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षड्यंत्रकारी बेनकाब : एनजीओवाद की जमीन पर आंदोलनजीवी!

भारत में एनजीओ, माओवादी, नक्सलवादी, एक्टिविस्ट, वकील और मीडिया का एक इकोसिस्टम सक्रिय है

Written byडॉ. अजय खेमरियाडॉ. अजय खेमरिया
Jul 8, 2022, 01:40 pm IST
in दिल्ली
अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया एनजीओ संस्कृति से ही निकल कर राजनीति में आए हैं

अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया एनजीओ संस्कृति से ही निकल कर राजनीति में आए हैं

भारत में एनजीओ, माओवादी, नक्सलवादी, एक्टिविस्ट, वकील और मीडिया का एक इकोसिस्टम सक्रिय है। ये विदेशी चंदे पर समाज और देश-विरोधी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। इन्हें सेकुलर पार्टियों का समर्थन भी हासिल है

दिवंगत सीडीएस जनरल विपिन रावत ने एक बार कहा था कि देश ढाई मोर्चों पर युद्ध लड़ रहा है। पहला चीन, दूसरा पाकिस्तान व आधा सिविल सोसाइटी के भेष में सक्रिय माओवादी, नक्सलवादी, एनजीओवादी, बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट, वकील, मीडिया और सेकुलर नेताओं का एक बड़ा वर्ग। उदयपुर में तालिबानी तरीके से एक हिंदू दर्जी की हत्या पर देश के उदारवादी वर्ग में खास हलचल नहीं है। अंग्रेजी का सर्वाधिक बिकने वाला एक अखबार हमलावरों को ‘ग्राहक’ बताता है, तो हिंदी के एक बड़े अखबार को हमलावरों की पहचान छुपाने में शर्म महसूस नहीं हुई।

असल में मीडिया का एक बड़ा वर्ग आज भी ‘लेफ्ट-लिबरल प्रभाव’ से मुक्त नहीं है। अगर ऐसी ही घटना में पीड़ित कोई अल्पसंख्यक (खासकर मुसलमान) व आरोपी हिंदू होते तो देश भर में माहौल कैसा होता, इसकी कल्पना कीजिए। आंदोलनजीवियों की फौज शहर-शहर शाहीनबाग और टीकरी बॉर्डर जैसी दुकानें सजाकर दुनिया भर में मोदी सरकार से लेकर हिंदुत्व को बदनाम करने में जुटी होती।

लेफ्ट-लिबरल प्रभाव
लेफ्ट-लिबरल विचारधारा ने जिस अभिजन वर्ग को अपने प्रभाव में ले रखा है, जो न केवल भारत विरोधी एजेंडे पर काम करता है, बल्कि उसने शासन, राजनीति व समाज के एक वर्ग की अधिमान्यता हासिल कर रखी है। ये कृषि विशेषज्ञ, राजनीतिक विश्लेषक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, फैक्ट चेकर, विधिवेत्ता जैसे भेष में नजर आते हैं। हर उस बदलाव का विरोध करना इनका मूल धर्म है, जो भारत में सामाजिक बदलाव की बुनियाद रखता है।

अल्पसंख्यकवाद के आगे भारत का आत्मगौरव भाव, बहुसंख्यक चेतना, उसकी अस्मिता, संस्कृति और लोक परंपरा इनके लिए नफरत और हिकारत के विषय हैं। झूठ और सफेद झूठ की सीमा तक नैरेटिव गढ़ना इनका एकमात्र एजेंडा है। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद इस गिरोहबंदी को सत्ता से भरपूर संरक्षण और अंध समर्थन मिलता रहा। तीस्ता सीतलवाड़ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने जो कहा, उसे स्वयंभू राष्ट्रीय चरित्र के मीडिया में कहां और कितनी जगह मिली? इसका तथ्यान्वेषण करें तो गृह मंत्री अमित शाह की बात प्रमाणित होती है, जिसमें वे भारत विरोधी त्रिगुट के हिस्से के तौर पर मीडिया को शामिल करते हैं। यदि किसी दक्षिणपंथी संगठन या उससे जुड़े व्यक्ति को लेकर ऐसे ही किसी मामले में शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की होती तो अंग्रेजी मीडिया से लेकर प्रोपेगैंडा न्यूज पोर्टल पर अलग ही रुदन सुनने और पढ़ने को मिलता।

