परलोक ही नहीं, इहलोक भी
June 4, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

परलोक ही नहीं, इहलोक भी

भारत में मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा एवं सांस्कृतिक एकता के केंद्र तो हैं ही, अर्थव्यवस्था के भी वाहक हैं। मंदिर एवं उनसे जुड़े पर्व और मेले न सिर्फ उस क्षेत्र के विकास को सुनिश्चित करते हैं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का सृजन भी करते हैं, यही कारण है कि देश की जीडीपी में मंदिरों की अर्थव्यवस्था की हिस्सेदारी 2.32 प्रतिशत है

Written byपंकज जगन्नाथ जयस्वालपंकज जगन्नाथ जयस्वाल
Mar 13, 2023, 07:50 pm IST
in भारत, धर्म-संस्कृति

प्राचीन काल से ही मंदिर व्यापार, कला, संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक जीवन के केंद्र रहे हैं। स्थानीय मंदिर समुदाय के केंद्र थे। लोग यहीं मिलते थे, समाचारों और विचारों का आदान-प्रदान करते थे, अपनी कहानियां, अपनी कठिनाइयां साझा करते थे, एक-दूसरे से सलाह मांगते थे, और अपने सामाजिक जीवन की योजना बनाते थे।

मंदिर, हिंदू धर्म की पहचान हैं। ये न सिर्फ आस्था और पूजा-पाठ के केंद्र हैं बल्कि आध्यात्मिकता और भारत की सांस्कृतिक पहचान के केंद्र भी हैं। भारत में मंदिर देश की समृद्ध धार्मिक, आध्यात्मिक और स्थापत्य विरासत को दर्शाते हैं। भारत 20 लाख से अधिक मंदिरों का देश है, जिनमें से कई मंदिरों को अत्यधिक आस्था और चमत्कार का स्थान माना जाता है। इनकी ओर दुनिया भर के भक्त आकर्षित होते हैं।

प्राचीन काल से ही मंदिर व्यापार, कला, संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक जीवन के केंद्र रहे हैं। स्थानीय मंदिर समुदाय के केंद्र थे। लोग यहीं मिलते थे, समाचारों और विचारों का आदान-प्रदान करते थे, अपनी कहानियां, अपनी कठिनाइयां साझा करते थे, एक-दूसरे से सलाह मांगते थे, और अपने सामाजिक जीवन की योजना बनाते थे। यहीं समृद्ध लोगों की खेती से प्राप्त धन का वितरण पत्तल-दोना बनाने वालों, माली-मालाकारों, कुम्हारों, शिल्पकारों आदि छोटे-छोटे व्यवसाय करने वालों के सामान की बिक्री के माध्यम से होता था। वैद्य, शिक्षक, संगीत से जुड़े लोग और ज्योतिर्विद भी मंदिर से जुड़े होते थे। इस तरह पूरा समाज सहज भाव से जीवन यापन करता था।

इन स्थानीय मंदिरों से इतर भारत में कई मंदिर ऐसे हैं जो न सिर्फ देशभर के लोगों की आस्था के केंद्र हैं बल्कि जीवन काल में एक बार इन स्थानों पर जाने को सौभाग्य समझा जाता है। इसमें विख्यात चार धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग, अयोध्या का राम मंदिर, मथुरा का कृष्ण मंदिर, वैष्णो देवी मंदिर, विन्ध्यवासिनी मंदिर, मैहर देवी मंदिर, कामाख्या देवी मंदिर, दक्षिणेश्वर काली मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर, तिरुपति बालाजी, श्री मीनाक्षी मंदिर, कामाक्षी मंदिर और ऐसे अनेक स्थान हैं जहां लोग शांति, समृद्धि और खुशी के लिए प्रार्थना करने जाते हैं। इनमें से कई मंदिर वास्तुकला की उत्कृष्ट कृतियां हैं, और उनमें से कई प्राचीन काल के दौरान बनाए गए थे और उनमें बारे में काफी आकर्षक कहानियां प्रचलित हैं। इनमें से कुछ मंदिर इतने संपन्न हैं कि उनके पास विशाल भूखण्ड या सोना है। कई मंदिरों में मूल्यवान वस्तुओं और प्राचीन वस्तुओं का व्यापक संग्रह है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।

