एकात्मता के पुजारी श्री नारायण गुरु
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होम भारत

एकात्मता के पुजारी श्री नारायण गुरु

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 9, 2021, 11:51 am IST
inभारत, धर्म-संस्कृति, दिल्ली

सीताराम व्यास

 


श्री नारायण गुरु के आडम्बर रहित मन्दिरों के निर्माण से सामाजिक बुराइयों में सहज सुधार दिखाई देता है। उन्होंने अपने अनुयायियों को यही शिक्षा दी कि वे अन्य सम्प्रदायों की आलोचना न करें, न ही उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाएं। इसके परिणामस्वरूप उच्च जाति के लोग भी उनके अनुयायी बन कर समाज सुधार में सहभागी बने और अस्पृश्यता विरोधी आन्दोलन चला, जेल भी गये


महान संत  श्री नारायण गुरु जैसे समर्पित, त्यागी, बलिदानी समाज-सुधारक की केरल से प्रज्वलित अहिंसक मूक क्रान्ति की मशाल भारत को आलोकित करते हुए विश्व के क्षितिज को स्पर्श करती दिखाई दे रही है।  श्री नारायण गुरु ने सरल भाषा में प्रभावशाली और प्रेरक उपदेश दिये, जिससे समस्त हिन्दू समाज प्रभावित होकर समरसता की सुरसरि में अवगाहन करने लगा। वे समाज में व्याप्त भेदभाव को मिटाकर समन्वय, सौहार्द और भाईचारा स्थापित करना ही अपने जीवन का मूल उद्देश्य मानते थे। उनकी मधुर वाणी से उच्चरित सरल, सुस्पष्ट सन्देश था: ‘शिक्षित हो आजो, ताकि तुम्हें स्वतन्त्रता मिल सके। अपने आपको संगठित करो, ताकि तुम्हारी आर्थिक स्थिति सुधर सके।’

मूक क्रांति
श्री नारायण गुरु  के आविर्भाव से पूर्व केरल का हिन्दू समाज छुआछूत से पूरी तरह जकड़ा हुआ था। केरल की विषम सामाजिक स्थिति को देखकर स्वामी विवेकानन्द ने आहत होकर कहा था 'केरल भारत का पागलखाना' बन गया है। एक अछूत व्यक्ति की छाया से उच्च वर्ण का व्यक्ति अशुद्ध हो जाता था। ऐसी दयनीय स्थिति में श्री नारायण गुरु ने केरल को पागलखाने के बदनाम विशेषण से मुक्त करवा भारत के पुनर्जागरण का केन्द्र बना दिया। यद्यपि उनका कार्यक्षेत्र केरल ही रहा, पर उनके कार्य ने सम्पूर्ण भारत में क्रांतिकारी परिवर्तन का सन्देश दिया। उन्होने केरल के उपेक्षित समाज के उत्थान हेतु कार्य किया पर समाज में कटुता पैदा नहीं होने दी।  उन्होंने यह विलक्षण कार्य उस समय किया जब अन्य समाज सुधारकों ने घृणा और विद्वेष फैलाने वाले आन्दोलन चलाये,  लेकिन श्री नारायण गुरु की मूक क्रान्ति ने खून की एक भी बूंद गिराए बिना अपने स्नेहपूर्ण व्यवहार से सहज परिवर्तन लाकर दिखा दिया। उन्होंने शंकर के अद्वैत दर्शन का आधार लेकर हिन्दू समाज को एकत्व का दर्शन कराया।

श्री नारायण गुरु के आडम्बर रहित मन्दिरों के निर्माण से सामाजिक बुराइयों में सहज सुधार दिखाई देता है। उन्होंने अपने अनुयायियों को यह शिक्षा दी कि वे अन्य सम्प्रदाय की आलोचना न करें, न ही उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाएं। इसका परिणाम यह हुआ कि उच्च जाति के लोग भी उनके अनुयायी बन कर समाज सुधार में सहभागी बने और अस्पृश्यता विरोधी आन्दोलन चला जेल भी गये। श्री नारायण गुरु  की प्रेरणा से हिन्दू समाज के हजारों लोग अछूत बन्धुओं को मन्दिर प्रवेश कराने हेतु त्रावणको के महाराजा को ज्ञापन देने के लिए लम्बी पैदल यात्रा करके गये। उनके बहुत से अनुयायी ब्राह्मण जाति के थे। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा है, मैंने संसार के विभिन्न भागों की यात्रा की है। इस यात्रा में अनेक संतों और ऋषियों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, किन्तु यह सत्य है कि कोई ऐसा आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं मिला जो केरल के श्री नारायण गुरु से महान हो और न ही कोई व्यक्ति मिला है, जिसने इनके समान आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की हो। …मैं उस तेजस्वी व्यक्तित्व को कभी नहीं भूल सकता जो दैवी आलोक से, स्वप्रकाश से दैदीप्यमान हो। मैं उन योगी के नेत्रों को भी नहीं भूल सकता जो दूर क्षितिज में अनिमेष भाव से स्थिर थे।’’

