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‘‘हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी संपत्ति हमारी संतानें’’

Written byArchiveArchive
Feb 5, 2018, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 05 Feb 2018 11:10:21

पिछले दिनों उदयपुर के टाउन हॉल स्थित सुखाड़िया रंगमंच पर राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ की ओर से प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन का आयोजन किया गया। समारोह में प्रमुख अतिथि के रूप में साध्वी ऋतम्भरा उपस्थित थीं। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि देश और संस्कृति की सबसे बड़ी सम्पत्ति हमारी संतानें हैं। हमारी संतानें ही हमारी सांस्कृतिक विरासत की संवाहक होंगी। लेकिन यह तभी संभव होगा, जब हम उनमें अपने संस्कारों की नींव को मजबूत बनाएं और इसके लिए हमें अपनी संतानों को स्वयं समय देना होगा, किसी और के भरोसे संस्कारों का निर्माण नहीं हो सकता।                                  (विसंकें, उदयपुर)

‘‘मैकाले कीशिक्षा से  मुक्ति का समय’’
‘‘देश में बढ़ती आत्महत्या की घटनाएं नि:संदेह गंभीर चिंता का विषय हैं। ऐसे में आज जरूरत है एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जो मानवीय मूल्यों और मानवीय जीवन की सही अर्थों में कीमत क्या है, इसका ज्ञान करा सके। इसके साथ ही उसे अपने परिवार, समाज व राष्टÑ के प्रति एक जिम्मेदार नागरिक बना सके ।’’ उक्त बातें केन्द्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल सिंह ने कहीं। वे जालंधर के विद्या धाम में आयोजित एनआरआई सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि राष्टÑ के समग्र विकास के लिए शिक्षा पद्धति को भारतीय संस्कृति एवं आदर्श जीवन प्रदान करने वाली बनाना जरूरी हो गया है। क्योंकि मैकाले की शिक्षा पद्धति में जीवन के आदर्श व मानवीय मूल्यों तथा राष्टÑ व समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का बोध कराने वाले भाव लुप्त हो गए हैं। आज वही व्यक्ति, समाज व राष्टÑ अपना परचम लहरा सकता है जो शिक्षित हो, स्वस्थ हो और अत्याधुनिक तकनीकी से युक्त होने के अलावा शक्तिशाली हो । इन सब के लिए ज्ञान प्राप्त करने का मौलिक अधिकार सभी को है। उन्होंने पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी के विचारों को उद्धृत करते हुए कहा कि आधुनिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए देशी-विदेशी तर्कों में नहीं पड़ना चाहिए बल्कि उसे अपने अनुकूल कैसे बनाया जाए, इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।        प्रतिनिधि

 

‘‘स्वयंसेवकों का असीम तप दिखता है’’
भारत रत्न महामना पं़ मदन मोहन मालवीय की तपोस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के 102 वर्ष पूर्ण होने पर विश्वविद्यालय के स्वयंसेवकों ने सधे कदमों के साथ नवीन गणवेश में पथसंचलन किया। पथ संचलन छात्र स्वास्थ्य केन्द्र के निकट कृषि मैदान से चलकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना स्थल पर आकर सम्पन्न हुआ। सिंहद्वार सहित अनेक स्थानों पर लोगों ने पथसंचलन का स्वागत किया। इस अवसर पर काशी प्रांत के प्रांत प्रचारक श्री अनिल ने कहा कि महामना द्वारा विवि की स्थापना का उद्देश्य था- हिन्दू धर्म का मानवर्धन करना। तकनीकी विकास के साथ देश के नैतिक बल को पुष्ट करना। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र देश, विदेश में अपनी छाप छोड़ते हैं। इसी विश्वविद्यालय से द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी ने शिक्षा प्राप्त की और यहीं पर शिक्षक भी रहे। आज राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ की वर्तमान स्थिति स्वयंसेवकों के असीम तप और साधना का परिणाम है। उन्होंने कहा कि संघ पर सरकार ने चार बार प्रतिबंध लगाया। किन्तु स्वयंसेवकों के तप और साधना से आज भी यह अपनी जगह पर अडिग है और ढृढ़ता के साथ बढ़ता जा रहा है। संघ की कोई नई परिभाषा नहीं है। संघ स्वामी विवेकानन्द और महामना के सपनों को पूरा करने के लिए तत्पर और प्रयासरत है। संघ का उद्देश्य भारत को सर्वोच्च शिखर पर ले जाना है।             (विसंकें, वाराणसी)

धर्म और संस्कृति से जोड़ती है ‘सेवा इंटरनेशनल’
अमेरिका के पश्चिम में फीनिक्स, एरिजोना में भूटानी यूथ हेरिटेज और सेवा इंटरनेशनल, फीनिक्स की ओर से एक सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया गया। भूटानी शरणार्थी समन्वयक जूलियाना डेविस समरोह की मुख्य अतिथि थीं। इस अवसर पर हिंदू स्वयंसेवक संघ के एरिजोना विभाग के प्रमुख शंकरराम थियागराजन भी मौजूद थे। इस अवसर पर एक सत्र का आयोजन किया गया। सत्र का विषय था—‘अपनी पहचान’। इसमें नेपाली, भूपाटी समाज पर आए संकटों की चर्चा की गई। भूटान के सेवानिवृत्त प्रो. प्रेम भंडारीटेकमान परियार ने अपने पूर्वजों के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि अपनी संस्कृति से जुड़े रहना ही हमारी पहचान को जीवंत बनाता है। युवा नेता पी.डी. प्रसाद ने बातचीत में स्वीकार किया कि बेशक, सेवा इंटेरनेशनल के कार्यकर्ता भूटानी शरणार्थियों की धन-दौलत से आर्थिक मदद नहीं कर पा रहे हैं लेकिन हमारे हर सुख दु:ख, पर्व, सांस्कृतिक अवसरों पर खड़े रहते हैं। भूटान की एक युवा शरणार्थी संगीता चौहान ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि मुझे नहीं मालूम कि मैं कौन हूं, भूटानी, नेपाली अथवा अमेरिकी? यह कहानी एक संगीता की नहीं, अमेरिका के विभिन्न हिस्सों एटलांटा, ओहायो, टेक्सास और नार्थ कैरोलाइना में अमेरिकी जीवन शैली के लिए संघर्ष कर रहे नब्बे हजार शरणार्थियों में हजारों युवक-युवतियों की है, जो अपनी पहचान के संकट से जूझ रहे हैं। इनमें अनेक लोग मनोरोग से ग्रस्त होने कारण आत्महत्या को विवश हो रहे हैं। ये भूटानी शरणार्थी लहोतशमपास समुदाय से हैं, जो नेपाली भाषी भूटानी है।  इनकी परम्पराएं हिंदुओं और बौद्धों का अनुसरण करती हैं। लेकिन नेपाल और भूटान ने इन शरणार्थियों की वापसी के लिए अभी किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए। इसलिए ये शरणार्थी संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग के पुनर्वास कार्यक्रम के तहत उत्तरी अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोप में रह रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि कैथोलिक और लुथेरा मतावलम्बियों के ‘चंगुल’ से बचाते हुए सेवा इंटरनेशनल नेपाली-भूटानी हिंदू शरणार्थियों को अपने धर्म और संस्कृति से जोड़े रखने के लिए उन्हें संरक्षण देने का काम कर रहा है। सेवा इंटरनेशनल हजारों मील दूर बैठे भूटानी शरणार्थियों को अपने धर्म, संस्कृति और परम्पराओं से जोड़े रखते हुए उनकी अपनी भाषा में समय-समय पर परस्पर बातचीत, लोक संगीत, नृत्य और लघु नाटिकाओं के जरिए स्वावलंबी बनाने की दिशा में कार्य कर रहा है। इसके बावजूद अनुमान है कि करीब पंद्रह से बीस प्रतिशत भूटानी शरणार्थी ईसाई बन गए हैं।
  ल्ल      ललित मोहन बंसल, लॉस एंजेल्स से

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