नवसंवत्सर: बेहद अनूठी है भारतीय नववर्ष की वैज्ञानिकता
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नवसंवत्सर: बेहद अनूठी है भारतीय नववर्ष की वैज्ञानिकता

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा/नवसंवत्सर २०८० (22 मार्च 2023) पर विशेष

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Mar 21, 2023, 05:21 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति
बस्तर में पहली बार इतनी संख्या में लोगों ने घर वापसी की है।

बस्तर में पहली बार इतनी संख्या में लोगों ने घर वापसी की है।

भारतीय संस्कृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा सर्वाधिक महत्वपूर्ण तिथि है। “ब्रह्मपुराण” में उल्लेख है- चैत्रमासे जगद्ब्रह्मा ससर्ज पृथमेहनि, शुक्ल पक्षे समग्रन्तु तदा सूर्योदये गति। यानी प्रतिपदा तिथि को ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना कर मानव की उत्पत्ति की थी। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी शुभ तिथि को सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए प्रथम भारतीय पंचांग की रचना की थी।

जहां एक ओर दुनिया के अन्य देशों में नया साल मनाने का आधार किसी व्यक्ति, घटना व स्थान से जुड़ा है, वहीं हमारा भारतीय नववर्ष ब्रह्मांड के अनादि तत्वों से जुड़ा है। ग्रह-नक्षत्रों की गति पर आधारित हमारा नववर्ष सबसे अनूठा और सर्वाधिक वैज्ञानिक है। भारतीय ज्योतिष के महान विद्वानों ने वैदिक युग में बता दिया था कि किस दिन और किस समय से सूर्यग्रहण होगा। यह कालगणना युगों बाद भी पूरी तरह सटीक साबित हो रही है। यह इतनी सामंजस्यपूर्ण है कि तिथि वृद्धि, तिथि क्षय, अधिक मास, क्षय मास व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पाते, तिथि घटे या बढ़े, लेकिन सूर्यग्रहण सदैव अमावस्या को होगा और चन्द्रग्रहण सदैव पूर्णिमा को ही।

भले ही हमारे राजकीय कार्य शक संवत के अनुसार होते हों मगर आम जनमानस में समाजिक कार्यों के लिए विक्रम संवत ही स्वीकार्य है। हम अपने सभी शुभ कार्य इसी भारतीय पंचांग के अनुसार करते हैं। शुभ कार्यों के पूजन मंत्र में भारतीय कालगणना के उल्लेख में भारतीय मनीषा के उत्कृष्ट काल चिंतन का परिचायक है। हमारे प्रत्येक शुभ कार्य के पूजन का संकल्प मंत्र है – ॐ अस्य श्री विष्णु राज्ञया प्रवर्त्य मानस व्रहमणो द्वितीय परार्द्धे, श्वेतवाराह कल्पे, वैवस्वत मनवन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलि प्रथम चरणे, जम्बूद्वीपे भरतखण्डे अमुक नाम, अमुक गोत्र आदि पूजनं/आवाहनम् करिष्यामि।

सम्राट विक्रमादित्य ने आक्रमणकारी शकों को परास्त कर भारतभूमि से निकाल बाहर कर जिस दिन “शकारि” की उपाधि धारण की थी, वह तिथि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की थी। शास्त्रीय उल्लेख बताते हैं कि भारत के दिग्विजयी सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी समूची प्रजा को कर मुक्त करने के साथ ही कई जनहितकारी कार्यकर “धर्म संसद” से अपने नाम का विक्रम संवत चलाने का गौरव हासिल किया था। अखंड भारत के चक्रवर्ती सम्राट वीर विक्रमादित्य ने न सिर्फ द्वादश ज्योतिर्लिंगों का पुनरुद्धार कराया था वरन अयोध्या में राम मन्दिर का सर्वप्रथम पुनर्निर्माण भी कराया था। भारत की पश्चिमी अन्तिम सीमा पर हिन्दूकुश के पास प्रथम शक्तिपीठ हिंगलाज भवानी ( वर्तमान में पाकिस्तान क्षेत्र ) का मन्दिर और असम में कामाख्या देवी के विश्वप्रसिद्ध मन्दिरों के निर्माण का श्रेय भी इन्हीं महान सम्राट को जाता है। यही नहीं, असम से लेकर हिन्दूकुश (पेशावर) तक विशाल सड़क मार्ग का निर्माण करवाकर उन्होंने इन दोनों शक्तिपीठों को आपस में जुड़वाया भी था। उनके इन महान राष्ट्रहितकारी कार्यों के बदले उपकृत राष्ट्र ने अपने प्रिय सम्राट को “विक्रमादित्य” की पदवी से सुशोभित कर उनके नाम से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नये विक्रम संवत का शुभारम्भ किया था।

