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पाकिस्तानी सेना के सामंती स्वरूप के कारण दिवालिया होता पाकिस्तान

Written byPanchjanyaPanchjanya
Jun 11, 2021, 12:31 pm IST
inभारत

कर्नल (सेनि.) शिवदान सिंह 

बंटवारे के समय पाकिस्तान को सबसे अच्छे संसाधन दिए गए। पंजाब प्रांत का उपजाऊ हिस्सा पाकिस्तान को दिया गया। यदि पाकिस्तान में वास्तव में प्रजातंत्र होता तो आज पाकिस्तान एक समृद्ध और आर्थिक शक्ति के रूप में जाना जाता। परंतु आज पाकिस्तान भीख का कटोरा लेकर दुनिया के देशों से मदद मांग रहा है

इतिहास के मध्य काल तक विश्व के ज्यादातर भागों पर राजा महाराजाओं तथा सामंतों का शासन था, जो अपने स्वार्थ के लिए भोली-भाली जनता का आर्थिक तथा सामाजिक शोषण किया करते थे। धीरे-धीरे विकास हुआ तथा 19वीं सदी में ज्यादातर देशों में प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था लागू हो गई। जिससे देश की जनता स्वयं अपने हित तथा भलाई को ध्यान में रखते हुए शासन व्यवस्था चलाती है। इस व्यवस्था में जनता की बराबरी के अधिकार और अवसरों का भरोसा दिलाया जाता है। तो क्या यह प्रजातांत्रिक व्यवस्था पाकिस्तान में लागू है, तो इसका उत्तर होगा पाकिस्तान अभी भी पराधीन देश है। जिसमें राजा के रूप में वहां की सेना वहां पर राज कर रही है। सामंती युग में आम जनता गरीब होती थी, परंतु राजा महाराजाओं की दौलत तथा वैभव दिन—रात बढ़ता था। इसी प्रकार पाकिस्तान में चारों तरफ महंगाई और गरीबी का माहौल है और आम आदमी को वहां पर खाने-पीने की सामग्री भी उपलब्ध नहीं हो रही है। परंतु सेना के पास पर्याप्त संपदा तथा धन दौलत है। अक्सर देश के सरकारी खजाने में सार्वजनिक तथा सरकारी उपक्रमों के मुनाफे तथा टैक्स से धन आता है। परंतु पाकिस्तान कि ज्यादातर आर्थिक गतिविधियों और आर्थिक उपक्रमों पर वहां की सेना का कब्जा है। पाकिस्तान की प्रसिद्ध स्तंभकार आयशा सिद्दीकी के अनुसार पाकिस्तान में बिस्कुट से लेकर नैपकिन एवं रियल स्टेट आदि तक सब आर्थिक उपक्रम सेना के कब्जे में हैं। सेना की फौज फाउंडेशन नाम की संस्था के पास ही 25 बड़ी-बड़ी कंपनियां हैं। उनके अनुसार 2007 में ही सेना का व्यापार 20 बिलियन पाउंड था, जो अब बढ़कर करीब 30 बिलियन पाउंड तक पहुंच गया है। पाकिस्तान की 12 फीसदी कृषि भूमि पर सेना का कब्जा है, जिस पर सेना के अधिकारियों के कृषि फॉर्म हैं। इस सब के बावजूद भी पाकिस्तान की जीडीपी का 21 फीसदी सेना के बजट पर खर्च हो रहा है। जबकि भारत में यह 5-6 फीसदी ही है।

