राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की आपत्तियों के बाद यूनिसेफ ने सहमति से संबंध की आयु के विषय में रिपोर्ट को वापस लिया
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राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की आपत्तियों के बाद यूनिसेफ ने सहमति से संबंध की आयु के विषय में रिपोर्ट को वापस लिया

यौन संबंधों के लिए सहमति की उम्र को कम करने को लेकर यूनिसेफ ने अपनी पालिसी ब्रीफ को वापस ले लिया है

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Oct 6, 2023, 04:13 pm IST
in विश्व

यौन संबंधों के लिए सहमति की उम्र को कम करने को लेकर यूनिसेफ ने अपनी पालिसी ब्रीफ को वापस ले लिया है। एनफोल्ड प्रोएक्टिव हेल्थ ट्रस्ट, यूएनएफपीए और यूनिसेफ ने संयुक्त रूप से 2022 में पालिसी ब्रीफ को प्रकाशित किया था। इसमें यह अनुशंसा की गयी थी कि सहमति से संबंध की उम्र को कम किया जाना चाहिए और यदि 16 वर्ष से अधिक के बच्चे आपसी सहमति से सम्बन्ध बनाते हैं तो उन्हें अपराध की श्रेणी में नहीं लाना चाहिए।
परन्तु भारत में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने इस पालिसी ब्रीफ पर आपत्ति व्यक्त की एवं इसके विरोध में यूनिसेफ को पत्र लिखा।

उन्होंने अपने पत्र में यह स्पष्ट करते हुए लिखा कि यदि ऐसा होता है अर्थात आपसी सहमति से यौन संबंधों की उम्र कम की जाती है तो इससे पीड़िता को ही नुकसान होगा। उन्होंने लिखा कि अंतर्राष्ट्रीय अपराध कानून में उम्र को लेकर कोई परिभाषा नहीं है जबकि इसके विपरीत अन्य अंतर्राष्ट्रीय कानूनी संरचना कार्यों जैसे भर्ती, तस्करी, बिक्री, वेश्यावृत्ति और अश्लील साहित्य (पोर्नोग्राफी) में परिभाषित किया है।

उन्होंने यह भी लिखा कि अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून भी अभी तक सहमति की उम्र निर्धारित नहीं करता है, परन्तु निगरानी रखने वाले संगठनों ने बार-बार यह कहा है कि यदि आपसी सहमति से संबंधों की उम्र कम कर दी जाती है तो या बहुत कम हो जाती है तो इससे बच्चों की शोषण से रक्षा नहीं हो पाएगी और कम उम्र में यौन सम्बन्ध स्थापित करने से उनके अधिकारों एवं विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

इसी पत्र में लिखा है कि “यौन संबंधों में सहमति की उम्र को तस्करी प्रोटोकॉल में व्यक्तियों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों (तस्करी प्रोटोकॉल) की तस्करी को रोकने, कम करने एवं दंडित करने के लिए प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 3 के पैराग्राफ (बी) के अंतर्गत 18 वर्ष परिभाषित किया गया है जो यूएनसीआरसी के अनुपालन में है।“ इस पत्र के माध्यम से उन्होंने बताया कि सभी अंतर्राष्ट्रीय विलेखों में 18 वर्ष की आयु को ही रेखांकित किया गया है और बच्चों की सुरक्षा के लिए उम्र की यही सीमा आवश्यक है।

इस पत्र में उन्होंने कई ऐसे दस्तावेजों का भी उल्लेख किया जिनमें उन खतरों को रेखांकित किया गया है जो बच्चों द्वारा कम उम्र में यौन सम्बन्ध स्थापित करने से हो सकते हैं। चूंकि उनकी उम्र कम होती है तो उन्हें यह पता नहीं होता है कि वह कैसे स्वयं को अवांछित गर्भावस्था से सुरक्षित रखें, कैसे वह गैरकानूनी गर्भपात के जाल में न फंसे और कैसे वह स्वयं को एचाआईवी जैसी संक्रामक यौन बीमारियों से बचाएं।