नीले कुर्ते में आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव

एनजीओवाद से निकल कर आम आदमी पार्टी संसदीय व्यवस्था पर कब्जा जमा रही है, जो भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है। अरविंद केजरीवाल इसी फौज के चतुर खिलाड़ी हैं। अरुणा राय जिस समय राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सोनिया गांधी के साथ काम कर रही थीं, उस समय केजरीवाल सरकारी सेवा में रहते हुए अरुणा के साथ ‘परिवर्तन’ नामक एनजीओ खड़ा कर रहे थे

तीस्ता-मंदर जैसों को शह
तीस्ता ने गुजरात दंगा पीड़ितों के नाम पर देश-दुनिया से चंदा जुटाया, गुलबर्ग सोसाइटी में लाशों का संग्रहालय बनाने के सपने दिखाए, पीड़ितों के नाम से फर्जी शपथ-पत्र दाखिल किए, ‘गुजरात फाइल्स’ नाम से सफेद झूठ दुनिया में प्रचारित किया। फिर भी संप्रग सरकार ने न सिर्फ उसे पद्मश्री, बल्कि राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार भी दे दिया। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली जिस राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने दस साल तक देश को चलाया, तीस्ता उसकी सदस्य भी रही। क्या यह किसी सामान्य सामाजिक कार्यकर्ता के लिए संभव है? निचली अदालत से लेकर शीर्ष अदालत तक, सब जगह तीस्ता का सफेद झूठ उजागर होता रहा, पर किसी मीडिया ने स्क्रीन काली कर प्राइम टाइम पर उसके झूठ को नहीं चलाया। उलटे उसके झूठे तर्कों को दिल्ली के बड़े अखबारों व चैनलों ने प्रमुखता से समाज में स्थापित किया। सच यह है कि तीस्ता इस गठजोड़ की प्रतिनिधि भर है। देश में ऐसे एनजीओ और उनके सरपरस्त भरे पड़े हैं।

संप्रग सरकार के कार्यकाल में पूर्व ब्यूरोक्रेट हर्ष मंदर की हैसियत एक ताकतवर सामाजिक कार्यकर्ता की थी। आजकल वह फरार चल रहे हैं। संप्रग के शासन में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में रहते हुए हर्ष ने देशभर में अपना नेटवर्क खड़ा किया। बिना अनुमति बीसियों बाल गृह खोले और उसमें रहने वाले अनाथ बच्चों को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ धरना-प्रदर्शनों में बिठाया। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की जांच में इसकी कलई खुली। बच्चों के कन्वर्जन से लेकर अराजकता फैलाने के मामले भी सामने आए।

एनजीओ की चकाचौंध
इनके अलावा, फोर्ड फाउंडेशन, एमनेस्टी इंटरनेशनल, डॉन बॉस्को, मिरेकल, एक्शन एड, केन असिस्ट, उदयन केयर, वर्ल्ड विजन, बोन्दी मुक्ति संगठन, हम, जकात, सबरंग, हाशमी ट्रस्ट, सद्भावना, कंपैशन इंटरनेशनल, यंग मेन्स, पीएफआई, नव सृजन ट्रस्ट, पीपुल्स वाच, अनहद, कबीर, लायर्स कलेक्टिव जैसे सैकड़ों एनजीओ हैं, जिनके विरुद्ध बीते 8 साल के दौरान सरकार को गंभीर शिकायतें मिली हैं। इनके विरुद्ध देश में अराजकता का माहौल तैयार करने के प्रमाण हैं।

एनजीओ की चकाचौंध से न्यायपालिका भी अछूती नहीं है। बाल एवं महिला अधिकारों के नाम पर पांच सितारा संस्कृति और सुविधाओं से सुसज्जित प्रशिक्षण और उन्मुखीकरण कार्यक्रमों में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के जज बिना पृष्ठभूमि पता किए शामिल होते हैं। यह समझना मुश्किल नहीं कि तीस्ता, प्रशांत भूषण, अरुणा राय, योगेंद्र यादव और जीवन ज्योति ट्रस्ट जैसे एनजीओ की याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई और निर्देश कैसे जारी होते हैं। कैसे गुजरात दंगों से जुड़ी याचिकाओं पर त्वरित सुनवाई और मनचाहे आदेश जारी होते रहे। वास्तव में सेकुलर राजनीति एनजीओवाद की जमीन पर ही खड़ी है। इसका बौद्धिक दायरा मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों के नीति निर्माण, विश्वविद्यालय और प्रशासन तक स्वयं सिद्ध है। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद एनजीओवाद के चरम प्रभाव का ही उदाहरण थी। इस परिषद में अरुणा राय, हर्ष मंदर,ज्यां द्रेज, दीप जोशी, मिराई चटर्जी, अनु आगा, फराह नकवी, ए.के. शिवकुमार जैसे चेहरे शामिल थे, जो लेफ्ट-लिबरल एजेंडे के लिए जाने जाते हैं। इसी परिषद ने साम्प्रदायिक लक्षित हिंसा निषेध कानून का मसौदा बनाकर पेश किया था। यह कानून लागू हो जाता तो देश में बहुसंख्यक हिंदुओं की स्थिति उदयपुर जैसी होती और समाज तालिबानी संस्कृति में जीने को विवश होता।