सनातन धर्म की सर्वाधिक शुभ तिथि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के अनेक प्रसंग जुड़े हुए हैं। इसी दिन सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। माँ शक्ति की आराधना के विशिष्ट साधनाकाल चैत्र नवरात्र का शुभारम्भ हमारे भारतीय नववर्ष यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही होता है। श्रीहरि विष्णु ने सृष्टि के प्रथम जीव के रूप में इसी दिन प्रथम मत्स्यावतार लिया था। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम व द्वापर युग में सम्राट युधिष्ठिर ने इसी दिन राजसत्ता संभाली थी। चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर इसी दिन विक्रमी संवत् का शुभारंभ हुआ था। महर्षि गौतम, सिंध प्रान्त के सुप्रसिद्ध संत झूलेलाल और सिख पंथ के दूसरे गुरु श्री अंगद देव जी का जन्म इसी दिन हुआ था। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना ‘कृणवंतो विश्वमआर्यम’ का संदेश दिया था। यही नहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक प.पू. डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी इसी शुभ तिथि को हुआ था। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के इस मंगल उत्सव को महाराष्ट्र में ‘गुड़ी पड़वा’, कर्नाटक में ‘युगादि’, तेलंगाना में ‘उगादि’, केरल में ‘विषु पर्व’ तमिलनाडु में ‘बिसु परबा’, सिंध में ‘चेटीचंड’ और कश्मीर में ‘नवरेह’ के रूप में मनाया जाता है।

गौरतलब है कि 18वीं से लेकर 20वीं सदी के पूर्वार्ध तक अनेक यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय नववर्ष की वैज्ञानिकता पर अविश्वास जताते हुए संशय का वातावरण बनाया था; मगर बीते दिनों हुई ‘नासा’ की शोध और देश दुनिया में हुए अनुसंधानों से भारतीय नववर्ष की वैज्ञानिकता साबित हो चुकने के बाद से अब देश दुनिया के वैज्ञानिक भारतीय नववर्ष की महत्ता को स्वीकार करने लगे हैं। किन्तु, इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि हमारी वर्तमान युवा पीढ़ी अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान के इस सर्वोत्कृष्ट प्रतीक की गौरव गरिमा से अनभिज्ञ है। इसके पीछे है देशवासियों की गुलाम मानसिकता। देश के एक बड़े वर्ग के जीवन में आज अंग्रेजियत व पाश्चात्य जीवन शैली पूरी तरह हावी हो गयी है। हमारे वेशभूषा, भाषा ही नहीं जन्मदिन, पर्व-त्योहार, विवाह संस्कार आदि समारोहों को मनाने के तौर तरीकों में भी।

आज जरूरत है इस भूल को सुधारने की। हम भारतवासी अपने आत्मगौरव को पहचानें तथा अपने भारतीय नववर्ष के उत्सव को धूमधाम के साथ पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पर और अधिक हर्षता एवं व्यापकता के साथ मनाएं क्योंकि यही भारतीय नववर्ष हमारा गौरव और हम भारतीयों की मूल पहचान है। इस साल वर्ष 2023 में भारतीय नवसंवत्सर २०८० (पिंगल) का शुभारम्भ 22 मार्च से हो रहा है। तो आइए इस सुअवसर पर हम सब देशवासी एकजुट होकर अपने भारतीय नववर्ष को पूरे श्रद्धाभाव से मनाएं ताकि हमारी आगामी पीढ़ी भारत की अमूल्य परम्पराओं की वैज्ञानिकता से अवगत हो सकें।

शक्ति के आवाहन का अद्भुत देवपर्व

भारत की महान वैदिक मनीषियों ने नवरात्र के देवपर्व को शक्ति के आवाहन के सर्वाधिक फलदायी मुहूर्त की संज्ञा दी है। ऋषि मनीषा के अनुसार मां शक्ति की आराधना का पावन नवरात्र पर्व जिज्ञासु साधकों को प्रार्थना, उपवास, जप-तप और ध्यान के माध्यम से जीवन के सच्चे स्रोत की यात्रा करता है। प्रार्थना से मन निर्मल होता है, ध्यान के द्वारा अस्तित्व की गहराइयों में डूबकर आत्म साक्षात्कार होता है, उपवास के द्वारा शरीर विषाक्त पदार्थ से मुक्त होकर स्वस्थ हो जाता है तथा मौन के द्वारा हमारे वचनों में शुद्धता आती है। यह आंतरिक यात्रा मनुष्य बुरे कर्मों का शमन करती है। नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों को जानना और हर नाम से जुड़ी दैवीय शक्ति को पहचान कर उसके तत्वदर्शन को आत्मसात करना ही इस देवपर्व का मूल मकसद है।

आध्यात्मिक मनीषियों की मान्यता है कि चैत्र नवरात्र काल इस कारण और भी विशिष्ट है क्योंकि इसके साथ हमारे भारतीय नववर्ष का भी शुभारम्भ होता है। सनातन धर्म में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को स्वयंसिद्ध अमृत तिथि माना गया है। यानी वर्षभर का सबसे उत्तम दिन। इस समय वायुमंडल में दैवीय शक्तियों के स्पंदन अत्यधिक सक्रिय होते हैं। इसलिए इन नौ दिनों में सच्चे हृदय से श्रद्धा भक्ति से की गयी छोटी सी साधना भी साधक की चमत्कारी नतीजे दे सकती है। तो आइये! मां शक्ति की आराधना के शुभ भाव से भारतीय नववर्ष का स्वागत करने के साथ हम पथभ्रांत लोगों को भूल सुधारने को प्रेरित करें ताकि हमारी भावी पीढ़ी भारत की इन अमूल्य परम्पराओं की वैज्ञानिकता को जानकर उनका अनुसरण कर सके।

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