साक्षात्कार : बाबुल सुप्रियो‘‘ममता की तुष्टीकरण नीति बंगाल को जला रही है’’
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साक्षात्कार : बाबुल सुप्रियो‘‘ममता की तुष्टीकरण नीति बंगाल को जला रही है’’

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Apr 9, 2018, 12:00 am IST
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दिंनाक: 09 Apr 2018 11:11:11

साक्षात्कार : बाबुल सुप्रियो


केंद्रीय भारी उद्योग एवं लोक उद्यम राज्यमंत्री और आसनसोल से सांसद बाबुल सुप्रियो अपने संसदीय क्षेत्र में हुई साम्प्रदायिक हिंसा के लिए राज्य सरकार के तुष्टीकरण वाले रवैये को जिम्मेदार मानते हैं। वे कहते हैं,‘‘ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति बंगाल को जलाने पर लगी हुई है लेकिन मैं इस माहौल में अपने लोगों को अकेला नहीं छोड़ने वाला। मैदान में डटा हूं और हर स्थिति से निबटने के लिए तैयार हूं।’’ पाञ्चजन्य संवाददाता अश्वनी मिश्र ने उनसे विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-

कलियाचक, धूलागढ़, बशीरहाट और अब रानीगंज, आसनसोल। ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल दंगों का राज्य बनता जा रहा है। इसके पीछे क्या कारण मानते हैं आप?
देखिए, ममता बनर्जी राज्य में बांटो और राज करो की नीति पर काम कर रही हैं। मुस्लिमों को खुश करना और हिन्दुओं को दुत्कारना यह ममता सरकार की नीति का अहम हिस्सा है। वह राज्य के 28 फीसदी मुसलमानों को खुश रखना चाहती हैं। इसलिए जब भी ऐसी कोई घटना घटती है तो उनका प्रशासन इसे रोकने के बजाए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उसमें सहयोग ही करता है। ममता बनर्जी के शासन में राज्य के हालात पिछले पांच-छह सालों में तेजी से बिगडेÞ हैं। क्योंकि जब एक समुदाय को लाड़-दुलार मिलता है और दूसरे को दुत्कार मिलती है तो कहीं न कहीं सरकार का दोहरा रवैया दिखाई देने लगता है। आसनसोल, रानीगंज और अन्य जगहों पर हुई हिंसा की घटनाओं के बाद मुझे यह डर लग रहा है कि कहीं ममता बनर्जी इसी आग से खेलते-खेलते बंगाल को न जला डालें। दूसरी बात, दूसरे दल के कार्यकर्ताओं को मारना-पीटना, उन्हें साजिश के तहत फंसाना, झूठे मुकदमे दर्ज कराना, इसके खिलाफ उन्होंने कम्युनिस्टों से लड़ाई लड़ी थी, लेकिन जब आज वे सत्ता में हैं तो वही काम खुद कर रही हैं। राज्य में जो भी हो रहा है वह बड़ा ही दुखद और शर्मनाक है। मेरा मुख्यमंत्री से सवाल है कि रामनवमी का उत्सव किसी पार्टी ने तो शुरू नहीं किया। यह तो पुराने जमाने से होता चला आ रहा है। लेकिन मुसलमानों के वोट पाने के लिए हिन्दुओं के त्योहारों और उत्सवों पर अनैतिक प्रतिबंध क्यों लगा रही हैं? क्या अब हिन्दुओं के त्योहार सरकार और प्रशासन तय करेगा? कल को वे दुर्गा पूजा पर कहेंगी कि देवी के हाथ में खड्क और
त्रिशूल है,उसे भी हटाओ? तो मैं उनसे कहना चाहता हूं कि जिस रास्ते पर वह जा रही हैं वह रास्ता गलत है। वह समाज में एक डर का माहौल बनाकर लाभ लेना चाहती हैं लेकिन यह सब अब ज्यादा दिन तक चलने वाला नहीं है।

रानीगंज और आसनसोल से हिन्दू पलायन को मजबूर हुआ है। लेकिन राज्य का प्रशासन मरहम लगाने के बजाय हिन्दुओं का ही उत्पीड़न कर रहा है।
बिल्कुल, हिन्दू अपने घरों से भागने और पलायन करने पर मजबूर हुए हंै। कैसे कोई ऐसे हिंसक माहौल में रह सकता है। जब रात-दिन उसकी जान पर संकट हो। यकीनन राज्य प्रशासन ममता बनर्जी के इशारे पर काम कर रहा है। राज्य के हालात इतने ज्यादा बिगड़े हैं कि एक सामान्य हिन्दू युवा की बात छोड़िये मैं तो आसनसोल से निर्वाचित सांसद हूं, लेकिन मुझे ही हिन्दू बस्ती में यह कहते हुए जाने से रोका गया कि मेरे जाने से हालात खराब होंगे। जब मैं जोर-जबरदस्ती करके जाने की कोशिश कर रहा था तो पुलिस ने मेरे साथ अभद्रता की। मैं अपने लोगों के पास भी नहीं जा सकता और आप उन्हें परेशान करते रहें! मेरे सामने ही कुछ लोग हिन्दुओं को डराने के लिए कह रहे थे कि अभी तो बाबुल सुप्रियो हैं तो कोई बात नहीं, इन्हें जाने दो तब तुम लोगों को देखते हैं। यानी प्रशासन ने इतनी हिम्मत बढ़ा रखी है कि जिसका जो मन आ रहा है वह कर रहा है। इस सबको देखकर यही कहा जा सकता है कि राज्य में हिन्दुओं की हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। आसनसोल और रानीगंज उसके उदाहरण हैं।