ऐसी दिव्य विभूति  का जन्म 20 अगस्त,1856 को, त्रिवेन्द्रम से 12 मील दूर चेम्बा जनती नामक कस्बे में ऐजवा (अस्पृश्य) जाति में हुआ। उस समय सवर्ण ऐजवा से 32 फुट की दूरी से सम्पर्क में आने पर अशुद्ध हो जाता था। ऐजवा जाति से छोटी जाति की दूरी भी तय रहती थी। उनके पिता का नाम मदन और माता का नाम कुट्टी था।  पिता वैद्य थे। श्री नारायण महाकवि कुमार आश्र के शिष्य थे। वे उन्हें ‘नानू’ कह कर पुकारते थे। नानू बचपन से शरारती था। उसे परम्परावादी सवर्णों को छूकर अशुद्ध करने में आनन्द आता था। वह देवता को चढ़े प्रसाद को खाकर कहता था ‘यदि मैं खाऊंगा तो भगवान भी प्रसन्न होगा।’ नानू को बचपन से गरीब, असहाय एवं साधुओं के प्रति सहानुभूति थी। नानू की शिक्षा 5 वर्ष की आयु में प्रारम्भ हुई। उन्हें एक बार सिखा दिया, उसे कभी भूलते नहीं थे। नानू के मामा ने उसे 1876 ई. में सवर्ण गुरु करुणा गप्पली के पास पढ़ने के लिए भेज दिया। करुणा गप्पली के गुरुकुल में प्रत्येक छात्र को रघुवंश महाकाव्य के दो श्लोक याद करने होते थे पर नानू आगे के श्लोकों को याद कर लेते थे। गुरुकुल की शिक्षा के पश्चात वे अध्यापक बने पर उनकी सांसारिक जीवन में रुचि नहीं रही। नानू भगवान शंकर को इष्ट मानकर आध्यात्मिक साधना करने लगे। परिवार वालों ने विवाह कराने के लिए मजबूर कर दिया  पर वे ब्रह्मचर्य मार्ग पर लौट आये।  पत्नी को कहा ‘संसार  में मनुष्य विभिन्न उदे्श्यों को लेकर पैदा होता है।  इसी प्रकार तुम्हारा मेरा रास्ता अलग-अलग है।’ इतना कह कर वे एक वीतरागी की तरह आत्मोद्धार के साथ-साथ समाजोद्धार और राष्ट्रोद्धार  में जुट गये।

ओ चलकर नानू संत योगी श्री कुंजन पिल्ले के सम्पर्क में आये। तमिल योगी आयब्बू ने उन्हें योगाभ्यास सिखाया।  गुरु ने एकांत स्थान में योगाभ्यास करने की सलाह दी। नानू तपस्या के लिए गिरि, कन्दरा, जंगल में नंगे पैर एकांत स्थान की खोज में चल दिए। उन्होंने काफी समय मरूथवा माला चोटी पर स्थित पिलाथाधाम कन्दरा में कठोर तपस्या की। कन्दरा से बाहर आकर वे केरल में पैदल मन्दिर-मन्दिर घूमते रहे। प्रेम से जो भिक्षा मिली, उसे मस्ती से खा लिया। नहीं मिली तो भूखे सो गये। 'पृथ्वी  परम पुनीत पलंग ताक्यों मन मानो, तकिया अपनो हाथ गगन सो तम्बू तानो।' वे ऐसे निर्लिप्त भाव से घूमते रहते थे। नानू योगी की आभा, करुणामयी आंखें, कष्ट निवारक उपदेश से लोग सहसा खिंचे चले आते थे। 1888 मे स्वामीजी ने नयार नदी के तट पर अरूबीपुरम् में डेरा जमाया। एजवा जाति के डॉ. पालपु के सुपुत्र स्वामी नटराज उनके पहले अनुयायी बने। स्वामी जी के अनुयायियों ने उनकी पूजा करना प्रारम्भ कर दिया। स्वामीजी को अपने पूजा करवाना पसन्द नहीं आया। वे अनुयायियों को व्यक्ति श्रद्धा से शिव श्रद्धा की ओर मोड़ना चाहते थे। शिवरात्रि के दिन नदी में गोता लगाकर वे शिवलिंग ले आये। उस पवित्र एक शिवलिंग को वक्षस्थल पर टिकाकर तीन घंटे अश्रुपूरित नेत्रों से ध्यान में मग्न रहे। भक्त लोग भी एकत्रित होकर मस्ती से ओम नम: शिवाय का उच्चारण करते रहे। तत्पश्चात उन्होंने स्वयं शिवलिंग का अभिषेक किया। कालान्तर में वहीं पर शिव मंदिर का निर्माण कराया।  यही शिव मन्दिर समाज की  एकता का श्रद्धा केन्द्र्र बना। नारायण गुरु  के सन्देशों का मूलाधार सहजता थी। सहजता के साथ विकारों को ऊर्ध्वमुखी कर उन पर नियन्त्रण स्थापित करना ही भक्ति है। आदर्श निवास जहां पर सब भातृ भाव से रहते हों, धार्मिक द्वेष भाव और संकीर्णताओं से मुक्त हों। केरल में मूर्ति प्रतिष्ठापना का अधिकार केवल उच्चतम ब्राह्मणों को ही था। श्री नारायण गुरु ने इस जड़ परम्परा को तोडकर एजवा (नारायण गुरु) द्वारा शिव प्रतिमा की स्थापना करके केरल में समाज परिवर्तन का श्रीगणेश किया।  इस प्रकार स्वामी जी समाज सुधार के अभियान में निकल पड़े। वे केरल पर प्रतिवर्ष  एक मंदिर का निर्माण करने लगे। स्वामीजी हवादार कमरों वाले, सुन्दर बगीचे से युक्त मन्दिर बनवाते थे। मन्दिर के साथ स्कूल भी होता है तथा चढ़ावे में जो पैसे आएं, उन्हें जन-कल्याण में खर्च करना चाहिए। नारायण के शिव मन्दिर बहुत साफ-सुथरे होते थे। नारायण गुरु  ने इन मन्दिरों को समाजोत्थान का स्थान बना दिया। उनके इस नवोत्थान अभियान में उच्च वर्गीय ब्राह्मणों ने उदारमन से सहयोग दिया। स्वामीजी का लक्ष्य समाज में श्रद्धा को जगाकर समता और ममता के भाव का प्रसारण करना था। इस अहिंसक मूक क्रान्ति ने मद्यपान का विरोध किया और उन देवताओं की मूर्ति हटवा दी जिनकी नाम मदिारापान, पक्षीवध के साथ जुड़ा हुआ था। उन्होंने मूर्तियों के स्थान पर शिव, गणेश सुब्रामण्यम की मूर्तियां स्थापित कराईं।