पाकिस्तान में 1947 में आजादी के बाद से ही वहां की जनता की मजहबी भावनाओं को भड़काने के लिए इस्लाम खतरे में है, का नारा दिया गया तथा इस खतरे के लिए पाकिस्तानी सेना ने भारत को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। पाकिस्तान की भोली जनता की मजहबी भावनाओं को अपनी तरफ करने के लिए पाकिस्तानी सेना ने मुस्लिम कट्टरवाद को बढ़ावा दिया। जिसके कारण हाफिज सईद जैसे आतंकवादियों के सरगना पाकिस्तान में तैयार हुए। वहां की जनता को भरोसा दिलाने के लिए आजादी के फौरन बाद अक्टूबर, 1947 में सेना ने कवायलियों के भेष में चुपचाप जम्मू—कश्मीर पर हमला कर दिया। उस समय इस राज्य का विलय भारत में नहीं हुआ था। इस कारण इन कवायलियों ने कश्मीर में भारतीय सेना के पहुंचने से पहले कश्मीर के 25 फीसदी भाग पर कब्जा कर लिया। जिसको आजकल पाक अधिक्रांत कश्मीर के नाम से जाना जाता है। इसके बाद भी पाकिस्तान की भारत के विरुद्ध तरह-तरह की गतिविधियां चलती रही और उसने अगस्त, 1965 में पाक अधिक्रांत कश्मीर के 30,000 युवाओं को अपने सैनिकों के साथ रजाकार तथा मुजाहिदीन के रूप में कश्मीर में ऑपरेशन जिब्राल्टर के नाम से घुसा दिया। इनके द्वारा पाकिस्तानी सेना श्रीनगर में होने वाले मुस्लिमों के एक मजहबी कार्यक्रम में सांप्रदायिक दंगे करवाकर दुनिया को यह दिखाना चाह रही थी कि कश्मीर की जनता स्वयं भारत से अलग होना चाहती है। पाकिस्तान की इस चाल को स्वयं कश्मीर की जनता ने नाकाम कर दिया था और पाकिस्तानी घुसपैठियों को स्वयं पकड़कर सुरक्षाबलों को सौंपा। इसके नाकाम होने पर पाकिस्तानी सेना ने अक्टूबर, 1965 में ही जम्मू के अखनूर पर हमला कर दिया। जिसके द्वारा वह कश्मीर घाटी को भारत से जोड़ने वाली सड़क पर कब्जा करके कश्मीर को भारत के मुख्य भाग से अलग करना चाह रही थी। पाकिस्तान के इस हमले को नाकाम करने के लिए भारतीय सेना ने पाकिस्तान के पंजाब पर सीधा हमला किया, जिसमें पाकिस्तान को करारी हार मिली और ताशकंद समझौता के द्वारा यह युद्ध समाप्त हुआ। उस समय पाकिस्तान में अयूब खान का सैनिक शासन था। इसके कुछ समय बाद वहां पर 1970 में प्रजातंत्र की वापसी के लिए आम चुनाव हुए जिनमें पूर्वी पाकिस्तान के शेख मुजीब उर रहमान की पार्टी को भारी बहुमत प्राप्त हुआ। इस प्रकार मुजीब उर रहमान प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन गए। लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाबी मुस्लिमों के बहुमत वाली सेना को यह पसंद नहीं था कि एक बंगाली पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बने। इसलिए तत्कालीन पाकिस्तान के मिलिट्री शासक जनरल याह्या ख़ान ने उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त करने से मना कर दिया। जिसके बाद पूर्वी पाकिस्तान में सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन शुरू हो गए।जिनको दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने तरह—तरह के अत्याचार जनता पर शुरू कर दिए। पूर्वी पाकिस्तान की लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। जिससे तंग आकर पूर्वी पाकिस्तान के करोड़ों शरणार्थियों ने भारत में शरण ली। जिनके भरण पोषण की जिम्मेदारी भारत सरकार ने उठाई। इस समस्या को सुलझाने के लिए भारतीय सेना को इसमें दखल  देना पड़ा, जिसका परिणाम 1971 का भारत पाकिस्तान युद्ध था। जिसके द्वारा आज के बांग्लादेश का निर्माण हुआ। इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने भारत की आंतरिक सुरक्षा को बर्बाद करने के उद्देश्य से अपने देश में आतंकवादी तैयार करने शुरू कर दिए। इनके द्वारा 70 के दशक में भारत के पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद की शुरुआत की। इन आतंकियों को गोला—बारूद और ट्रेनिंग सब पाकिस्तान से मिल रही थी। परंतु भारत के पंजाब की जनता की राष्ट्रवाद की भावना और भारतीय सेना के द्वारा ऑपरेशन ब्लू स्टार द्वारा इस आतंकवाद पर काबू पाया गया। यहां से नाकाम होने के बाद पाकिस्तान ने अपना रुख जम्मू—कश्मीर की तरफ कर लिया। इसी समय 90 के दशक में अफगानिस्तान पर रूसी सेना का कब्जा हो गया था। जिसको हटाने के लिए अमेरिका की सीआईए ने पाकिस्तान के भाड़े के आतंकियों को अफगानिस्तान में रूसी सेनाओं से युद्ध करने के लिए भेजा। इसके लिए पाकिस्तान के बेरोजगार युवाओं को वहां के मदरसों और स्कूलों में आतंकवाद की ट्रेनिंग दी गई। इस प्रकार पाकिस्तान में चारों तरफ आतंकी युवाओं की भीड़ ही देखी जा सकती थी। इसके बाद पाकिस्तान ने करगिल में कब्जा करने का दुस्साहस किया, जिसका परिणाम करगिल युद्ध हुआ, जिसमें एक बार फिर उसे करारी हार मिली।
 