धर्म से जुड़ी कई यात्राएं हैं जो मंदिर आधारित हैं जिनका लोक में बहुत महात्म्य है। इनमें अमरनाथ यात्रा, जगन्नाथ पुरी यात्रा, चारधाम यात्रा, कांवड़ यात्रा प्रमुख हैं। इसके अलावा पावन दिनों में स्नान के स्थल हैं जिनमें काशी, प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक, अयोध्या, पुष्कर, गंगासागर, कुरुक्षेत्र आदि प्रमुख हैं। ये मंदिर, धार्मिक यात्राएं, पवित्र धार्मिक स्नान, धार्मिक मेले, पर्व-त्योहार आर्थिक गतिविधियों के इंजन हैं। इसके अतिरिक्त सिख, जैन एवं बौद्ध पंथ के मंदिर एवं तीर्थस्थल भी आर्थिक गतिविधियों के स्रोत हैं।

अर्थव्यवस्था और रोजगार में मंदिरों का योगदान

मिनेसोटा विश्वविद्यालय के बर्टन स्टीन ने 1960 में “द इकोनॉमिक फंक्शन आफ ए मेडियेव्हल साऊथ इंडियन टेम्पल” नाम से एक मौलिक शोधपत्र में लिखा था कि, “कुछ मायनों में, तीर्थयात्रियों के साथ-साथ पर्यटन-समृद्ध आर्थिक क्षेत्रों का विकास व्यापक शोध से उपजा है, जिसने दिखाया है कि पूरे भारतीय इतिहास में मंदिर महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र थे”। यह शोधपत्र द जर्नल आॅफ एशियन स्टडीज में प्रकाशित हुआ था।

मंदिर के महात्म्य के कारण श्रद्धालुओं के आने से आर्थिक क्षेत्र के कई हिस्सों को गति मिलती है। अपने स्थापत्य से शुरु होकर मंदिरों से परिवहन से लेकर होटल एवं रेस्तरां उद्योग, वस्त्र उद्योग, शृंगार उद्योग, पूजा सामग्री उद्योग, शिल्प एवं दस्तकारी, सजावट उद्योग एवं फोटोग्राफी, प्रकाशन उद्योग और अनेक अन्य स्थानीय व्यापार के लिए अवसर उत्पन्न होता है।

कुछ मंदिरों की विशेषताएं और उत्सव

तिरुपति मंदिर, मीनाक्षी मंदिर,सोमनाथ मंदिर, सोमनाथ मंदिर, जगन्नाथ मंदिर

तिरुमला तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर, आंध्र प्रदेश

तिरुपति मंदिर में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु दर्शनार्थ आते हैं। उत्सवों के अवसर पर श्रद्धालुओं की संख्या दुगुनी हो जाती है। यहां हर वर्ष भक्तों के मुड़वाए गए बालों की नीलामी से मंदिर के कोष में लगभग 39 करोड़ रुपये जमा होते हैं। हाल के आंकड़ों के अनुसार मंदिर के पास काफी रिजर्व है और इसके पास 52 टन सोने के आभूषण भी है जिनकी कीमत लगभग 37,000 करोड़ रुपये बताई जाती है। मंदिर में प्रतिदिन डेढ़ लाख लड्डू बनते हैं जिससे मंदिर को वार्षिक लगभग 1.10 करोड़ रुपये की आमदनी होती है।