यहां एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि स्वामीजी ने नये मन्दिर क्यों बनवाये? यह स्वामीजी का एक अभिनव प्रयोग था। उन्होंने किसी भी देवी-देवता की आलोचना नहीं की। केवल पूजा के तौर-तरीकों के विरोध में आवाज उठाई। मन्दिर समाज परिवर्तन का साधन बनते गये। मन्दिरों के साथ स्त्री शिक्षा, रोजगार, सेवारत महिलाओं को आवास, धर्मग्रन्थों के पुस्तकालयों का निर्माण जुड़ता गया। इन मन्दिरों के पुजारी निम्न वर्ग से आने लगे। उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। प्रत्येक प्रशिक्षु को तंत्र-मंत्र, शास्त्र, वेद, उपनिषद् एवं अध्यात्म दर्शन का 9 वर्ष तक प्रशिक्षण दिया जाता था। आज इसी कार्य को आगे बढ़ा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता योजनापूर्वक वंचित  समाज के युवकों को पूजा-पद्धति का प्रशिक्षण दे रहे हैं।

केरल में एक जाति दूसरी जाति को निम्न मानती थी। इस हेयता वरीयता क्रम में ऐजवा जाति भी अछूती नहीं थी। वे अपने से उच्च को मन्दिर में प्रवेश देते थे पर अपने मन्दिरों में अपने से नीची जाति वालों को घुसने नहीं देते थे। श्री नारायण गुरु ने इस कुप्रथा को समाप्त कर बरकल और अलवै में निम्न वर्गों को प्रवेश दिया। धीरे-धीरे सभी जातियां परस्पर निकट आने लगीं। नारायण गुरु भारत में सामाजिक रक्तहीन क्रान्ति को लाने वाले प्रथम संत थे। उनकी इस अभिनव पद्धति से यह कार्य सम्पन्न हो सका। केरल के अछूतों द्वारा चलाए आन्दोलन में रक्त की एक बूंद भी नहीं गिरी। स्वामीजी के तीस वर्षों के प्रयास से अस्पृश्यता सूखे पत्ते की तरह झड़ने लगी। 1936 में दलितों को मन्दिर प्रवेश का अधिकार मिल गया। त्रावणकोर देश का वह पहला राज्य था, जहां अस्पृश्यता को कानून द्वारा समाप्त किया गया। महात्मा गांधी नारायण गुरु के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उनसे मिलने गये। उन्होंने उन्हें ‘पवित्र आत्मा’ के रूप में संबोधित किया।

1928 में स्वामीजी गंभीर रूप से बीमार और 20 सितम्बर, 1928 को महासमाधि में लीन हो गये। श्री नारायण गुरु का दिव्य सन्देश तथा अभिनव पद्धति वर्तमान संदर्भ में अनुकरणीय है। संविधान ने अस्पृश्यता को दंडनीय अपराध घोषित किया। उसमें वंचित समाज की आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक उन्नति के लिए आरक्षण की व्यवस्था है, पर हिन्दू समाज के उच्च वर्ग और निम्न वर्ग में कटुता समाप्त नहीं हुई है। केवल श्री नारायण गुरु की अभिनव पद्धति से समाज में समता और ममता को लाया जा सकता है। लोगों के मन की खाई को पाटना आवश्यक है। वंचित समाज हृदय से स्नेह और आत्मीयता चाहता है। यह भाव लाने के लिए श्री नारायण गुरु  के दिव्य सन्देशों का अनुसरण ही एकमात्र उपाय है।
(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उत्तर क्षेत्र के संघचालक हैं)

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