उन्होंने एक और अध्ययन का हवाला देते हुए लिखा कि किशोर माओं के गर्भ से जन्म लेने वाले बच्चों में कुपोषण से पीड़ित होने का खतरा होता है और किशोर गर्भावस्था के चलते जो बच्चे पैदा होते हैं उन पर भी कुपोषण का खतरा होता है। और यह खतरा माँ की खराब पोषण स्थिति, निम्न शिक्षा, निम्न स्वास्थ्य सेवा पहुँच, खराब संपूरक फीडिंग प्रक्रियाओं तथा खराब जीवनयापन स्थितियों के चलते होता है। इस पत्र में उस दोहरे मापदंड पर प्रश्न उठाया गया कि जहां एक ओर अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं इस मामले को संवेदनशीलता से प्रबंधित कर रही हैं और परिवार को कैसे नियोजित किया जाए, इस मानवाधिकार के साथ जोड़ रही हैं तो वहीं दूसरी ओर वही अन्तर्रष्ट्रीय संस्थाएं यौन सम्बन्धों की आपसी सहमति की उम्र कम करने की बात कर रही हैं, जिसके चलते किशोरियों के गर्भधारण में वृद्धि होगी।

उन्होंने कई मानसिक खतरों की ओर भी संकेत किया, जो किशोरों में इस निर्णय के चलते हो सकते हैं और यह तमाम शोध भी दावा करते हैं। जब किशोर लड़के और लड़कियां ऐसे रोमांटिक संबंधों में जाते हैं तो वह कई प्रकार के परिवर्तनों से होकर गुजरते हैं। और यदि आपसी सहमति से यौन संबंधों की उम्र कम कर दी जाती है तो एक बार शारीरिक रूप से जुड़ने के बाद ऐसे रिश्ते कम उम्र में टूटते हैं तो बच्चे एक ऐसे मानसिक तनाव का शिकार हो सकते हैं जो उनके कार्य करने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है।

इस पत्र में पॉक्सो अधिनियम के विषय में बताते हुए लिखा गया है कि छोटे बच्चों की रक्षा एवं समाज के लक्ष्यों और उद्देश्यों की सुरक्षा के लिए पॉक्सो अधिनियम भारत में लागू है जो बच्चों के साथ होने वाले हर अन्याय के विरोध में है। वह वर्तमान समाज में मौजूदा समस्याओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है। यदि आपसी सहमति से यौन संबंधों की उम्र को कम किया जाता है और उन खतरों को ध्यान में नहीं रखा जाता है जो इसके चलते हो सकते हैं, जैसे शोषण, तस्करी, वैश्यावृत्ति आदि तो वर्तमान परिदृश्य में किशोरों के साथ अन्याय होगा।

आयोग के इस पत्र के बाद यूनिसेफ ने अपनी पालिसी ब्रीफ को वापस ले लिया है। यूनिसेफ ने अपनी साइट से पालिसी ब्रीफ को हटाते हुए लिखा है कि
“वर्ष 2022 में, यूनिसेफ और यूएनएफपीए के समर्थन से, एनफोल्ड ने एक नीति सारांश लिखा, जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत किशोरों के अधिकारों पर सहमति की उम्र के निहितार्थ का अध्ययन करता है। इसे हमने कई हितधारकों के साथ मिलकर बनाया था और तमाम कानूनी मानकों, प्रक्रियाओं के माध्यम से बनाया था, परन्तु कुछ हितधारकों द्वारा इस रिपोर्ट के सम्बन्ध में चूंकि बहुत कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों और दृष्टिकोणों को उठाया गया है, अत: इस रिपोर्ट के निष्कर्षों की समीक्षा की आवश्यकता है, जिसमें इस मुद्दे पर एनसीआरबी और अन्य डेटा के विश्लेषण को पूरी तरह और व्यापक रूप से शामिल करने किया जाए और कई हितधारकों एवं सहयोगियों को जोड़ा जाए। फिलहाल यह रिपोर्ट सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं होगी।
इस पालिसी ब्रीफ के किसी भी निष्कर्ष के लिए यूनिसेफ आधिकारिक रूप से जिम्मेदार नहीं है!

 

 

Topics: राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोगयूनिसेफसहमति से संबंध की आयुयूनिसेफ की रिपोर्ट
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