मीनाक्षी मंदिर, मदुरै

यह भारत के उन गिने-चुने मंदिरों में से एक है, जहां प्रतिदिन लगभग 20 से 30 हजार भक्त आते हैं। मंदिर को सालाना लगभग 60 करोड़ का राजस्व प्राप्त होता है। इसके परिसर में लगभग 33,000 मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर की मुख्य देवी मीनाक्षी हैं, जो सुंदरेश्वर (भगवान शिव) की पत्नी हैं। मंदिर में 14 गोपुरम हैं जिनकी ऊंचाई 45 से 50 मीटर के बीच है। मंदिर में दो स्वर्ण गाड़ियां भी हैं, जो इस प्रसिद्ध हिंदू मंदिर की भव्यता को बढ़ाती हैं और इसे भारत के सबसे समृद्ध मंदिरों में से एक बनाती हैं। चिथिराई थिरुविजा, जिसे मीनाक्षी कल्याणम या मीनाक्षी थिरुकल्याणम के नाम से भी जाना जाता है, अप्रैल के महीने के दौरान मदुराई में आयोजित एक वार्षिक तमिल हिंदू उत्सव है। यह त्योहार मीनाक्षी मंदिर से जुड़ा हुआ है, जो देवी मीनाक्षी, पार्वती के एक रूप और भगवान सुंदरेश्वर, शिव के एक रूप को समर्पित है। त्योहार एक महीने तक चलता है। पहले 15 दिन मदुराई के दिव्य शासक के रूप में मीनाक्षी के राज्याभिषेक और सुंदरेश्वर से उनकी शादी के उपलक्ष्य में समर्पित हैं। अगले 15 दिन कल्लालगर या अलगर (भगवान विष्णु का एक रूप) की अलगर कोइल में उनके मंदिर से मदुराई तक की यात्रा को मनाने के लिए समर्पित हैं।

सोमनाथ मंदिर, गुजरात

इस मंदिर की अपार संपत्ति और महिमा इतनी अधिक थी कि गजनी के तुर्क शासक महमूद ने सोना और चांदी हड़पने के लिए इसे 17 बार लूटा और नष्ट कर दिया, लेकिन हर बार हिंदू राजाओं की मदद से इसका पुनर्निर्माण किया गया। मंदिर में अभी भी इसे भारत के सबसे समृद्ध मंदिरों में से एक माने जाने के लिए पर्याप्त मूल्यवान वस्तुएं हैं। सोमनाथ महादेव मंदिर को वित्तीय वर्ष 2019-20 में 46 करोड़ के मुकाबले 2020-21 में कोरोना काल में 23.25 करोड़ रुपये की आमदनी हुई। इसके मुकाबले अप्रैल-दिसंबर, 2021 के दौरान 35.71 करोड़ रुपये की आमदनी हुई। इसमें से 27.25 करोड़ रुपए खर्च किए गए। वर्ष 2021 में सोमनाथ मंदिर में कुल 52 लाख 68 हजार भक्तों ने दर्शन किए। इसके अलावा सोशल मीडिया के जरिए देश-विदेश के 40 से अधिक देशों के 77.79 करोड़ लोगों ने दर्शन किए।

शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ मंदिर वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। श्रीमद् भागवत, स्कंदपुराण, शिवपुराण और ऋग्वेद जैसे पौराणिक ग्रंथों में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है, जो भारत के सबसे लोकप्रिय तीर्थ स्थलों में से एक के रूप में इसके महत्व को दर्शाता है। मंदिर इस तरह स्थित बताया जाता है कि सोमनाथ समुद्र तट और अंटार्कटिका के बीच एक सीधी रेखा में कोई भूमि नहीं है। सोमनाथ मंदिर में समुद्र-संरक्षण दीवार पर बने बाण-स्तंभ नामक तीर-स्तंभ पर पाए गए संस्कृत में एक शिलालेख के अनुसार, यह मंदिर भारतीय भूमि पर एक बिंदु पर खड़ा है जो उत्तर में भूमि पर पहला बिंदु होता है जो उस विशेष देशांतर पर दक्षिण-ध्रुव से मिलता है।

जगन्नाथ मंदिर, पुरी

यह महत्वपूर्ण धार्मिक महत्व के साथ भारत का एक और समृद्ध मंदिर है। मंदिर रुपये से लेकर बड़े दान प्राप्त करता है। हर दिन, लगभग 30,000 भक्त इस तीर्थस्थल पर आते हैं, साथ ही उत्सव के मौसम में 70,000 अतिरिक्त भक्त आते हैं। एक यूरोपीय भक्त ने एक बार मंदिर में 1.72 करोड़ रुपये दान किए थे। इस श्रद्धेय मंदिर के दर्शन के बिना पुरी की यात्रा अधूरी रहेगी।
पुरी में साल भर कई श्री जगन्नाथ उत्सव आयोजित होते हैं जैसे स्नान यात्रा, नेत्रोत्सव, रथ यात्रा, सायन एकादशी, चितलगी अमावस्या, श्रीकृष्ण जन्म, दशहरा और अन्य त्यौहार। विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा और बहुदा यात्रा, दो सबसे महत्वपूर्ण त्योहार हैं। इस उत्सव में महाप्रभु श्री जगन्नाथ के दर्शन के लिए भारी भीड़ उमड़ती है।

काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी

काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के सबसे सम्मानित धार्मिक स्थलों में से एक है, और अतीत में कई बार लूटे जाने और तोड़े जाने के बावजूद इसने अपनी महिमा बरकरार रखी है। इस मंदिर में तीन गुंबद हैं, जिनमें से दो पर सोने की परत चढ़ी हुई है। काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के सबसे अधिक देखे जाने वाले मंदिरों में से एक है और यह दुनिया के सबसे पुराने जीवित शहर वाराणसी में स्थित है। यह भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे अधिक पूजनीय है। काशी विश्वनाथ मंदिर की एक यात्रा भगवान शिव के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने के बराबर है। गंगा के पश्चिमी तट पर खड़ा मंदिर मानवता को जीवन और मृत्यु का सही अर्थ सिखाता है। आदि शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद, गोस्वामी तुलसीदास और गुरुनानक सहित कई प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों ने इस मंदिर का दौरा किया। इस पवित्र मंदिर की यात्रा को ‘मोक्ष’ (आत्मा की मुक्ति) प्राप्त करने का एक तरीका माना जाता है।

एनएसएसओ के 2022 में जारी सर्वेक्षण के मुताबिक, मंदिरों की अर्थव्यवस्था 3.02 लाख करोड़ रुपये या करीब 40 अरब डॉलर की है, जो भारत की जीडीपी का 2.32 प्रतिशत है। हकीकत में, यह बहुत बड़ा हो सकता है। व्यापार में फूल, तेल, दीपक, इत्र, चूड़ियां, सिंदूर, मूर्ति, तस्वीर और पूजा के कपड़े सभी शामिल हैं। यह अनुमान लगाया गया है कि अकेले यात्रा और पर्यटन उद्योग भारत में 8 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रोजगार देता है, जिसमें साल-दर-साल 19% से अधिक की वृद्धि दर अनुमानित है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, भारत में लगभग 87 प्रतिशत पर्यटक घरेलू हैं, शेष 13 प्रतिशत विदेशी पर्यटक हैं।

हिंदू और बौद्ध मान्यताओं में वाराणसी के महत्व का अर्थ है कि इस प्राचीन शहर में कुल घरेलू पर्यटकों और तीर्थयात्रियों का एक बड़ा हिस्सा आता है। घरेलू धार्मिक पर्यटकों की संख्या विदेशी आगंतुकों की संख्या से अधिक है। नए गंतव्यों की 100 करोड़ से अधिक घरेलू यात्राओं से संकेत मिलता है कि दिल्ली-आगरा-जयपुर के स्वर्ण त्रिकोण से परे मंथन चल रहा है। यहां तक कि प्रतिवर्ष एक करोड़ विदेशी पर्यटकों में से 20% तमिलनाडु में मदुरै और महाबलीपुरम और आंध्र प्रदेश में तिरुपति आते हैं। 2022-23 के लिए केंद्र सरकार का राजस्व 19,34,706 करोड़ रुपये है, और केवल छह मंदिरों ने 24,000 करोड़ रुपये नकद एकत्र किए।

एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार धार्मिक तीर्थ यात्रा पर जाने वाले 55 प्रतिशत हिंदू मध्य और छोटे आकार के होटलों में ठहरते हैं। धार्मिक यात्रा की लागत 2,717 रुपये प्रति दिन / व्यक्ति, सामाजिक यात्रा की लागत 1,068 रुपये प्रति दिन / व्यक्ति, और शैक्षिक यात्रा की लागत 2,286 रुपये प्रति दिन / व्यक्ति है। यह 1316 करोड़ रुपये के दैनिक व्यय और धार्मिक यात्रा पर 4.74 लाख करोड़ रुपये के वार्षिक व्यय के बराबर है।

