विविध-‘अध्यात्म का रास्ता जीवन के लिए सुखद’
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विविध-‘अध्यात्म का रास्ता जीवन के लिए सुखद’

Written byArchiveArchive
Nov 13, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 13 Nov 2017 14:32:01

गत दिनों नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) में तीन दिवसीय युवा विमर्श सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन का शुभारम्भ राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ.कृष्ण गोपाल ने किया। ‘आधुनिक सभ्यता की चुनौतियां’ विषय पर उन्होंने कहा कि विज्ञान की दृष्टि सीमित है। जहां विज्ञान रुकता है, वहां से अध्यात्म शुरू होता है। आधुनिक सभ्यता में विज्ञान द्वारा अर्जित भौतिक प्रगति की स्पर्धा में अध्यात्म को जीवन से निकाला जा रहा है जो चिंता का विषय है। पश्चिम द्वारा प्रायोजित आधुनिक सभ्यता ने दुनिया को एक बाजार बना दिया है, जिसमें व्यक्ति को अपने लाभ के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। समाज प्रतिस्पर्धी बन गया है। प्रतिस्पर्धा सफलता के लिए जरूरी है, लेकिन इस कारण आज व्यक्ति समाज से अलग-थलग होता जा रहा है, दूसरों से अधिक अर्जित करने की लालसा से उसमें ईर्ष्या और द्वेष की भावना बढ़ती जा रही है। इस सबके चलते व्यक्तिगत सम्बन्ध समाप्त होते जा रहे हैं, जिससे अवसाद और डिप्रेशन लोगों में बढ़ता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि हमें विज्ञान और अध्यात्म के बीच समन्वय बैठाने की आवश्यकता है। विचार करना होगा कि मनुष्य को इतनी सुविधाएं देने वाला विज्ञान अवसाद कैसे दे रहा है। आधुनिक सभ्यता के अग्रदूत अमेरिका में 1.6 करोड़ बच्चों के पास उनके मां-बाप नहीं हैं, 4़1 करोड़ बच्चों को वहां की सरकार पाल रही है। आधुनिक सभ्यता ने जिस उपभोक्तावाद को जन्म दिया है, उस कारण हमारी आवश्यकताएं असीमित हो गई हैं, अधिक पाने की चाहत ने मनुष्य को परिवार-कुटुम्ब से दूर कर दिया है। इन चुनौतियों से निकलने का मार्ग अध्यात्म पर आधारित भारतीय संस्कृति में ही है, जो सामूहिकता की भावना हमें देती है। कार्यक्रम के दूसरे दिन प्रमुख रूप से उपस्थित भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय संगठन मंत्री श्री मुकुल कानिटकर ने कहा कि हमारे यहां पढ़ाने की पद्धति और प्रक्रिया उच्चतर शिक्षा में भी वैसी ही है, जैसी उसके नीचे की कक्षाओं में है। सवाल यही है फिर उसे उच्चतर शिक्षा क्यों कहा जा रहा है? भारतीय शिक्षण मंडल मानता है कि शिक्षा का विभाजन नहीं होना चाहिए। देश में शिक्षा को लेकर एक स्पष्ट लक्ष्य होना चाहिए। हमें अपनी शिक्षा को गुरुकुल की तरह विद्यार्थी केन्द्रित करना होगा, तभी विश्व में हमारी पहचान बरकरार रहेगी।
उन्होंने कहा कि हमें विद्यार्थियों को परीक्षा के लिए नहीं, भविष्य के लिए तैयार करना होगा। सिर्फ नौकरियों के लिए तैयार करना हमारा उद्देश्य नहीं होना चाहिए। हम विश्वगुरु हैं, अपनी शिक्षा के बल पर उसे आगे तक बरकरार रखना होगा। समापन समारोह में प्रमुख रूप से राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह सम्पर्क प्रमुख श्री अरुण कुमार उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान 1962 का युद्ध हारने के बाद से युद्ध करने की हिम्मत नहीं करता है। अब वह आतंकवाद का सहारा लेकर देश को तोड़ने की नाकाम कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान की नीति स्पष्ट है, उसकी सेना भारत को छोटे-छोटे घाव देकर तोड़ना चाहती है। भारत के प्रति चीन की नीति भी साफ है, चीन पाकिस्तान का इस्तेमाल भारत के प्रति करता आया है। हमारे देश में पड़ोसी देशों को लेकर कभी भी स्थिति और नीति साफ नहीं रही है। नेपाल से ज्यादा नेपाली बोलने वाले भारत में रहते हैं। इसके बावजूद हम नेपाल को लेकर भ्रम की स्थिति में रहे। अपने देश की सीमा बताते समय हम केवल भूमि की बारे में बताते हैं, जबकि एक महत्वपूर्ण हिस्सा सागर का भूल जाते हैं। आज के समय में थल के अलावा जल का भी सामरिक महत्व है, उसे हमें समझना होगा और वैसे ही नई रणनीति बनानी होगी।  
 (इंविसंकें, नई दिल्ली)

‘बच्चे को मां से मिलते हैं संस्कार’
सेवा भारती (मध्य भारत), भोपाल द्वारा संचालित मातृछाया शिशु कल्याण केंद्र के नवनिर्मित स्थान का लोकार्पण पिछले दिनों  सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री सुहास राव हिरेमठ, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल गौर एवं सेवा भारती, मध्य भारत प्रांत के अध्यक्ष श्री गोपाल कृष्ण गोदानी, क्षेत्रीय संगठन मंत्री, सेवाभारती श्री रामेंद्र सिंह उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में श्री सुहास हिरेमठ ने मां की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए अनेक उदाहरणों सहित अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मां का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए ही मां के बिना बच्चे का ठीक से विकास नहीं होता है। बच्चे मां से ही उचित संस्कार प्राप्त करते हैं। इस भवन का नाम मातृछाया शिशु कल्याण केंद्र रखा गया है और यहां जिस प्रकार से यशोदा मांओं के बीच बच्चों का लालन-पालन होता है, नि:संदेह यह हम सभी के लिए गौरव की बात है। समाज को ऐसे सभी कार्यों में बढ़-चढ़कर सहयोग करना चाहिए तथा इन कार्यों में निष्काम भाव से सेवा देने वालों के प्रति भी अपना आभार व्यक्त करते रहना चाहिए।      प्रतिनिधि

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