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वाइ-फाइ से एक कदम आगे है लाइ-फाइ!

Written byबालेन्दु शर्मा दाधीचबालेन्दु शर्मा दाधीच
Dec 30, 2021, 12:14 pm IST
inमत अभिमत, विज्ञान और तकनीक, गुजरात
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

 

वाइ-फाइ के विकल्प के तौर पर लाइ-फाइ की तकनीक प्रचलित हो रही है। इसमें रोशनी के सहारे इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जा रही है। कई कंपनियां इस बाजार में उतरीं

गुजरात के अरावली जिले के दो गांव—अकरुंड और नवानगर भारत के दो पहले ऐसे स्मार्ट गांव बन गए हैं जहां बिजली की रोशनी के जरिए इंटरनेट कनेक्टिविटी मुहैया कराई जा रही है। बल्ब जला और जहां-जहां उसकी रोशनी पहुंची, वहां-वहां अपने-आप इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुंच गई! वाइ-फाइ की ही तरह इस तकनीक को नाम दिया गया है— लाइ-फाइ। नव वायरलैस टेक्नोलॉजी नाम के एक स्टार्टअप ने इसकी व्यवस्था की है जिसके तहत दोनों गांवों के कई दफ्तरों और घरों में इंटरनेट का इस्तेमाल हो रहा है। बिजली की रोशनी से इंटरनेट? भला रोशनी का इंटरनेट से क्या ताल्लुक हो सकता है; हममें से अधिकांश लोगों के मन में यही सवाल आएगा। लेकिन दोनों के बीच संबंध है।

रोशनी के जरिए वायरलैस संकेतों और डेटा को प्रवाहित किया जा सकता है, यह विचार 2011 में एडिनबरा विश्वविद्यालय में मोबाइल संचार के प्रोफेसर हेराल्ड हास ने एक टेड टॉक में पेश किया था। उनके एक और सहयोगी थे डॉ. मुस्तफा अफगानी। बाद में दोनों ने मिलकर एक कंपनी प्योर लाइ-फाइ (लाइ-फाइ माने लाइट फिडेलिटी) भी शुरू की जिसके तहत रोशनी के जरिए इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने वाले उपकरण बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। तब यही लगा था कि यह सब विश्वविद्यालयों में होने वाले अनगिनत प्रयोगों में से एक है और कुछ दिनों में दो-चार जगह पर चौंकाने वाले प्रदर्शन करने के बाद मामला ठंडा पड़ जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आज लाइ-फाइ से लैस उपकरण बाजार में आ गए हैं। भारत में भी कई कंपनियां हैं। मसलन फिलिप्स लाइटिंग ने जहां अपनी प्रणाली को ट्रू लाइ-फाइ का नाम दिया है वहीं एक और कंपनी विप्रो भी प्योर लाइ-फाइ के साथ मिलकर भारतीय उपभोक्ताओं को यह सेवा देना शुरू कर रही है। कुछ स्टार्टअप भी इस दिशा में काम कर रहे हैं, जैसे- नव वायरलैस टेक्नोलॉजी और वेलमेनी।

रोशनी के जरिए डेटा के संचार पर ताज्जुब होता है। लेकिन जरा सोचिए कि क्या यह वाकई कोई अनहोनी-सी बात है? रेडियो तरंगों की ही तरह प्रकाश भी तरंगों के रूप में आगे बढ़ता है। हालांकि दोनों की कार्यप्रणाली में कई तरह के फर्क हैं लेकिन कई समानताएं भी हैं। अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रारेड किरणों का इस्तेमाल संकेतों को पहुंचाने के लिए पहले से किया जा रहा है। दृश्य प्रकाश संचार (विजिबल लाइट कम्युनिकेशन) के जरिए संकेतों को पाने और भेजने की अवधारणा सन् 1880 से ही प्रचलन में है। फाइबर आप्टिक नेटवर्किंग तकनीक के बारे में भी आपने सुना ही होगा। तांबे के तारों के विकल्प के रूप में विकसित इस नेटवर्किंग प्रणाली में डेटा संचार के लिए प्रकाश किरणों का इस्तेमाल होता है और यह तारों वाले पारंपरिक नेटवर्कों की तुलना में बहुत ज्यादा तेज रफ़्तार से डेटा का संचार करने में सक्षम है। वाइ-फाई नेटवर्क में जहां रेडियो तरंगों का इस्तेमाल होता है, वहीं लाइ-फाइ में प्रकाश तरंगों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी बैंडविड्थ रेडियो तरंगों की तुलना में काफी ज्यादा होती है।

 

दो गांव—अकरुंड और नवानगर भारत के दो पहले ऐसे स्मार्ट गांव बन गए हैं जहां बिजली की रोशनी के जरिए इंटरनेट कनेक्टिविटी मुहैया कराई जा रही है। बल्ब जला और जहां-जहां उसकी रोशनी पहुंची, वहां-वहां अपने-आप इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुंच गई! वाइ-फाइ की ही तरह इस तकनीक को नाम दिया गया है— लाइ-फाइ

लाइ-फाइ के तहत बिजली के अनेक बल्बों को मिलाकर एक वायरलैस नेटवर्क कायम किया जाता है। जब किसी एलईडी बल्ब में बिजली का करेंट प्रवाहित किया जाता है तो वह रोशनी (फोटोन्स) की धारा उत्सर्जित करता है। एलईडी बल्ब एक अर्धचालक युक्ति हैं जिनकी रोशनी की तीव्रता को बहुत तेज रफ्तार से कम-ज्यादा किया जा सकता है। लाइ-फाइ तकनीक के तहत उनकी इसी विशेषता का लाभ उठाया जाता है और रोशनी को अलग-अलग स्तरों पर प्रवाहित करके, अलग-अलग तीव्रता वाले संकेत भेजे जाते हैं। एक दूसरा उपकरण इन संकेतों को ग्रहण करके उन्हें डेटा में बदल देता है। यह सारी प्रक्रिया इनसानी आंखों को दिखाई नहीं देती, इसलिए वहां मौजूद लोगों को पता नहीं चलेगा कि वहां रोशनी के अलावा कोई और गतिविधि भी संचालित हो रही है। इस तरह से एलईडी बल्बों की रोशनी के जरिए बहुत तेज रफ्तार से डेटा को प्रवाहित करना संभव है।

यही लाइ-फाइ का सबसे बड़ा फायदा भी है। दूरदराज के क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुंचाने के लिहाज से यह पारंपरिक वाइ-फाइ प्रणाली से कम खर्चीला और ज्यादा असरदार माध्यम सिद्ध हो सकता है। यह वाइ-फाइ नेटवर्कोें पर मांग के खासे दबाव का भी समाधान पेश कर सकती है। आपका सवाल होगा कि रेडियो तरंगों की तुलना में रोशनी की यात्रा एक सीध में होती है, चारों तरफ नहीं। आपका सोचना सही है। लाइ-फाइ आधारित संकेत भी दीवारों के परे नहीं जा सकते और सिर्फ उतने ही क्षेत्र में काम करते हैं जहां तक रोशनी जाती है। लेकिन इसमें एक अच्छाई भी है कि दीवारों से परे बैठा कोई इनसान लाइ-फाइ नेटवर्क को उसी आसानी से हैक नहीं कर सकेगा जैसे वह वाइ-फाइ नेटवर्क को कर सकता है। 

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