मोदी सरकार की सख्ती
एनजीओ एक राजनीतिक ताकत है, जिसका उद्देश्य भारत में विदेशी एजेंडा कायम रखना है, ताकि तुष्टीकरण की आड़ में अल्पसंख्यकवाद, माओवाद, नक्सलवाद और आतंकवाद को तार्किक और न्यायिक साबित किया जा सके और भारत के अभ्युदय या सशक्तिकरण की संभावनाओं को नागरिक समाज की आड़ में हमेशा कमजोर बनाकर रखा जाए। झूठ और झूठे भय के नाम पर समाज में अराजकता की सीमा तक जाकर अपने नियोजित एजेंडे को लागू करना एनजीओवाद का मूल धर्म है। इसके लिए भारत से बाहर 70 साल से एक तंत्र सक्रिय है, जो इन्हें धन मुहैया कराता है। देश की सेकुलर राजनीति ने हमेशा ही इसे संरक्षण दिया। लेकिन मोदी सरकार ने न सिर्फ एनजीओवाद के विरुद्ध कड़े कदम उठाए हैं, बल्कि एफसीआरए में भी संशोधन किए हैं।

एफसीआरए कानून में संशोधन से पूर्व 2010 से 2019 के बीच विदेशी चंदे की आमद दोगुनी दर से बढ़ी। 2016-17 और 2018-19 में विदेशों से 58 हजार करोड़ रुपये देसी एनजीओ के खातों में आए। अकेले अमेरिका से तीन खरब व फ्रांस से दो अरब रुपये भेजे गए। देश के करीब 22,500 एनजीओ कानून में संशोधन से पहले इस्लामिक देशों, कनाडा, फ्रांस, अमेरिका, कतर, तुर्की, जापान, चीन जैसे देशों से चंदा हासिल करते रहे हैं। सरकार ने ऐसे करीब 21 हजार एनजीओ के लाइसेंस निरस्त किए हैं। फिर भी देश में पंजीकृत 33 लाख एनजीओ में से मात्र 10 प्रतिशत ही सरकार से अपना हिसाब-किताब साझा करते हैं। इसी से एनजीओवाद की ताकत और सत्ता प्रतिष्ठानों में उनके प्रभाव का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। प्रधानमंत्री जिन आंदोलनजीवियों की ओर इशारा करते हैं, वे एनजीओवाद का ही एक संस्करण है। सत्ता, मीडिया, बौद्धिक जगत, न्यायिक प्रशासन के अतिशय संरक्षण को तीस्ता प्रकरण से आसानी से समझा जा सकता है। तीस्ता इस खेल की अकेली खिलाड़ी नहीं है।

एनजीओवाद का उदाहरण आआपा
इसी एनजीओवाद से निकल कर आम आदमी पार्टी संसदीय व्यवस्था पर कब्जा जमा रही है। यह भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है। अरविंद केजरीवाल इसी फौज के चतुर खिलाड़ी हैं। अरुणा राय जिस समय राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में सोनिया गांधी के साथ काम कर रही थीं, उसी समय केजरीवाल सरकारी सेवा में रहते हुए अरुणा के साथ ‘परिवर्तन’ नामक एनजीओ खड़ा कर रहे थे।

2006 में फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर ब्रदर्स फंड ने उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरुस्कार दिलवा दिया। उभरते नेतृत्व के नाम पर केजरीवाल को यह पुरस्कार किस काम के लिए मिला, इसे उनकी राजनीतिक स्थिति के साथ आसानी से समझा जा सकता है। यानी एक वैश्विक इकोसिस्टम है, जो एनजीओ के माध्यम से भारत में संसदीय राजनीति को न केवल प्रभावित करता है, बल्कि उसमें अपने प्यादे भी फिट कर रहा है।