पिछले कुछ वर्षों में, विश्व यात्रा और पर्यटन प्रतिस्पर्धात्मकता रिपोर्ट (डब्लूईएफ) और यूएनडब्लूटीओ पर्यटन सूचकांक जैसे प्रमुख वैश्विक सूचकांकों पर भारत की रैंकिंग में लगातार सुधार हुआ है। पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि से होटल और रिसॉर्ट
जैसे बहुउपयोगी बुनियादी ढांचे को विकसित करने में भी मदद मिलती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज का भारत बदल रहा है। सुविधाओं में वृद्धि से पर्यटकों के आकर्षण में वृद्धि होती है। जीर्णोद्धार से पहले वाराणसी के काशी विश्वनाथ धाम में एक साल में लगभग 80 लाख लोग आते थे, लेकिन पिछले साल पर्यटकों की संख्या 7 करोड़ से अधिक हो गई। आज 80,000 तीर्थयात्री गुजरात में मां कालिका के दर्शन के लिए पावागढ़ आते हैं, जीर्णोद्धार से पहले सिर्फ 4,000 से 5,000 तक आते थे।

मंदिरों का वैज्ञानिक महत्व

अउपृथ्वी के भीतर चुंबकीय और विद्युत तरंगें लगातार घूमती रहती हैं; जब आर्किटेक्ट और इंजीनियर एक मंदिर का डिजाइन बनाते हैं, तो वे भूमि का एक ऐसा टुकड़ा चुनते हैं जहां ये तरंगें प्रचुर मात्रा में होती हैं। मुख्य मूर्ति मंदिर के केंद्र में स्थित होती है, जिसे गर्भगृह के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर निर्माण के पश्चात मूर्ति को प्राण प्रतिष्ठा के रूप में जानी जाने वाली पूजा के साथ प्रतिष्ठित किया जाता है। मूर्ति को ऐसे क्षेत्र में रखा जाता है जहां चुंबकीय तरंगें बेहद सक्रिय होती हैं। जब मूर्ति रखी जा रही होती है तो वे उसके नीचे कुछ ताम्रपत्र गाड़ देते हैं; प्लेटों पर वैदिक लिपियों को अंकित किया जाता है; ये तांबे की प्लेटें पृथ्वी से चुंबकीय तरंगों को अवशोषित करती हैं और उन्हें आसपास के इलाकों में विकीर्ण करती हैं। नतीजतन, यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से मंदिर जाता है और मूर्ति के चारों ओर दक्षिणावर्त चक्कर लगाता है, तो उसका शरीर इन चुंबकीय तरंगों को अवशोषित करता है और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देता है, जिससे स्वस्थ जीवन की ओर अग्रसर होता है।

लगभग सभी हिंदू मंदिरों में बड़ी घंटियां होती हैं जिन्हें प्रवेश करने से पहले बजाना चाहिए। इसके पीछे का विज्ञान हैरान कर देने वाला है। मंदिर की घंटियां विभिन्न धातुओं के एक विशिष्ट अनुपात से बनाई जाती हैं। इनमें कैडमियम, लेड, कॉपर, जिंक, निकेल, क्रोमियम और मैंगनीज शामिल हैं।

असल विज्ञान है मैन्युफैक्चरिंग में इस्तेमाल होने वाली धातुओं का मिश्रण और अनुपात। जब घंटियां बजती हैं तो वे एक अलग आवाज निकालती हैं। ध्वनि और कंपन इतने स्पष्ट होते हैं कि यह मस्तिष्क के दोनों पक्षों (बाएं और दाएं) को जोड़ते हैं; इसके अतिरिक्त, तेज ध्वनि और कंपन प्रतिध्वनि मोड में सात सेकंड तक रहता है, जो शरीर के सात उपचार केंद्रों को छूने के लिए पर्याप्त है। ध्वनि के साथ मन सभी विचारों से खाली हो जाता है, बहुत ग्रहणशील हो जाता है, नए विचारों को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाता है और मन को चल रही सभी अराजकता से मुक्त कर देता है। कई अन्य लाभों में नकारात्मक विचारों का उन्मूलन, बेहतर एकाग्रता, मानसिक संतुलन और बीमारी में सहायता शामिल हैं।

