प्रख्यात भाषाविद आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, जिन्हें कहा जाता है हिन्दी का प्रथम वैज्ञानिक
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प्रख्यात भाषाविद आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, जिन्हें कहा जाता है हिन्दी का प्रथम वैज्ञानिक

आचार्य किशोरीदास वाजपेयी पहले ऐसे भाषाविद थे, जिन्होंने हिन्दी व्याकरण के अंग्रेज़ी आधार को अस्वीकार कर उसे संस्कृत के आधार पर प्रतिष्ठित किया था।

Written byपंकज चौहानपंकज चौहान
Aug 11, 2023, 06:27 pm IST
in उत्तराखंड
फाइल फोटो

फाइल फोटो

आचार्य किशोरीदास वाजपेयी पहले ऐसे भाषाविद थे, जिन्होंने हिन्दी व्याकरण के अंग्रेज़ी आधार को अस्वीकार कर उसे संस्कृत के आधार पर प्रतिष्ठित किया था। संस्कृत का आधार स्वीकार करते हुए उन्होंने हिन्दी भाषा की जो अपनी मूल प्रकृति है, उसकी न केवल रक्षा की, बल्कि उसका वैज्ञानिक आधार दृढ़ता से प्रतिपादित भी किया था। उनके कार्य का महत्व इसलिए है कि भाषा विज्ञान को उन्होंने शुद्ध भारतीय दृष्टि से लिया है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी भाषा के व्याकरण सम्मत परिष्कार का जो आंदोलन चलाया था, उस रथ की लगाम को किशोरीदास वाजपेयी जीवनपर्यंत थामे रहे। किशोरीदास वाजपेयी ने जीवनपर्यंत हिन्दी को स्वतंत्र भाषा के रूप में विकसित करने के लिए प्रयास किये थे। उन्हें हिन्दी का प्रथम वैज्ञानिक भी कहा जाता है। कुछ सहृदय एवं मूल्यांकन करने वाले विद्वानों में उन्हें ‘हिन्दी का पाणिनि’ तक घोषित किया है। जीवन का बड़ा हिस्सा भीषण गरीबी, अभावों, उपेक्षाओं व अपमानों के बीच काटकर भी उन्होंने हिंदी और देश के लिए अपने अभियान को कतई रुकने या झुकने नहीं दिया था।

हिन्दी भाषा के महान प्रणेता आचार्य किशोरीदास वाजपेयी का जन्म 15 दिसम्बर सन 1898 में कानपुर के बिठूर के पास मंधना क्षेत्र के रामनगर नामक गाँव में हुआ था। माता-पिता ने उनका नाम गोविंद प्रसाद रखा था। गोविंद प्रसाद से आचार्य किशोरीदास वाजपेयी बनने तक की उनकी जीवन यात्रा बेहद ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरी थी। उनका किशोरावस्था तक का जीवन मवेशी चराने और मेहनत मजदूरी करने जैसे कामों में ही बीत गया। यह स्थिति तब बदली, जब 12 वर्ष का होते-होते उन्होंने प्लेग से माता-पिता को खो दिया और चाचा के संवेदनहीन व्यवहार से त्रस्त होकर उनके पास से भाग निकले और साधुओं की एक टोली के साथ मथुरा चले गये। वहां जब उन्होंने टोली के साथ ही रहने की इच्छा जतायी, तो साधु–संतो ने खूब पढ़ने-लिखने की शर्त रख दी। उन्होंने इस मौके का भरपूर लाभ उठाया, जिससे आगे की कथा उनके गोविंद प्रसाद से आचार्य किशोरीदास वाजपेयी में बदलने की कथा में बदल गयी थी। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा गाँव में प्राप्त करने के पश्चात संस्कृत की शिक्षा वृन्दावन प्राप्त की तत्पश्चात बनारस से प्रथमा की परीक्षा और फिर पंजाब विश्वविद्यालय से विशारद एवं शास्त्री की परीक्षाएँ ससम्मान उत्तीर्ण कीं थी। इसके बाद उन्होंने सोलन, हिमाचल प्रदेश में अपना अध्यापकीय जीवन प्रारम्भ किया था।

संस्कृत के आचार्य होते हुए भी, हिन्दी में भाषा परिष्कार की महती आवश्यकता देखते हुए, उन्होंने संस्कृत का क्षेत्र छोड़ हिन्दी का क्षेत्र स्वीकार किया था। इसके लिये उन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद से हिन्दी की विशारद एवं उत्तमा साहित्य रत्न की परीक्षाएँ दीं। आचार्य किशोरीदास बाजपेयी ने न केवल संस्कृत, हिन्दी के व्याकरण क्षेत्र को विभूषित किया अपितु आलोचना क्षेत्र को भी बहुत सुन्दर ढंग से संवारा था। उन्होंने साहित्य समीक्षा के शास्त्रीय सिद्धातों का प्रतिपादन कर नये मानदण्ड स्थापित किये थे। साहित्याचार्य शालिग्राम शास्त्री की साहित्य दर्पण में छपी “विमला टीका” पर उन्होंने ने माधुरी में एक समीक्षात्मक लेखमाला लिख डाली थी। इस लेखमाला का सभी ने स्वागत किया और वह आलोचना जगत में चमक उठे थे। इसके बाद “माधुरी” में प्रकाशित “बिहारी सतसई और उसके टीकाकार” लेखमाला के प्रकाशित होते ही वह हिन्दी साहित्य के आलोचकों की श्रेणी में प्रतिष्ठित हुए। वह न केवल साहित्यिक अपितु सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन में भी आजीवन अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। योग्यता तो थी ही, उनकी निर्भीकता, स्पष्टवादिता और स्वाभिमान उनके जीवन के अभिन्न अंग रहे।

