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होम भारत

फिर बहेगी संस्कृति की गंगा

भारतीय और भारतीय मूल के लोग भारत से बाहर रहते हैं, जो अपनी संस्कृति को अपने साथ ले गए और आज भी सहेज कर रखे हुए

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 26, 2022, 04:09 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति
काशी तमिल संगमम् में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर

काशी तमिल संगमम् में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर

3.5 करोड़ से अधिक भारतीय और भारतीय मूल के लोग भारत से बाहर रहते हैं, जो अपनी संस्कृति को अपने साथ ले गए और आज भी सहेज कर रखे हुए हैं। पूरे विश्व में बसा यह लघु भारत बहुत सौम्य और सकारात्मक है।

एक लघु भारत विश्व भर में बसा हुआ है। 3.5 करोड़ से अधिक भारतीय और भारतीय मूल के लोग भारत से बाहर रहते हैं, जो अपनी संस्कृति को अपने साथ ले गए और आज भी सहेज कर रखे हुए हैं। शायद यह संख्या कई देशों की अपनी-अपनी जनसंख्या से भी अधिक हो। पूरे विश्व में बसा यह लघु भारत बहुत सौम्य और सकारात्मक है। कंबोडिया में अंगकोर वाट मंदिर परिसर का भारत द्वारा जीर्णोद्धार किया जा रहा है। अंगकोर वाट का शाब्दिक अर्थ होता है- ‘मंदिरों का शहर’। 1860 में एक फ्रांसीसी खोजकर्ता द्वारा इसकी नए सिरे से खोज किए जाने तक, भगवान विष्णु को समर्पित विश्व का यह सबसे बड़ा हिंदू मंदिर खंडहर बना रहा था।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने जब इसकी घोषणा की थी, तो साथ ही यह भी कहा था कि भारतीय सभ्यता भारत तक ही सीमित नहीं है, यह विभिन्न देशों में फैली हुई है। भारत को एक सभ्यतागत राष्ट्र कहे जाने का अर्थ यही है कि भारत राष्ट्र इन भौगोलिक-राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, जिन्हें मानचित्रों में देखा जाता है।

कंबोडिया स्थित अंगकोरवाट मंदिर

एक सभ्यतागत राष्ट्र के रूप में भारत वहां तक है, जहां तक इसके सांस्कृतिक चिह्न मौजूद हैं, भले ही राजनीतिक और अन्य तरीकों से वह कोई भिन्न देश हो। काशी तमिल संगमम् को ‘समाज और राष्ट्र निर्माण में मंदिरों का योगदान’ विषय पर संबोधित करते हुए डॉ. एस. जयशंकर ने बताया था कि वे उपराष्ट्रपति के साथ दुनिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर- अंगकोर वाट मंदिर परिसर देखने गए थे। भारत अब अंगकोर वाट में मंदिरों का जीर्णोद्धार और मरम्मत का कार्य कर रहा है।

यह वह योगदान है जो भारत अपनी राजनीतिक सीमाओं के बाहर, लेकिन अपनी सांस्कृतिक सीमा के भीतर कर रहा है। इसका अर्थ सिर्फ यह नहीं है कि भारत की सभ्यता का प्रसार कहां तक है, बल्कि इसका अर्थ यह भी है कि भारत के यात्री, भारत के व्यापारी, भारत का ज्ञान, विनिमय और भारत के धार्मिक उपदेशक कहां तक जाते रहे थे।

डॉ. एस. जयशंकर ने उल्लेख किया कि जब वह चीन में भारत के राजदूत थे, तब उन्होंने चीन के पूर्वी तट पर भी भारतीय हिंदू मंदिरों के अवशेषों को देखा था। इसी प्रकार, अयोध्या और कोरिया का बहुत खास और ऐतिहासिक संबंध रहा है। आज कोरिया के लोग बड़ी संख्या में अयोध्या में हो रहे विकास से जुड़ना चाहते हैं। बहरीन का श्रीनाथजी मंदिर भारतीयों द्वारा समुद्र पार करके की गई स्थापनाओं में से एक प्रमुख स्थान है और यह उसी ऐतिहासिक परम्परा के अनुरूप है।

आज भारतीय लोग बहरीन में मंदिर बनवा रहे हैं। वियतनाम में स्थित और स्थापित मंदिरों में भी काफी काम हुआ है। अमेरिका में इस समय 1,000 से अधिक मंदिर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल में रामायण सर्किट बनाने के लिए 200 करोड़ रुपये की राशि देने की घोषणा की है, ताकि हर व्यक्ति भारतीय विरासत का दर्शन कर सके। श्रीलंका में भी भारत ने मन्नार में तिरुकेतीश्वरम मंदिर का जीर्णोद्धार किया है, जो 12 वर्ष से बंद था। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित पांच पवित्र ईश्वरमों में से एक है, जिनकी पूजा पूरे उपमहाद्वीप में विशेषकर, शैव संप्रदाय के लोग करते हैं। यह मंदिर श्रीलंका में सशस्त्र संघर्षों के बाद 12 साल के लिए बंद कर दिया गया था, 2002 में इसे फिर से खोला गया।

नेपाल में 2015 में आए भूकंप के बाद कई मंदिरों को नुकसान पहुंचा था। ये मंदिर भी बहुत पुराने थे। अब भारत ने नेपाल में सांस्कृतिक विरासत की बहाली के लिए 5 करोड़ अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता व्यक्त की है। भारत की सांस्कृतिक धरोहर पूरी मानवता की धरोहर है और पूरी मानवता के लिए है। इसे पुन: विश्व को उपलब्ध कराना भारत का सांस्कृतिक दायित्व है। विश्व भर में मंदिरों के रख-रखाव के दायित्व को स्वीकार करने की घोषणा करके विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत का जो संदेश विश्व तक फिर एक बार पहुंचाने की पहल की है,
पढ़िए उसका विवरण आगे के पृष्ठों में ….

 

Topics: डॉ. एस जयशंकरबहरीन का श्रीनाथजी मंदिरमन्नार में तिरुकेतीश्वरम मंदिरभारतीय और भारतीय मूल के लोग भारतराष्ट्र के रूप में भारतहिंदू मंदिर- अंगकोर वाट मंदिर परिसरभारतीय हिंदू मंदिर
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