़ता जाता है। पिछले चार दशकों में भारत में पेड़-पौधों की अनेक प्रजातियों के खत्म हो जाने के अलावा पशु-पक्षियों की संख्या भी घटकर एक तिहाई रह गई है और इसके विभिन्न कारणों में से एक कारण जंगलों की आग रही है। जंगलों में आग के कारण वातावरण में जितनी भारी मात्रा में कार्बन पहुंचता है, वह कहीं ज्यादा बड़ा और गंभीर खतरा है।

देशभर में वन क्षेत्रों में आग से वन सम्पदा को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए उपग्रहों से सतत निगरानी के अलावा अन्य तकनीकों के इस्तेमाल के बावजूद आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2017 से 2019 के बीच तीन वर्षों के दौरान जंगलों में आग लगने की घटनाएं तीन गुना तक बढ़ गईं। 2016 में देशभर के जंगलों में आग लगने की 37 हजार से ज्यादा घटनाएं दर्ज की गई थीं, जो 2018 में बढ़कर एक लाख से ऊपर निकल गईं। भारतीय वन सर्वेक्षण ने वर्ष 2004 में अमेरिकी अंतरिक्ष एजंसी नासा के उपग्रह की मदद से राज्य सरकारों को जंगल में आग की घटनाओं की चेतावनी देना शुरू किया गया था। वर्ष 2017 में सेंसर तकनीक की मदद से रात में भी ऐसी घटनाओं की निगरानी शुरू की गई। आग की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए जनवरी 2019 में व्यापक वन अग्नि निगरानी कार्यक्रम शुरू कर राज्यों के निगरानी तंत्र को मजबूत करने की पहल भी की गई।

हालांकि इन कदमों से कुछ राज्यों में जंगलों में आग की घटनाएं कम करने में थोड़ी सफलता तो मिली लेकिन उत्तराखंड सहित कुछ राज्यों में हालात अभी भी नहीं सुधरे हैं। तमाम तकनीकी मदद के बावजूद जंगलों में हर साल बड़े स्तर पर लगती भयानक आग जब सब कुछ निगलने पर आमादा दिखाई पड़ती है और वन विभाग बेबस नजर आता है, तो चिंता बढ़नी स्वाभाविक है। ज्यादा चिंता की बात यह है कि जंगलों में आग की घटनाओं को लेकर सरकारों और प्रशासन के भीतर आज भी संजीदगी का अभाव दिखता है। आंकड़े देखें तो एक दशक में ही हम वनों की आग से 22 हजार हेक्टेयर से भी ज्यादा जंगल खो चुके हैं। वन सर्वेक्षण संस्था की रिपोर्ट के अनुसार देशभर में 2004 से लेकर 2017 के बीच वनों में आग लगने की तीन लाख चालीस हजार घटनाएं हुई थी। 2019 में उत्तराखंड में लगी भयावह आग के बाद तो राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) को भी सख्त टिप्पणी करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। तब एनजीटी ने कहा था कि पर्यावरण मंत्रालय और अन्य प्राधिकरण वनों में आग की घटनाओं को हल्के में लेते हैं। कई बार जंगलों में आग प्राकृतिक तरीके से नहीं लगती बल्कि पशु तस्कर भी ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। मध्य प्रदेश के जंगलों में लोग महुआ निकालने के लिए झाड़ियों में आग लगाते हैं।

यदि प्राकृतिक तरीके से आग लगने वाली घटनाओं की बात करें तो मौसम में बदलाव, सूखा, जमीन का कटाव इसके प्रमुख कारण हैं। विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में तो चीड़ के वृक्ष बहुतायत में होते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे वनों का कुप्रबंधन ही मानते हैं कि देश का करीब 17 फीसदी वन क्षेत्र चीड़ वृक्षों से ही भरा पड़ा है। दरअसल कमजोर होते वन क्षेत्र में इस प्रकार के पेड़ आसानी से पनपते हैं। चीड़ के वृक्षों का सबसे बड़ा नुकसान यही है कि एक तो ये बहुत जल्दी आग पकड़ लेते हैं और दूसरा यह कि ये अपने क्षेत्र में चौड़ी पत्तियों वाले अन्य वृक्षों को पनपने नहीं देते। चूंकि चीड़ के वनों में नमी नहीं होती, इसलिए जरा-सी चिंगारी भी ऐसे वनों को राख कर देती है। चीड़ के वृक्षों की पत्तियां जंगल की जमीन को भी तेजाबी बना देती हैं, जिससे ऐसे क्षेत्रों में पेड़-पौधों की अन्य प्रजातियां नहीं पनप पाती। इसलिए ऐसे वन क्षेत्रों में पारिस्थितिकी परिवर्तन की बहुत बड़ी जरूरत मानी जा रही है, जिसके लिए सरकार और वन विभाग को कुछ बड़े कदम उठाने चाहिएं। कभी चीड़ के सूखे पत्तों को पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने पशुओं के लिए बिछौने के रूप में इस्तेमाल किया करते थे किन्तु रोजगार की तलाश में पहाड़ों से लोगों के पलायन के चलते लोगों को अब इन पत्तियों की जरूरत ही नहीं पड़ती और जंगलों में इन सूखी पत्तियों का ढ़ेर इकट्ठा होता रहता है, जो थोड़ी सी गर्मी बढ़ते ही मामूली सी चिंगारी से ही ऐसे सुलग उठते हैं कि देखते ही देखते पूरा जंगल आग के हवाले हो जाता है।

यदि केवल उत्तराखंड के जंगलों की बात करें तो प्रतिवर्ष वहां औसतन करीब 23.66 लाख मीट्रिक टन चीड़ की पत्तियां गिरती हैं, जो आग के फैलाव का बड़ा कारण बनती हैं। जंगलों में इन पत्तियों की परत के कारण जमीन में बारिश का पानी नहीं जा पाता। हालांकि चीड़ की पत्तियों को संसाधन के तौर पर लेते हुए इनका उपयोग बिजली, कोयला आदि बनाने में करने पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन इस दिशा में सरकारों को गंभीरता से कदम उठाने की जरूरत है। भारत में जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं पर आसानी से काबू पाने में विफलता का एक बड़ा कारण यह भी है कि वन क्षेत्रों में वनवासी अब वन संरक्षण के प्रति उदासीन हो चले हैं। इसकी वजह काफी हद तक नई वन नीतियां भी हैं। हालांकि वनों के संरक्षण और उनकी देखभाल के लिए हजारों वनरक्षक नियुक्त किए जाते हैं लेकिन लाखों हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगलों की हिफाजत करना इनके लिए इतना सहज और आसान नहीं होता। इसलिए जरूरी यही है कि वनों के आसपास रहने वालों और उनके गांवों तक जन-जागरूकता अभियान चलाकर वनों से उनका रिश्ता कायम करने के प्रयास किए जाएं ताकि वे वनों को अपने सुख-दुख का साथी समझें और इनके संरक्षण के लिए हर पल साथ खड़े नजर आएं।

 

Topics: Uttarakhand Newsforest fireपर्यावरणLatest News in Hindiuttarakhand forest fire newsजलते जंगल
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