मंदिर और पर्यटन उद्योग पर प्रधानमंत्री की दृष्टि
हाल ही में, प्रधानमंत्री ने बजट के बाद के वेबिनार में रामायण सर्किट, बुद्ध सर्किट, कृष्ण सर्किट, पूर्वोत्तर सर्किट, गांधी सर्किट और सभी संतों के तीर्थों का उल्लेख किया और इस पर सामूहिक रूप से काम करने के महत्व पर जोर दिया। प्रधानमंत्री ने सदियों से जनता द्वारा की गई विभिन्न यात्राओं का हवाला देते हुए कहा कि कुछ लोग सोचते हैं कि पर्यटन उच्च आय वाले समूहों के लिए एक फैंसी शब्द है, लेकिन यह सदियों से भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का हिस्सा रहा है, और लोग इसका पूरी आत्मीयता से वहन करते आ रहे हैं, साधन न होने पर भी तीर्थ यात्रा पर जाते हैं। उन्होंने चार धाम यात्रा, द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा और 51 शक्तिपीठ यात्रा का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे इनका उपयोग राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के साथ-साथ हमारे आस्था के स्थानों को जोड़ने के लिए किया जाता है। यह देखते हुए कि देश के कई प्रमुख शहरों की पूरी अर्थव्यवस्था इन यात्राओं पर निर्भर थी, प्रधानमंत्री ने यात्राओं की सदियों पुरानी परंपरा के बावजूद सुविधाओं को उन्नत करने के लिए विकास की कमी पर खेद व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि देश की क्षति का मूल कारण सैकड़ों वर्षों की गुलामी और आजादी के बाद के दशकों में इन स्थानों की राजनीतिक उपेक्षा है। उन्होंने कहा, ‘‘आज का भारत इस स्थिति को बदल रहा है।’’ उन्होंने कहा कि सुविधाओं में वृद्धि से पर्यटकों के आकर्षण में वृद्धि होती है। उन्होंने श्रोताओं को यह भी बताया कि जीर्णोद्धार से पहले वाराणसी के काशी विश्वनाथ धाम में एक साल में लगभग 80 लाख लोग आते थे, लेकिन पिछले साल पर्यटकों की संख्या 7 करोड़ से अधिक हो गई। प्रधानमंत्री ने कहा “केदारघाटी में पुनर्निर्माण कार्य पूरा होने से पहले केवल 4-5 लाख भक्तों ने बाबा केदार के दर्शन किए थे। इसी तरह, 80,000 तीर्थयात्री गुजरात में मां कालिका के दर्शन के लिए पावागढ़ आते हैं, जीर्णोद्धार से पहले सिर्फ 4,000 से 5,000 तक आते थे। सुविधाओं के विस्तार का सीधा प्रभाव है पर्यटकों की संख्या पर प्रभाव, और अधिक पर्यटकों का अर्थ है रोजगार और स्वरोजगार के अधिक अवसर”। भारत में विदेशी पर्यटकों की बढ़ती संख्या पर प्रकाश डालते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि इस साल जनवरी में 8 लाख विदेशी पर्यटक भारत आए, जबकि पिछले साल जनवरी में यह संख्या केवल 2 लाख थी।

मंदिर-मठों के सामाजिक कार्य

हिंदू मंदिर और मठ सामाजिक कार्यों में भी अत्यंत गहनता से सक्रिय हैं। कोरोना काल के दौरान सोमनाथ मंदिर, श्री रामजन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट, काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट, कांची कामकोटि पीठम मठ, महावीर मंदिर ट्रस्ट, पटना, माता वैष्णो देवी मंदिर और अंबा जी मंदिर ने कोरेन्टाइन सेंटर, आॅक्सीजन संयंत्र की स्थापना, मरीजों को दवा, भोजन उपलब्ध कराने और राहत कोष में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। देश के कई मंदिर-मठ शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्रों में स्थायी रूप से काम कर रहे हैं।
आंध्र प्रदेश स्थित तिरुमला तिरुपति मंदिर वास्तुशिल्प का एक संस्थान, दिव्यांगों के लिए एक पॉलिटेक्निक, आयुर्वेद कॉलेज, योग संस्थान और संगीत एवं नृत्य कॉलेज का संचालन करता है। इसके अलावा यह चार डिग्री कॉलेज, दो ओरिएंटल कॉलेज, दो जूनियर कॉलेज, सात हाईस्कूल और चार प्राथमिक स्कूलों का संचालन करता है।

