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सशक्त स्त्री, समर्थ भारत

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 8, 2022, 05:50 am IST
in भारत, दिल्ली
खेल और स्टार्टअप की दुनिया तक महिलाएं

खेल और स्टार्टअप की दुनिया तक महिलाएं

समय के साथ महिलाओं से जुड़े नए मुद्दे भी नए सामाजिक विमर्शों की राह तैयार कर रहे हैं। वैवाहिक जीवन में बलात्कार का मुद्दा हो, लड़कियों के विवाह की आयु बढ़ाने की बात हो, या हिजाब की बात, ये मुद्दे समाज को मथ रहे हैं। महिलाएं इन मुद्दों पर सोच रही हैं, कुछ बिंदुओं पर सहमत हैं तो कुछ बिंदुओं पर उनकी चिंताएं हैं। महिलाओं के मुद्दे पर उन्हीं की राय को सामने रखता है पांचजन्य का यह आयोजन। अच्छी बात यह है कि कुछ राज्यों में महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, खेती-किसानी से लेकर स्वयं सहायता समूह, समाज, खेल और स्टार्टअप की दुनिया तक महिलाएं उपलब्धियां हासिल कर रही हैं। देश के एक हिस्से में मातृवंशीय समाज है तो कई स्थानों पर महिला संचालित बाजार हैं। परंतु कुछ राज्यों में महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए अभी भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत


उपयुक्त शिक्षा के बाद ही विवाह करें लड़कियां

सुनीला सोहवानी, प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय सेविका समिति


लड़कियों को उपयुक्त शिक्षा अर्जित करने के बाद ही विवाह करना चाहिए लेकिन शादी की उम्र ‘थोपने’ से वांछित परिणाम शायद नहीं मिल पाएंगे। लड़कियों को उचित पालन-पोषण एवं शिक्षार्जन के बाद शादी करनी चाहिए ताकि वे एक समर्थ इंसान बन सकें।

चूंकि पुरुष की विवाह की उम्र 21 है, केवल इसलिए महिला की उम्र भी 21 तय की जाए, यह ठीक नहीं है। लड़की शिक्षित हो जाए, विवाह का अर्थ समझ सके। जिससे विवाह होना है, उसे समझ सके, इसके बाद ही विवाह होना चाहिए। महिलाओं की शादी की उम्र जैसे सामाजिक मुद्दों पर कुछ थोपने से शायद वांछित परिणाम नहीं मिलेगा। ऐसे मुद्दों से जन-जागरूकता एवं व्यापक विचार-विमर्श के बाद निपटना बेहतर होता है। राष्ट्रीय सेविका समिति ल़ड़कियों में जनजागृति के पक्ष में है। बच्चियों की पढ़ाई ठीक से हो, अर्थार्जन करने की क्षमता भी हो, विवाह करने के लिए जो योग्यता, क्षमता होती है, वह लड़कियों में आने के बाद ही उन्हें विवाह करना चाहिए। हम इस बात का विरोध करते हैं कि विवाह की उम्र निर्धारित की जाए या उसका स्तरीकरण किया जाए। हम बाल विवाह का भी विरोध करते हैं।

राष्ट्रीय सेविका समिति ने इस संबंध में समाज की राय जुटाई है। हमारे द्वारा अपने कार्यकर्ताओं एवं समाज से जुटाई गई राय के अनुसार लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने के संबंध में दोनों प्रकार के विचार हैं। कुछ इसके पक्ष में हैं तो कुछ इसके विरोध में भी हैं।


परिवार संस्था के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय साजिश

सर्जना शर्मा, पत्रकार, दिल्ली


आजकल वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) पर चर्चा गर्म है। एकदम पश्चिमी सेकुलर लिबरल सोच, देह की आजादी की मांग वाले गैंग की साजिश। वैवाहिक बलात्कार के संदर्भ में कानून की मांग, महज कानून की अपेक्षा नहीं है बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय साजिश है। भारत की पवित्र विवाह संस्था और सुदृढ़ परिवार इकाई पैन इस्लामिक और पैन ईसाई देशों के निशाने पर है। इसीलिए कानून बनवाने की जल्दी है। परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। अगर परिवार टूटा तो समाज टूटेगा, समाज टूटा तो देश टूटेगा।

क्या इतना आसान है मैरिटल रेप को भारतीय समाज में स्थापित करना जहां 90 प्रतिशत पत्नियां आज भी मां सीता और सती अनुसूइया के पद चिन्हों पर चलती हैं। पति-पत्नी का रिश्ता भारत में कॉंट्रेक्ट नहीं बल्कि सात जन्मों का बंधन है। विवाह अनुबंध नहीं, सोलह संस्कारों में से एक है। सप्तपदी के सात वचन पति-पत्नी के एक-दूसरे के प्रति विश्वास, त्याग और समर्पण का संकल्प हैं।

इस परिवार संस्था को तोड़ना अर्बन नक्सल का षड्यंत्र है। एक पूरा गैंग है जो सनातन संस्थाओं, मान्यताओं पर आघात करने के लिए विदेशों से निर्देशित होता है। इनका दोमुंहापन देखिए कि कोई हिंदू महिला सिंदूर लगा ले, चूड़ी पहन ले या सर पर आंचल रख ले तो वह पिछड़ी और दकियानूसी सोच की हो जाती है। दूसरी तरफ, हिजाब पहनने को ये उनके मौलिक मजहबी अधिकार का मामला बताते हैं।

किसी को पति-पत्नी के एकांत पलों में घुसने की इजाजत नहीं है। यह कौन तय करेगा कि पत्नी ने मना किया। पति-पत्नी के बीच कुछ होता है तो उन्हें खुद मामला सुलझाने दीजिए। यह उनकी निजता है। कानून कौन होता है अधिकृत निजी पलों में घुसपैठ करने वाला। न्यायालयों को ऐसे मुद्दों पर विचार ही नहीं करना चाहिए। यह भावी पीढ़ी की लड़कियों के मस्तिष्क को दूषित करने का षड्यंत्र है। जिन्हें वैवाहिक बलात्कार के लिए कानून चाहिए, वे हलाला जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध न्याय क्यों नहीं मांगते।

 

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लव जिहाद से बच सकेंगी लड़कियां

अर्पिता चटर्जी,  सामाजिक कार्यकर्ता, कोलकाता


लड़कियों की शादी की उम्र 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष करने का प्रस्ताव है। लड़की के परिपक्व होने का समय उसकी पारिवारिक स्थितियों पर निर्भर करता है। किसी समाज में लड़की पहले ही परिपक्व हो जाती है, तो जहां पलकों पर बिठा कर रखा जाता है, वहां लड़की के परिपक्व होने का समय अलग है। हालांकि 18 वर्ष की तुलना में 21 वर्ष में ज्यादा परिपक्वता आ जाती है। इसीलिए इसे ठीक कहा जा सकता है। हालांकि एक महिला होने के नाते मैं यही कहूंगी कि लड़की को दुनिया पहचानने में 25-26 साल लग जाते हैं। लड़कियों के स्वास्थ्य के लिहाज से भी 21 वर्ष की उम्र सही है क्योंकि पहले का खानपान शुद्ध हुआ करता था, परंतु आज शुद्ध नहीं है। इसलिए शरीर के स्वास्थ्य के ख्याल से तीन साल बढ़ाना अच्छा है। दूसरी बात, विवाह की उम्र तीन साल बड़ाने से आर्थिक रूप से भी मजबूत होने का मौका मिलता है।

यहां यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि हमारी लड़कियों के विरुद्ध युद्ध चल रहा है। हमारे संस्कारों, संस्कृति और धर्म के नाम पर षड्यंत्र किया जा रहा है। लव जिहाद जैसे तरीकों से पहचान छुपाकर, लड़कियों को बरगला कर शादियां हो रही हैंै। विवाह की उम्र बढ़ने से लड़की की समझ बढ़ेगी और वह बरगलाने में कम आएगी।  

जहां तक वैवाहिक बलात्कार पर कानून बनाने का प्रश्न है, यदि किसी महिला को उसके निजी जीवन में ज्यादा प्रताड़ित किया जाता है तो उसे आवाज उठानी चाहिए। यदि ल़ड़की को अपने पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में ज्यादा परेशानी हो रही है तो उसे विवाह के बंधन से बाहर निकल आना चाहिए। यदि मामला सुलझ सकता है तो उन्हें आपस में या परिवार की मदद से सुलझा लेना चाहिए। इसमें न्यायालय हस्तक्षेप करे, यह ठीक नहीं है। अगर किसी पत्नी को लगता है कि उसका पति उससे बलात्कार कर रहा है तो पत्नी को उसे छोड़ने का हक है। हालांकि हमारे हिंदू धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी कहा गया है। इसमें वैवाहिक बलात्कार का मतलब ही नहीं है। यह बिल्कुल आधारहीन है।


विवाह की उम्र बढ़ाने पर विमर्श की जरूरत   

हर्षिता पांडे, पूर्व अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग


लड़कियों की विवाह की उम्र 18 से 21 वर्ष करने के प्रस्ताव पर और विचार-विमर्श की जरूरत है। इसमें मनोवैज्ञानिक पक्ष, सामाजिक पक्ष, आर्थिक पक्ष और शारीरिक पक्ष के हिसाब से देखना होगा। यह कानून का विषय नहीं है। पारिवारिक ताना-बाना कैसा है, किस तरह की धार्मिक परंपराएं हैं, इनके साथ शारीरिक और मानसिक परिपक्वता की स्थिति क्या है, यह सब देखना होगा, केवल विधिसम्मत कहने से बात नहीं बनेगी। विमर्श में इन विषयों को शामिल करने के बाद ही निष्कर्ष निकालना ठीक होगा।

जहां तक हिजाब का विषय है तो यह एक मजहबी मामला है। जब हम सामाजिक दृष्टि से बात करते हैं तो ये सारी छूट उन्हें अल्पसंख्यक के नाते हैं। मुस्लिमों की संख्या लगभग 20 प्रतिशत है। ऐसे में मुझे लगता है कि अल्पसंख्यक को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। मुझे लगता है कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति इतनी समझ तो जरूर रखता है कि शैक्षणिक संस्थाओं की व्यवस्था के अनुसार अनुशासन का पालन करना चाहिए। कोई भी धर्म-मजहब अपनी पहचान शैक्षणिक संस्थाओं पर लादेगा तो उसका विरोध होना चाहिए।

जहां तक वैवाहिक बलात्कार का मामला है उसमें अभी तक जो भी कानून हैं, वे अंग्रेजों द्वारा लादे हुए कानून हैं। अब भारत में परिवर्तन आए हैं और हमें यह समझना होगा कि संस्कृति को संरक्षित करते हुए कानून बनाने होंगे। पहले जो हमारी परंपराएं रही हैं, वह कारगर और मजबूत रही हैं। जहां विश्वास और सम्मान है, वहां पर इस तरह का विषय ही नहीं उठता। आज टूटते हुए और असंगठित परिवारों के कारण समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। हमारे परिवार एक अनुशासित संस्था के रूप में काम करते थे। हमारे संस्कारों में कमजोरी आई है, इसलिए समस्या है। अगर संस्कार रूपी आधारशिला मजबूत रहेगी, तो इस तरह के चीजों का स्थान ही समाज में नहीं रहेगा। 
 


पति-पत्नी के निजी पलों में तीसरे का हस्तक्षेप गलत

डॉ. रचना अरोड़ा, उधमसिंह नगर, उत्तराखंड


विवाह की उम्र 18 वर्ष से बढ़ा कर 21 वर्ष करने का प्रस्ताव बहुत ही सराहनीय कदम है। मां बनने के समय पर निर्णय लेने होते हैं। स्नातक करने में उम्र 20 साल हो जाती है और लड़कियों को आत्मनिर्भर भी बनना है। इस दृष्टि से यह एक सराहनीय कदम है। लड़की जब 18 साल की होती है तो सामाजिक दबाव बनने लगता है। अब यह 21 साल में होगा तो उनकी आत्मनिर्भरता, पढ़ाई, उनके स्वास्थ्य की दिशा में उनके लिए और अधिक रास्ते खुलेंगे। उम्र 21 साल होने पर लड़कियों में मानसिक रूप से वह परिपक्वता आ जाती है कि वे अपने लिए सोच-समझ सकती हैं।