 

उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि 1947 में पाकिस्तान के निर्माण के बाद से ही पाकिस्तानी सेना ने पाकिस्तान में शांति नहीं रहने दी। हर समय कभी भारत, कभी अफगानिस्तान, कभी मध्य एशिया में तरह-तरह की आतंकी गतिविधियां चलाकर देश में अशांति का वातावरण पैदा किया। इस प्रकार के वातावरण में देश का विकास नहीं हो सकता।   पाकिस्तानी सेना की इन गतिविधियों को देखकर विदेशी निवेशकों ने पाकिस्तान से दूरी बनानी शुरू कर दी। इसलिए यहां पर ना कोई औद्योगिक विकास हुआ और ना ही रोजगार के और कोई साधन पैदा हो पाए। इन परिस्थितियों में पाकिस्तान का ज्यादातर युवा बेरोजगार हो गया। और बेरोजगारी के कारण आतंकवाद जैसी गतिविधियों में लिप्त होकर स्वयं का और अपने आसपास का विनाश करने लगा। इस सबके अतिरिक्त उपरोक्त आतंकी गतिविधियों और लड़े गए  युद्धों में पाकिस्तानी जनता के कर की कमाई जिसे देश के विकास पर खर्च किया जाना चाहिए था, उसको इन हिंसक गतिविधियों पर खर्च किया गया। पाकिस्तानी सेना इस प्रकार का माहौल पाकिस्तान में अपना प्रभुत्व जमाने के लिए करती रही। क्योंकि मध्यकाल में भी सामंत अपनी प्रजा को दिखाने के लिए अपने आसपास युद्ध इत्यादि करते रहते थे, जिससे उनकी प्रजा भयभीत रहे। इस प्रकार धीरे—धीरे पाकिस्तान में विकास के स्थान पर विनाश होता चला गया। जिसके कारण आज पाकिस्तान दिवालियापन के कगार पर पहुंच चुका है। वहीं पर पाकिस्तानी सेना के खजाने और उनकी आर्थिक गतिविधियां उसी प्रकार से चल रही है।

1971 से पहले पूर्वी पाकिस्तान अब बांग्लादेश को पाकिस्तान का गरीब तथा पिछड़ा भाग माना जाता था। परंतु आज बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग होकर विकास के मार्ग पर दिन-रात उन्नति कर रहा है। और धीरे-धीरे आर्थिक रूप से सशक्त होकर उभर रहा है। 2009 में प्रधानमंत्री बनने के बाद शेख हसीना ने भारत के साथ बांग्लादेश के संबंधों को सुधारना प्रारंभ किया। इसके लिए उन्होंने सर्वप्रथम भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में बांग्लादेश से संचालित तस्करी तथा अलगाववादी  अड्डों को समाप्त किया। भारत के गृह मंत्रालय के अनुसार बांग्लादेश के उपरोक्त सहयोग के कारण इन राज्यों में अलगाववाद और तस्करी 80 फीसदी तक घट गई है। इस कारण जहां भारत के इन राज्यों में विकास हुआ है वहीं पर भारत के सहयोग से बांग्लादेश भी प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहा है। विश्व बैंक के अनुसार बांग्लादेश का भारत में निर्यात 297 फीसदी और भारत का निर्यात भी बांग्लादेश में 172 फीसदी बढ़ गया है। इस सहयोग को और बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों देशों में आवागमन को सुगम बनाने के लिए त्रिपुरा को बांग्लादेश से जोड़ने वाले मैत्री सेतु का उद्घाटन किया है। इसके द्वारा बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह जो त्रिपुरा की सीमा से केवल 80 किलोमीटर है, पर अब आसानी से पहुंचा जा सकता है। इससे क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियां और निर्यात बढ़ेगा।

पाकिस्तान आर्थिक कठिनाइयों के कारण अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह चीन के साझा आर्थिक गलियारे( सीपीईसी) मैं फंस चुका है। जिसके द्वारा चीन पाकिस्तान पर इंग्लैंड की तरह निकट भविष्य में आर्थिक और राजनीतिक रूप में कब्जा कर लेगा। इसके अतिरिक्त आतंकवाद को रोकने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स( एफएटीएफ)के द्वारा यदि पाकिस्तान को काली सूची में डाल दिया जाता है तो पाकिस्तान को विश्व में कहीं से भी कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलेगी। पाकिस्तान की आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ाने के लिए संयुक्त अरब अमीरात ने भी पाकिस्तान से अपने 16 हजार करोड़ कर्ज को वापस लौटाने के लिए कहा है। इन सब को देखते हुए अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख जनरल कमर बाजवा ने आह्वान किया है कि भारत—पाकिस्तान को पुराने विवादों को भुलाकर नई शुरुआत करनी चाहिए। जिससे पूर्वी तथा मध्य एशिया की आर्थिक संभावनाओं को तलाशा जा सके। बाजवा की यह भी एक सोची समझी चाल है जिसके द्वारा वह एफएटीएफ के शिकंजे से बचना चाहता है।

बंटवारे के समय पाकिस्तान को सबसे अच्छे संसाधन दिए गए। पंजाब प्रांत का उपजाऊ हिस्सा पाकिस्तान को दिया गया। यदि पाकिस्तान में वास्तव में प्रजातंत्र होता तो आज पाकिस्तान एक समृद्ध और आर्थिक शक्ति के रूप में जाना जाता। परंतु आज पाकिस्तान भीख का कटोरा लेकर दुनिया के देशों से मदद मांग रहा है। इस प्रकार पाकिस्तान की 18 करोड़ आबादी के मानव अधिकारों की धज्जियां वहां की सेना केवल अपने स्वार्थ के लिए उड़ा रही है और विश्व के मानव अधिकार संगठन इसको चुपचाप देख रहे हैं। पाकिस्तान को आजाद हुए 72 साल हो गए हैं और इनमें वहां पर 34 साल तक सैनिक शासन रहा बाकी समय में भी नाम मात्र के जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते थे। जिन पर हुकुम सेना का ही चलता था। अभी भी चारों तरफ यही कहा जा रहा है कि इमरान खान वहां की सेना के इशारों पर ही चलते हैं। इसलिए पाकिस्तान में जब तक वहां की सेना का रवैया नहीं बदलेगा, तब तक ना वहां प्रजातंत्र आएगा और ना ही वहां की जनता की गरीबी दूर होकर विकास होगा। इसलिए पूरे विश्व को इस पर विचार करना चाहिए कि किस प्रकार पाकिस्तान में सच्चे अर्थों में प्रजातंत्र लागू किया जाए। अन्यथा धीरे—धीरे बांग्लादेश की तरह वहां का बलूचिस्तान और सिंध प्रांत भी उससे अलग हो जाएगा और बाकी हिस्से पर चीन का राज होगा।
 

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