एक अनुमान के अनुसार तमिलनाडु में 44,000 से अधिक मंदिर और मठ राज्य सरकार के अधीन हैं। कुछ धार्मिक संस्थान विश्वविद्यालयों का भी संचालन करते हैं। इन सभी शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थानों में 3 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। दिसंबर 2021 में 7 मंदिरों, 4 शहरों के मुरुगन मंदिरों, अरुणाचलेश्वर मंदिर, लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर और आंगलापरमेश्वरी मंदिर ने स्वास्थ्य केंद्र खोले। भगवान मुरुगन मंदिर ने पलानी में 10 कला और विज्ञान कॉलेज के साथ सिद्ध विश्वविद्यालय खोलने की भी घोषणा की है।
माता अमृतानंदमयी मठ देशभर में प्राथमिक से लेकर हाईस्कूल स्तर तक के 53 विद्यालयों का संचालन करता है। इसके अलावा इस मठ से एक विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग कॉलेज, औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र, अस्पताल का संचालन भी होता है।

एक मोटे अनुमान के अनुसार, केरल में 50 से भी अधिक मंदिर और मठ हैं जो शैक्षणिक संस्थाओं का संचालन करते हैं। इनमें लगभग 25,000 से 30,000 विद्यार्थी पढ़ते हैं। इसके अलावा, एक अनुमान के अनुसार राज्य में 100 से अधिक स्कूलों और कॉलेजों का संचालन कुछ प्रमुख मंदिरों और मठों द्वारा किया जाता है। वहीं, 50 से अधिक अस्पतालों का संचालन भी मंदिरों और मठों द्वारा किया जाता है।
वर्ष 2012 के एक आंकड़े के अनुसार, कर्नाटक का मुरुगराजेंद्र मठ अकेले लगभग 150 शिक्षण संस्थान का संचालन करता था। इसी प्रकार, सत्तूर मठ कर्नाटक, तमिलनाडु तथा उत्तर प्रदेश में 300 से अधिक, तुमकुर स्थित सिद्धगंगा मठ और चित्रदुर्ग स्थित शृंगेरी मठ द्वारा संचालित स्कूलों-कॉलेजों में लगभग 30,000 विद्यार्थी पढ़ते हैं। इसी तरह काशी विश्वनाथ मंदिर गरीबों के लिए निशुल्क चिकित्सालय का संचालन करता है।

कम्युनिस्ट और कन्वर्जन माफिया द्वारा हिंदू मंदिरों और धार्मिक प्रथाओं का लगातार विरोध किया जाता है और मजाक उड़ाया जाता है। मंदिरों ने हमेशा लोगों में तब एकात्मता पैदा की है जब समाज और देश को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। विभिन्न सामाजिक गतिविधियां, जो नियमित आधार पर और आपात स्थिति के दौरान होती हैं, सराहनीय हैं। हाल ही में कोरोना की बड़ी आपदा और मंदिरों द्वारा दी गई सहायता ने एक बड़ी राहत प्रदान की जिसने कई लोगों की जान बचाई। स्कूलों, अस्पतालों और ग्रामीण विकास गतिविधियों के लिए किया गया बड़े मंदिरों का कार्य काफी सराहनीय है।

मंदिरों की अर्थव्यवस्था के अध्ययन को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। मंदिरों और उससे जुड़ी अर्थव्यवस्था भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में लाखों नौकरियां पैदा होंगी। इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा व्यवस्थित प्रबंधन के माध्यम से मजबूत किया जाना चाहिए। उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम में मंदिर, उसके प्रबंधन और उसकी अर्थव्यवस्था को शामिल करना एक समझदारी भरा दृष्टिकोण होगा। युवा अपने प्रयासों और संसाधनों को मंदिरों की अर्थव्यवस्था और संबंधित पर्यटन क्षेत्रों के विस्तार और विकास की दिशा में निर्देशित कर सकते हैं।

एक अन्य विवादास्पद मुद्दा सभी प्रमुख हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को हटाना है। सरकार को एक नया कानून पारित करना चाहिए कि कोई भी राजनीतिक नेता नई मंदिर प्रबंधन समिति का भाग न हो।