जहां तक शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पहनने की जिद है, तो वह मात्र संकीर्णता है। यह रूढ़िवादिता है, सांप्रदायिक कट्टरता है। मुझे लगता है, कहीं न कहीं मुस्लिम महिलाएं भी इसके पक्ष में नहीं हैं। यदि कोई ऐसा कर रही है तो कहीं न कहीं उनकी मजबूरी है। बड़ी मुश्किल से तो स्वतंत्रता मिली,  आत्मनिर्भरता की तरह बढ़ रही हैं। कायदे से देखा जाए तो उन्हें भी तो अन्य की तरह खुला आसमान मिल रहा है।

जहां तक विवाह में बलात्कार पर कानून बनाने की मांग है, मैं एक आम महिला होने के नाते कह सकती हूं कि पति-पत्नी के निजी पलों में किसी तीसरे का हस्तक्षेप गलत है। कभी-कभी इसके कारण दूसरे लोग गलत फायदा भी उठा सकते हैं। कभी-कभी खुद ही गलत होते हुए स्त्री अपने पति और परिवार वालों को गलत साबित करती है। यदि कहीं उत्पीड़न होता है तो इसका अर्थ है कि हम जागरूक नहीं हैं। अगर कोई सक्षम-जागरूक महिला होगी और विरोध करना चाहेगी तो वह बिना कानून के स्वयं विरोध कर सकती है, उसमें कानून के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। और, जो नहीं कर पाएगा, वह चाहे कितने भी कानून बन जाएं, विरोध नहीं करेगा, उलटे दूसरे गलत ढंग से फायदा उठाएंगे। मुझे ऐसा लगता है कि यह पति-पत्नी एवं परिवार को तोड़ने की साजिश है। इससे आपस में विश्वास खत्म हो जाएगा और परिवार में विघटन बढ़ जाएगा। 


लड़कियों को मिलेगा अपने फैसले लेने का मौका

नीलम गास , सामाजिक कार्यकर्ता, कश्मीर


विवाह की उम्र 18 वर्ष से बढ़ा कर 21 वर्ष करने के प्रस्ताव को हम भारत में राजनीतिक नजरिये से अलग-अलग तरीके से देखते हैं। मुस्लिम लड़कियों के लिए सरकार फैसला नहीं कर सकती। हिन्दू लड़कियां पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े होने के बाद भी अपने खुद के बारे में फैसले नहीं ले पा रही थीं। ऐसे में इस प्रस्ताव से उन्हें अपने भविष्य के बारे में सोचने का और फैसला लेने का मौका मिलेगा।

जहां तक शैक्षणिक संस्थाओं में हिजाब पहनने का प्रश्न है, कोई लड़की इसे मानती है और कोई नहीं मानती है, इसलिए हमें इसे मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। अगर कोई हिजाब पहनकर स्कूल जाना चाहती है तो जाए। हिजाब ऐसी कोई चीज नहीं है जो आपके जिंदगी को खराब करती है। हमें एक-दूसरे के धर्म-मजहब एवं पहनावे का आदर करना चाहिए। हमारा देश बहुसांस्कृतिक देश है, इसलिए हमें किसी भी पहनावे पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अभी कोरोना काल चल रहा है और सभी लोग अपने चेहरे पर मास्क लगाकर परीक्षा वगैरह देने जाते हैं तो इसके लिए हमारी पहचान के तौर पर आईडी कार्ड की जांच की जाती है। यदि विद्यालय में अनुशासन की बात है तो उसमें हमें थोड़ा बदलाव लाना चाहिए जिससे हमारे बीच भाईचारा बना रहे। इसमें कोई बुराई नहीं है। इसे इतना बड़ा मुद्दा बनाना ठीक नहीं है। हम लोग भारतीय होने के नाते इससे आगे बढ़कर सोच सकते हैं। हम लोग आगामी पीढ़ी को यह सीख देने का प्रयास करें कि हमलोग सभी धर्म-मजहब एक साथ मिलकर प्रेम से रह सकते हैं। हमारे अलग-अलग धर्म-मजहब होने के बावजूद हम एक हिन्दुस्तानी होने पर गर्व महसूस करें, ऐसा प्रयास होना चाहिए। विवाह में बलात्कार पर कानून के बारे में मेरा मानना है कि अगर पत्नी आपको छूने नहीं देती है तो आप मत छुओ। इसके लिए पहले कानून नहीं बना था परंतु अब कानून बनने से इसके लिए एक दबाव बनेगा और घरेलू हिंसा में बहुत कमी आएगी। 

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