राज्य में कई जगह हिंसक घटनाओं की एक बड़ी वजह बांग्लादेशी मुस्लिम और रोहिंग्या बनते जा रहे हैं।  आखिर कहां चूक हो रही है, जिससे घुसपैठिये राज्य में दाखिल होने में कामयाब हो जाते हैं?
भारत-बांग्लादेश की सीमा बहुत जगह से खुली हुई है, जिसका फायदा घुसपैठिये उठाते हैं और राज्य में आ धमकते हैं। यह हमारे लिए चुनौती है और मैं बताना चाहता हूं कि केन्द्र सरकार इस पर गंभीरता से काम भी कर रही है। दूसरी बात, राज्य में कुछ अतिवादी मुस्लिम संगठन और तृणमूल के नेता इन घुसपैठियों को बसाने का कार्य करते हैं। दक्षिण 24 परगना जिले में तो बाकायदा उनके लिए बक्से रखे गए हैं, जहां उनके राहत के लिए पैसा एकत्र होता है। जबकि खुफिया एजेंसी बार-बार कह चुकी है कि रोहिंग्या मुस्लिम आपराधिक गतिविधियों से लेकर राष्ट्रविरोधी और आतंकी संगठनों तक से मिले हुए हैं। फिर भी उनके लिए शरणार्थी शिविर बनाये जा रहे हैं और हरसंभव मदद दी जा रही है। धीरे-धीरे इन्हीं के मतदाता कार्ड बना दिए जाएंगे जो ममता को वोट देंगे। ऐसे में वह क्यों न मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति पर काम करें। यही उनका असली चेहरा है।

 जब भी बंगाल में कोई हिंसा की घटना घटती है तो राज्य प्रशासन की भूमिका संदिग्ध होती है। राज्य के एक पुलिस अधिकारी पर बम से हमला कर दिया जाता है लेकिन प्रशासन निष्क्रिय बना रहता है। प्रशासन का यह रवैया क्या दर्शाता है?
राज्य प्रशासन की भूमिका संदिग्ध नहीं, पूरी तरह स्पष्ट है। हर हिंसा की घटना में पुलिस से कहा जाता है कि घटना घटने के डेढ घंटे तक कुछ न करें। पुलिस थाने में बैठी रहती है और फोन भी नहीं उठाती। एक पुलिस अधिकारी का बम से हाथ क्षत-विक्षत हो जाता है और पुलिस कोई हरकत नहीं करती। तो यह सब देखकर लगता है कि राज्य सरकार ने अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए प्रशासन के हाथ बांध रखे हैं।

कुछ वर्षों से देखने में आया है कि राज्य में जब भी हिन्दुओं का कोई त्योहार होता है तो राज्य सरकार हिन्दू रीति-रिवाजों को प्रतिबंधित करती है तो दूसरी और मुस्लिम किसी न किसी बहाने हिंसा करते ही हैं। आखिर वजह क्या है?
ममता बनर्जी कट्टर तत्वों को शह दे रही हैं। कुछ तथ्यों पर नजर डालें तो राज्य में अलग-अलग जगहों पर काफी फर्जी मतदाता सूचियां बनी हैं, जिसमें घुसपैठियों के नाम भी आ रहे हैं। इसलिए हम इसकी तह तक जाने में लगे हुए हैं। मैं उम्मीद करता हूं कि सच सामने आएगा।  देखिए हम सबका साथ, सबका विकास की बात करने वाले लोग हैं लेकिन वे क्या करती हैं? वह केन्द्र सरकार की योजनाओं के नाम बदलकर लोगों को धोखा दे रही हैं। राज्य के पैसों को लुटाया जा रहा है। यह सब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला है। जनता इसका जवाब देगी।

बंगाल जब जल रहा था तो ममता बनर्जी दिल्ली में राजनीतिक रोटियां सेंक रही थीं। इस पर क्या कहेंगे?
ममता बनर्जी इतिहास का एक हिस्सा बनना चाहती हैं। वह चाहती हैं कि क्यों सम्राट नीरो को सारा श्रेय मिले। उनका नाम भी उस सूची में आना चाहिए। आसनसोल बंगाल का दूसरा सबसे बड़ा राजस्व देने वाला शहर है और जब वह जल रहा था तो मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री बनने के अपने ख्वाब को पूरा करने के लिए दिल्ली में राजनीतिक चालें चल रही थीं। हमारी लड़ाई इसी चीज के साथ है। हम जनता के हित के लिए काम कर रहे हैं और वे अपनी निजी स्वार्थपूर्ति और पद-सत्ता की कामना के लिए राजनीति कर रही हैं।  

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