दान का उपयोग उस विशेष रिलीजन या धर्म के कल्याण और सामाजिक गतिविधियों के लिए किया जाना चाहिए। आइए, हम मंदिरों की संस्कृति और गतिविधियों को सही दृष्टिकोण से देखें और मंदिरों की अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए मिलकर काम करें।

यह साक्षात्कार भी पढ़ें- धार्मिक यात्राओं से जुड़ा है रोजगार – जयवीर सिंह

Topics: कम्युनिस्ट और कन्वर्जनeducationजगन्नाथ मंदिरCultural Identity of Indiaसंस्कृतिTirupati TempleTemple TradeSomnath templeMeenakshi TempleSocial LifeCultureJagannath TempleScientific Significance of Templesशिक्षाआध्यात्मिकताTemple and Tourism Industryकलाभारत की सांस्कृतिक पहचानCommunist and Conversionartमंदिर व्यापारसोमनाथ मंदिरसामाजिक जीवनSpiritualityमंदिरों का वैज्ञानिक महत्वतिरुपति मंदिरमंदिर और पर्यटन उद्योगमीनाक्षी मंदिर
पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
डॉ पंकज जगन्नाथ जयस्वाल, शिक्षाविद्, लेखक और स्तंभकार हैं [Read more]
Share28TweetSendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

कार्यक्रम

AI केवल तकनीक नहीं, मानवता और नैतिक मूल्यों से जुड़ी शक्ति है: डॉ. चिन्मय पंड्या का युवाओं से आह्वान

ओडिशा : रथयात्रा 2026 की तैयारियां तेज, 42 पहियों का निर्माण पूरा; ओडिशा पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की

जनसांख्यिकीय असंतुलन का समाधान

भगवान सोमनाथ का अभिषेक करते प्रधानमंत्री

सोमनाथ और भारत की अदम्य आत्मशक्ति!

भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)

संघर्ष का प्रतीक है सोमनाथ: अटल बिहारी वाजपेयी

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में शामिल हुए CM माझी, बोले- सोमनाथ मंदिर 140 करोड़ भारतीयों का आत्मसम्मान का प्रतीक

Load More

ताज़ा समाचार

ऑपरेशन डेल्टा हंट के बारे में मीडिया को जानकारी देते उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी

बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ गुजरात में ‘ऑपरेशन डेल्टा हंट’, 72 घंटे में 362 गिरफ्तार

कोर्ट का फैसला

‘प्राइड मंथ’ से पहले ऑस्ट्रेलिया से आया एक चौंकाने वाला फैसला

RSS Karyakarta Vikas Varg Kumar Mangalam Birla

नागपुर: RSS के ‘कार्यकर्ता विकास वर्ग-द्वितीय’ का 4 जून को भव्य समापन, उद्योगपति कुमार मंगलम बिरला होंगे मुख्य अतिथि

8 जून को इंडी गठबंधन की बैठक : अस्तित्व बचाने जुटेंगे 17 विपक्षी दल! क्या अंदरूनी कलह पर होगा मंथन!

former wipro employee alleges forced conversion

नासिक TCS के बाद Wipro में जबरन कन्वर्जन! पूर्व कर्मचारी ने किए चौंकाने वाले खुलासे, मुस्लिम सहकर्मी पर लगाए आरोप

supreme court

न्यायालय के आलोक में बेटी का अधिकार!

RSS Sangh Shiksha Varg Prayagraj Samajik Samrasata

125 गांव, हाथों में थैले और 5000 रोटियां: संघ शिक्षा वर्ग ने पेश की समरसता की मिसाल, घर-घर चूल्हों तक पहुंचा राष्ट्रवाद

ममता बनर्जी काे बड़ा झटका, पार्टी से निष्कासित ऋतब्रत को विधानसभा अध्यक्ष ने दिया नेता प्रतिपक्ष का दर्जा

pithoragarh yakshavati river rejuvenation plantation drive 130 ta eco kumaon

विश्व पर्यावरण सप्ताह : सेना की इको टास्क फोर्स ने शुरू किया यक्षवती नदी पुनर्जीवन, नागरिकों ने दिखाई एकजुटता

न्यूयॉर्क के मेयर मामदानी ने तोड़ी परंपरा! इजरायल डे परेड का किया बहिष्कार, लोगों ने कहा- ‘चला रहे हैं इस्लामिक एजेंडा’

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies