पुस्तक समीक्षा - ज्ञान-कर्म-भक्ति की प्रतीक हैं गंगा
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पुस्तक समीक्षा – ज्ञान-कर्म-भक्ति की प्रतीक हैं गंगा

Written byArchiveArchive
Nov 13, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 13 Nov 2017 10:11:56

गंगा पर प्रकाशित कुछ पुस्तकों में विवेचित पुस्तक 'गंगा समग्र' को एक पठनीय पुस्तक माना जा सकता है। 19 अध्यायों में विभक्त इसकी भूमिका जगद् गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती और गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंड्या ने लिखी है। इसमें गंगा के सभी पहलुओं की सांगोपांग विवेचना की गई है। पुस्तक में धर्म, आध्यात्मिकता, लोक संस्कृति, आर्थिक पक्ष, औषधीय गुण, प्रदूषण के राज्यवार कारण, गंगा संरक्षण से संबंधित विभिन्न आंदोलन और गंगा संरक्षण के विकल्प भी  सुझाए गए हैं। हिन्दू चाहे किसी नगर या ग्राम में रहते हों, स्नान करते समय यही भावना रखते हैं कि वे  गंगाजी के पवित्र जल में स्नान कर रहे हैं। स्नान के समय वे मंत्र बोलते हैं- ''गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती नर्मदे सिंधु कावेरी जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु।'' कलियुग में गंगा की अत्यधिक महिमा बताई गई है। गंगा कर्म, ज्ञान और भक्ति का योग हैं। वे कर्म के प्रतीक ब्रह्मा के कर कमंडल से निकलती है, इस कारण कर्म की प्रतीक हैं। शिव के मस्तक पर विराजमान होने के कारण ज्ञान का प्रतीक हैं और विष्णु के चरण से निकले के कारण भक्ति योग की  प्रतीक हैं। यानी जिस भी रूप में चाहें, गंगा को प्राप्त कर सकते हैं। आरोग्य की दृष्टि से गंगा में जो गुण पाए जाते हैं, वे वर्णातीत हैं। गंगा जल में तांबा, स्वर्ण, पारद आदि धातुओं एवं अनेक बहुमूल्य क्षारों की ऐसी संतुलित मात्रा मिलती है, जिसे औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। चरक ने गंगा जल को पथ्य और औषधि माना। हिमालय की जड़ी-बूटियों, औषधियों, खनिजों एवं अनेकों रहस्यमय व चमत्कारी गुणों से युक्त गंगाजल के विलक्षण गुण देश-विदेश के वैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध और प्रमाणित हो चुके हैं।
मुगल बादशाह अकबर व्यक्तिगत रूप से खाने और पीने में गंगा जल का सेवन करते थे। 'आईने-अकबरी' में इसका जीवंत चित्रण है। इसमें लिखा है- ''जहांपनाह गंगा जल को जीवन का स्रोत एवं ईश्वरीय जल कहते हैं और गंगाजी की देख-रेख करते हैं।'' लोक जीवन में गंगा संतान एवं सुख-समृद्धि दायिनी के रूप में पूजित हैं। ग्रामीण महिलाओं द्वारा इससे जुड़े अनेक प्रकार के गीत गाये जाते हैं। मल्लाह गंगा की सबसे ज्यादा पूजा करते हैं। इस प्रकार गंगा भारत की लोक संस्कृति और लोक परंपरा में रची-बसी हैं। उन्हें सभी नदियों की अग्रजा, सभी सरिताओं में श्रेष्ठ और सभी तीर्थों के जल से उत्पन्न माना गया है। तीनों लोकों में प्रवाहित और पूज्य होने के कारण उन्हें 'त्रिपथगा' कहा गया है। भारतीय जनमानस में गंगा की छवि हिमालय से बंगाल की खाड़ी तक एक पारलौकिक सत्ता के रूप में अंकित है। गंगा करोड़ों हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए मां समान हैं, जिनके बिना जन्म से लेकर मृत्यु तक कोई भी संस्कार संपन्न नहीं होता। मृत्यु के समय व्यक्ति के मुंह में गंगाजल डाला जाता है और मृत्यु के बाद अस्थि विसर्जन गंगा तट पर किया जाता है।
गंगा की महिमा के बखान के साथ डॉ. विवेकानंद तिवारी इसके अस्तित्व को लेकर भी चिंता जताते हैं। वे लिखते हैं, ''विकास के नाम पर हमने गंगा को लगातार मैला करने का काम किया है और आज भी कर रहे हैं। गंगा सफाई के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया गया, लेकिन इसकी सेहत बिगड़ती ही गई। बात गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने की नहीं, बल्कि इसके अस्तित्व को बचाने की होनी चाहिए।'' सीवेज, औद्योगिक एवं रासायनिक कचरे के कारण उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में गंगा का जल बेहद प्रदूषित हो गया है। इसके अलावा, इन राज्यों में गंगा के अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगा है। दरअसल, नदी का मतलब सिर्फ पानी नहीं होता। नदी में तमाम जीव-जन्तु और छोटे-बड़े पत्थर बहकर आते हैं। ये सब प्राकृतिक संपदा हैं। नदी का प्रवाह रुकने पर मछलियों और दूसरे जीव-जन्तुओं का आना असंभव हो जाता है। गंगा के स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि इसका प्रवाह नहीं टूटे। तभी हम नदी को बचा सकते हैं।
पुस्तक में गंगा के अनेक पक्षों को एक स्थान पर रखने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक गंगा के प्रति जिज्ञासा रखने वालों को भाएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।                          -मेजर हर्ष कुमार

 

पुस्तक का नाम : गंगा समग्र
लेखक     :  डॉ. विवेकानंद तिवारी
मूल्य        : 400 रु.
पृष्ठ         :  500
प्रकाशक :  सस्ता साहित्य मंडल         
                     प्रकाशन,   एन-77      
                     कनॉट प्लेस
                     नई दिल्ली-01
फोन        :    011-23310505
                     41523565    

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