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भारत गाथा की अबाधित यात्रा

स्वतंत्रता के बाद से आज तक भारत ने कई ऐसे पड़ाव देखे हैं, जो उसकी गति को धीमा या तेज करने वाले, उसकी दिशा को सही या गलत करने वाले, और उसके भविष्य को संवारने या बिगाड़ने वाले रहे हैं।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Aug 15, 2023, 11:41 am IST
in भारत, सम्पादकीय

स्वतंत्रता के बाद से आज तक भारत ने कई ऐसे पड़ाव देखे हैं, जो उसकी गति को धीमा या तेज करने वाले, उसकी दिशा को सही या गलत करने वाले, और उसके भविष्य को संवारने या बिगाड़ने वाले रहे हैं। ऐसी घटनाओं को समझना जरूरी है।

भारत गाथा कई सहस्राब्दी पुरानी है। हम तब से जरा भी नहीं बदले और लगातार बदलते भी गए। यही इस विलक्षण सांस्कृतिक राष्ट्र का परिचय है। इसके सारे इतिहास को एक पुस्तक में समेट सकना न संभव है, न व्यावहारिक। फिर भी आगे बढ़ने के लिए यह जानना जरूरी है कि हम किस दिशा में चलते आए हैं और कितने सोपान हमने पार किए हैं। हो सकता है, कभी कोई कदम गलत रहा हो, हो सकता है, कभी कहीं दिशा गलत रही हो। सिर्फ उसका सही मूल्यांकन ही स्वयं को संभालने का मार्ग दिखा सकता है।

स्वतंत्रता के बाद से आज तक भारत ने कई ऐसे पड़ाव देखे हैं, जो उसकी गति को धीमा या तेज करने वाले, उसकी दिशा को सही या गलत करने वाले, और उसके भविष्य को संवारने या बिगाड़ने वाले रहे हैं। ऐसी घटनाओं को समझना जरूरी है। जो बीत गया उसे बदला नहीं जा सकता, लेकिन उनमें से अवांछित पड़ावों से दोबारा न गुजरना पड़े, इसके लिए उन्हें जानना निश्चित तौर पर जरूरी है। अगला कदम सही दिशा में और सशक्त ढंग से रखा जा सके, इसके लिए अपने पिछले मजबूती भरे कदमों की निगाह डालना भी जरूरी है।

पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की पसंदीदा पंक्ति थी- संघर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही, वह भी सही। आज भारत गाथा का एक अंश प्रस्तुत करते हुए पाञ्चजन्य अपने प्रथम संपादक का स्मरण करता है- राष्ट्र पथ पर जो मिले, वह भी सही, वह भी सही…

पाञ्चजन्य के 15 अगस्त के इस विशेषांक में हमने ऐसे कुछ पड़ावों को सामने रखने का प्रयास किया है। कुछ ऐसे नासूर रहे हैं, जो इस अवधि में लगातार हमें टीस भी देते रहे और कई बार रक्त भी बहाते रहे हैं। जैसे कि कश्मीर की समस्या और आतंकवाद से उसका संबंध एक इतिहास है, जो एक साम्राज्यवादी षड्यंत्र के तहत पैदा हुआ और साम्राज्यवादियों के उत्तराधिकारियों के साथ भी उसी तरह के संबंधों में स्थापित हो गया।

लेकिन फिर एक ओर अनुच्छेद 370 में व्यापक संशोधन और दूसरी ओर पाकिस्तान में घुसकर किए गए जवाबी प्रहार- सर्जिकल स्ट्राइक ने इस नासूर का लगभग उपचार ही कर दिया, यह भी हमारा ही एक इतिहास है। धर्म, अर्थ, विधि, लोकतंत्र, राष्ट्र वैभव, ज्ञान, विज्ञान – हर क्षेत्र में हमने लगातार प्रगति भी की है और कई बार ठोकरें भी खाई हैं। लेकिन फिर भी, चाहे कुछ देर से ही सही, अपने लक्ष्य तक पहुंचने में हम सफल रहे हैं। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए लगभग 500 वर्ष से चला आ रहा संघर्ष इसका एक बहुत बड़ा प्रमाण है। लेकिन विजय हमेशा संघर्ष करने वालों की होती है – यह जानने के लिए अपने संघर्ष को दोबारा जीना भी आवश्यक होता है।

आज भारत विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब हम पेट भरने के लिए विदेशों से आने वाले जहाजों की राह तकते थे और एक दौर ऐसा भी था जब हम विदेशों को किए जाने वाले भुगतान के लिए अपना सोना गिरवी रखने के लिए बाध्य हुए थे। तब से अब तक की यात्रा बहुत छोटी भी है और बहुत लंबी भी। बहुत नई भी है और बहुत पुरानी भी। लेकिन उसे फिर से महसूस करना आवश्यक है ताकि उसमें से जो भी कष्टप्रद या अपमानजनक रहा हो, उसे दोबारा ना जीना पड़े। स्वतंत्रता दिवस की असंख्य शुभकामनाओं के साथ पाञ्चजन्य ने इस अंक में ऐसे कुछ प्रकरणों का उल्लेख यथेष्ट विस्तार के साथ करने का प्रयास किया है। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि बहुत सारी घटनाएं ऐसी भी हैं, जो निश्चित रूप से ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, और इसके बावजूद उन्हें इस अंक में अथवा इस सूची में स्थान नहीं मिल सका है।

इसी तरह कुछ घटनाएं ऐसी हैं, जो भले ही छोटी हों, लेकिन बीज रूप में महत्वपूर्ण थीं, और अपने आप में गहरे निहितार्थ रखती थीं। इनमें से कई बातें करना बाकी रह गया है। कई बातें ऐसी भी हैं, जो हमारे सम्मानित पाठकों को याद हैं अथवा याद आएंगी और हो सकता है, वे उन्हें इस अंक में न देख सकें। लेकिन इसमें खेदजनक कुछ भी नहीं है, क्योंकि आपकी स्मृति भी पाञ्चजन्य के लिए किसी पृष्ठ से कम महत्वपूर्ण नहीं है। वास्तव में पाञ्चजन्य भारत गाथा को अपने पाठकों और लेखकों की समेकित स्मृति का संकलन ही मानता है। एक ऐसा संकलन, जो एक-दूसरे के साथ साझा करने के लिए है, एक-दूसरे को बताने और एक-दूसरे से सीखने के लिए है। आशा है कि आपको यह अंक और विशेषकर यह प्रयास पसंद आएगा। उसमें आप अपने साथियों के साथ मिलकर और मूल्य संवर्धन कर सकेंगे और भारत गाथा इसी प्रकार निरंतर आगे बढ़ती जाएगी।

पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की पसंदीदा पंक्ति थी- संघर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही, वह भी सही। आज भारत गाथा का एक अंश प्रस्तुत करते हुए पाञ्चजन्य अपने प्रथम संपादक का स्मरण करता है- राष्ट्र पथ पर जो मिले, वह भी सही, वह भी सही…
@hiteshshankar

Topics: The Unique Cultural NationAfter IndependenceShri Ram Janmabhoomi Temple in AyodhyaThe Uninterrupted Journey of Bharat Gathaभारत गाथाविलक्षण सांस्कृतिक राष्ट्रस्वतंत्रता के बादअयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिरBharat Gatha
हितेश शंकर
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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