मैग्सेसे से मिले धन से केजरीवाल ने ‘पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन’ एनजीओ बनाया और इसी समय मनीष सिसौदिया के एनजीओ ‘कबीर’ के साथ मिलकर लेफ्ट-लिबरल एजेंडे पर काम शुरू कर दिया। ‘कबीर’ का गठन अगस्त 2005 में हुआ, पर फोर्ड फाउंडेशन ने उसे जुलाई 2005 से ही फंड देना शुरू कर दिया था। ‘कबीर’ को 2005 में 1.72 लाख डॉलर और 2008 में 1.97 लाख अमेरिकी डॉलर की सहायता मिली। यही नहीं, ‘कबीर’ और ‘परिवर्तन’ को नीदरलैंड के एनजीओ ‘हिवोस’ से भी 2008 और 2012 के बीच 13 लाख यूरो की सहायता मिली।

अमेरिका के एक अन्य एनजीओ ‘आवाज’ ने जनलोकपाल आंदोलन समेत दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए केजरीवाल कंपनी को धन मुहैया कराया। ‘आवाज’ ने सीरिया, मिस्र, लीबिया की सरकारों को अस्थिर करने के लिए स्थानीय एनजीओ, शिक्षाविदों, पत्रकारों को बड़ी आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई थी। संप्रग सरकार के कार्यकाल में 2004 से 2008 तक भारत में 40 हजार करोड़ रुपये की रकम लेफ्ट-लिबरल प्रभाव वाले एनजीओ को हासिल हुई थी।

वैश्विक रूप से इसके वित्तपोषण पर जैसे ही मोदी सरकार ने चोट की तो यह वर्ग सरकारी नीतियों के विरुद्ध आम आदमी को अराजकता की ओर उकसाने में लग गया। सरकार ने एनजीओवाद की बुनियाद पर कानूनी प्रहार करके इस गिरोहबंदी को तोड़ने का काफी प्रयास किया है, लेकिन सच्चाई यह है कि एनजीओवाद भारत में अपनी जड़ें जमाए हुए है। 

एनजीओवाद के हितधारक के रूप में मीडिया के एक बड़े वर्ग का भी भारत में इसी तर्ज पर वित्तपोषण किया जाता रहा है। बदले में मीडिया एनजीओ द्वारा गढ़े जाने वाले नैरेटिव को समाज में स्थापित करता है। अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा गठित संस्था ‘पडोस’ सामुदायिक विकास की आड़ में फोर्ड फाउंडेशन से मिलने वाले धन को भारत समेत अन्य देशों में मीडिया पर खर्च करती है। राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकारों के संबंध ‘पॉपुलेशन काउंसिल’ जैसी संस्थाओं से जगजाहिर हैं, जिसे अमेरिकी संस्था ‘रॉकफेलर ब्रदर्स’ धन मुहैया करती है। यह संस्था ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के साथ मिलकर मैग्सेसे पुरस्कार मैनेज करती है। इसके लिए रवीश कुमार जैसे पत्रकार के चयन से इस पूरे एनजीओ तंत्र को आसानी से समझा जा सकता है। राना अय्यूब को जिस तरह न्यूयॉर्क टाइम्स आगे रखकर भारत विरोधी एजेंडे पर काम करता है, उसे शाहीन बाग और कोविड की दुष्प्रेरित रिपोर्ट से समझना कठिन नहीं है। किसान आंदोलन, नागरिकता संशोधन बिल, अग्निपथ योजना से लेकर हिजाब और अनुच्छेद-370 पर मीडिया के चिह्नित बड़े वर्ग का भड़ाकाऊ रुख इसी एनजीओ इकोसिस्टम से परिचालित है।

देश में राजनीति, प्रशासन से लेकर अदालत तक एनजीओवाद की गहरी जकड़ में फंसे हुए हैं। अमेरिकी, यूरोपीय और अरब जगत के एजेंडे पर काम करने वाला एक सशक्त बौद्धिक तंत्र आज भी हर मोर्चे पर सक्रिय है। इस इकोसिस्टम ने राजनीति में आआपा से लेकर जातिवादी और पारिवारिक क्षेत्रीय दलों को अपना स्थानीय टूल बना रखा है। वैश्विक रूप से इसके वित्तपोषण पर जैसे ही मोदी सरकार ने चोट की तो यह वर्ग सरकारी नीतियों के विरुद्ध आम आदमी को अराजकता की ओर उकसाने में लग गया। सरकार ने एनजीओवाद की बुनियाद पर कानूनी प्रहार करके इस गिरोहबंदी को तोड़ने का काफी प्रयास किया है, लेकिन सच्चाई यह है कि एनजीओवाद भारत में अपनी जड़ें जमाए हुए है।

Topics: एनजीओवादआंदोलनजीवीसरकारी नीतिआदमीजनरल विपिन रावत
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