अपनी निर्भीकता के कारण वे “अक्खड़ कबीर” और स्वाभिमान के कारण “अभिमान मेरु” कहाये जाने लगे थे। बड़े से बड़े प्रलोभन उनके जीवन मूल्यों और सिद्धांतों को डिगा न सके। लोक-मर्यादाओं का पूर्णरूपेण पालन करते हुए दुरभिसंधियों पर जम कर प्रहार किया। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि, “मैं हूँ, कबीरपंथी साहित्यकार, किसी की चाकरी मंजूर नहीं, अध्यापकी कर लूंगा, नौकरी कर लूंगा पर आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम को भी अछूता नहीं छोड़ा था। एक परम योद्धा बन कर जन साधारण में राष्टीय चेतना और देशप्रेम के प्राण फूंके थे। उनका पहला लेख “वैष्णव सर्वस्व” में छपा, जिससें साहित्य जगत को इनकी लेखन कला का परिचय मिला। फिर तो इनके लेखों की झडी ही लग गई जो “माधुरी” और “सुधा” में छपे। अब भाषा परिष्कार एवं व्याकरण इनका प्रमुख क्षेत्र हो गया था। उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपना बेजोड सिक्का जमा दिया था। “सच्चाई” और “खरी बात” ये दो उनके मूल मंत्र थे। “मराल” में जो समीक्षात्मक मासिक पत्रिका थी, यह कह कर कि, “तुम बिन कौन मराल करे जग, दूध को दूध औ पानी को पानी” अपने उद्देश्य का ठप्पा लगा दिया था। “मराल” के अतिरिक्त आचार्य किशोरी दास बाजपेयी “वैष्णव सर्वस्व” एवं “चाँद” के सम्पादन से भी जुडे रहे।

वह सच्चे देशभक्त थे, जलियांवाला काण्ड से वह बेहद आहत हो उठे, उनकी राष्टीय चेतना मचल उठी और तब “अमृत में विष” नामक एक गद्य काव्य लिख डाला था। “तरंगिणी’ भी राष्ट्रीय भावों की सजीव झाँकी है जो बहुत ही प्रशंसित हुई। आचार्य किशोरी दास वाजपेयी के भाषा-शास्त्रीय स्वरूप को जानने के लिए उनकी अन्य पुस्तक ‘भारतीय भाषा-विज्ञान’ का अध्ययन भी आज की पीढ़ी के लिए कम महत्त्व का नहीं है। अपने अद्भुत कर्मठ व्यक्तित्व एवं सुदृढ विचारों से भरपूर कृतित्व के कारण उन्होंने भाषा-विज्ञान, व्याकरण, साहित्य, समालोचना एवं पत्रकारिता में जिस क्षेत्र को भी छुआ उसमें अद्भुत क्रांति ला दी थी। उन्होंने भाषा को एक ठोस आधार भूमि प्रदान की थी। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी स्वतंत्र वृत्ति से धर्मनगरी हरिद्वार की देवनगरी कनखल में अत्यन्त आर्थिक कष्टों में जीवनयापन करते रहे थे। सशक्त हिन्दी के “पाणिनि” की 11अगस्त सन 1981 को कनखल, हरिद्वार में जीवन की इहलीला का किसी अगले विशेष कार्य के लिए समापन हुआ था।

निःसंदेह, आज वह हमारे बीच होते तो यह देखकर बहुत दुखी होते कि जिस हिंदी के शुभ की चिंता में वह उसे कठिन बताकर या सरल बनाने की जरूरत जताकर उसकी राह रोकने पर आमादा महानुभावों से यह कहकर पंगा ले लेते थे कि हिंदी तो स्वतः सरल है, उसे और सरल कैसे बनाया जा सकता है। उनका मानना था कि विदेशी भाषाओं के जो शब्द हिंदी में आकर घुल-मिल गये हैं, वे तो उसमें रहेंगे ही, परंतु और नये शब्दों के लिए उसे विदेशी भाषाओं की ओर तभी देखना चाहिए, जब संस्कृत या प्रादेशिक भाषाओं से यह जरूरत पूरी करना कतई संभव न हो। दुर्भाग्य से, अब इसके उलट हिंदी में भारतीय भाषाओं के शब्द कम आ रहे हैं और विदेशी भाषाओं, खासकर अंग्रेजी के ज्यादा। आचार्य किशोरीदास बाजपेयी द्वारा की गयी हिंदी की सबसे बड़ी सेवा यह है कि वह जब तक इस संसार में रहे, उसको स्वतंत्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कुछ भी उठा नहीं रखा था, न वैयाकरण के रूप में और न ही आलोचक, लेखक, कवि या साहित्यकार के रूप में।

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