रणबांकुरों की धरती
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रणबांकुरों की धरती

Written byArchiveArchive
Nov 13, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 13 Nov 2017 11:56:40


हरियाणा में  प्राचीन काल से  शौर्य, राष्टÑ प्रेम, बलिदान और वीरता की परंपरा चली आ रही है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर द्वितीय विश्वयुद्ध, पाकिस्तान और चीन के साथ हुए युद्धों में हरियाणा के वीर सैनिकों ने साहस एवं वीरता का अदम्य परिचय दिया और विक्टोरिया क्रॉस से लेकर परमवीर चक्र तक हासिल कर राज्य का गौरव बढ़ाया

डॉ. अतुल यादव

हरियाणा प्राचीन काल से ही स्वतंत्रता व स्वाभिमान के लिए जूझने वाले रणबांकुरों और सूरमाओं की भूमि रहा है। 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राज्य के लोगों की भूमिका अनुकरणीय रही। दोनों विश्वयुद्धों में यहां के युवाओं ने दुनिया में अपनी वीरता की धाक जमाई व विक्टोरिया क्रॉस समेत अनेक शौर्य पदक जीते। चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों में सूबे के वीर सैनिकों ने अद्वितीय शौर्य का प्रदर्शन किया तथा परमवीर चक्र, महावीर चक्र, वीर चक्र व अन्य शौर्य सम्मान प्राप्त कर शौर्य परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ा।

बर्मा में जापानी सैनिकों को रोकने के लिए 25 जनवरी, 1944 को  पंजाब रेजिमेंट की कमान भिवानी के सूबेदार रामस्वरूप सिंह को सौंपी गई। एक पैर घायल होने के बावजूद तीन तरफ से घिरे रामस्वरूप एक एलएमजी की बदौलत साथियों के साथ आगे बढ़ते रहे और दुश्मनों को मौत के घाट उतारते रहे। बाद में वे और गंभीर रूप से जख्मी हो गए, लेकिन आखिरी सांस तक लड़े व विक्टोरिया क्रॉस के हकदार बने।

प्रथम विश्वयुद्ध में तत्कालीन पंजाब के पिछड़े दक्षिणी भाग ‘हरियाणा’ के अंग्रेजी आधिपत्य वाले चार क्षेत्रों अंबाला, हिसार रोहतक व गुड़गांव के साथ जींद, लुहारू, दुजाना व पटौदी रियासतों से युवक सेना में भर्ती हुए। 1914 से 1918 तक चले युद्ध के दौरान पूरे पंजाब से करीब 1.15 लाख युवा सेना में भर्ती हुए, जिनमें करीब 80,000 हरियाणा से थे। पंजाब के सभी 28 जिलों में रोहतक तीसरे, गुड़गांव छठे व हिसार 9वें स्थान पर रहा। खास बात यह कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अहीरवाल के अहीरों/यादवों की सेना में भर्ती पर अघोषित पाबंदी लगा दी गई थी, जिसे समाप्त करवाने के लिए राव युधिष्ठिर सिंह (रामपुरा) ने भरसक प्रयास किया। उनकी कोशिशों के बाद जनवरी 1900 तक केवल 487 यादव सैनिक भर्ती किए गए, किंतु प्रथम विश्वयुद्ध के दबावों के चलते अंग्रेज सरकार को अपनी अघोषित नीति बदलनी पड़ी। युद्ध समाप्त होने तक भारतीय सेना में अहीर जवानों की संख्या 19,546 हो गई, जो कुल सैनिकों का 2.6 फीसदी थी। सैन्य भर्ती में रोहतक के राव बहादुर चौ. लाजपत राय, पं. जानकीदास, राय बहादुर सेठ सुखलाल व करनाल के चौ. बंशगोपाल की भूमिका अहम रही। साथ ही, युद्ध में सहायता के लिए सरकार को हिसार, रोहतक, गुड़गांव, करनाल व अंबाला से करीब 1.72 लाख रुपये और चारों रियासतों से करीब 15 लाख रुपये का योगदान दिया गया।
हरियाणा के वीरों ने अफ्रीका, यूरोप व मध्य-पूर्व में जाट, अहीर, मेव, राजपूत, पंजाबी हिंदू, पठानों व मुसलमानों ने अदम्य साहस दिखाया। फिलीस्तीन की जॉर्डन नदी पर लड़ते हुए झज्जर के रिसालदार बदलू सिंह 23 सितंबर, 1918 को बलिदान हुए। उन्होंने मात्र 6 साथियों के साथ दुश्मन का मुकाबला किया और अकेले ही दुश्मन को हथियार डालने के लिए मजबूर किया। अंग्रेज सरकार ने बदलूराम को मरणोपरांत सर्वोच्च शौर्य पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया। इसके अलावा 6 जाट लाइन इन्फैंट्री में रोहतक के जमादार इंछाराम व लखीराम ने युद्ध के आरंभ में ही बेल्जियम में दुश्मनों से लोहा लिया। दोनों को मिलिट्री क्रॉस से नवाजा गया। इस युद्ध में राज्य के वीरों को 16 ओबीआई, 47 आईओएम, 2 आईडीएसएम, 61 आईएमएसएम, 31 फॉरेन डेकोरेशन व भारी मात्रा में मेंशन इन डिस्पैचिज से सम्मानित किया गया। बहुत से सिपाहियों को जागीर व पेंशन भी दी गई।
प्रथम विश्वयुद्ध की तुलना में द्वितीय विश्वयुद्ध में सूबे के युवाओं का योगदान अधिक रहा। 1939-1945 तक अंबाला, गुड़गांव, हिसार, करनाल व रोहतक से करीब 1.25 लाख, जबकि चारों रियासत से करीब 10,000 युवा सेना में भर्ती हुए। यहां भी हिसार व रोहतक ही अग्रणी रहे। रावलपिंडी के बाद रोहतक का स्थान था, जहां से करीब 35,000 युवक सेना में भर्ती हुए। इसी समय अंबाला छावनी की स्थापना की गई। इस युद्ध में हरियाणवी सैनिकों ने इटली व पूर्वी अफ्रीका में अदम्य रणकौशल का परिचय दिया। कंपनी कमांडर के घायल होने के बाद भिवानी तथा तत्कालीन पटियाला रियासत के सूबेदार रिछपाल राम ने इरीट्रिया (वर्तमान इथोरिया के पास) कमान संभाली तथा 7, 8 व 11 फरवरी, 1941 को तीन साथियों के साथ मोर्चे पर डटे रहे। लेकिन दुश्मन के एक हमले में रिछपाल राम का पांव जख्मी हो गया। रिछपाल राम विक्टोरिया क्रॉस जीतने वाले हरियाणा के दूसरे तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के भी दूसरे सिपाही बने। घायल होने के बावजूद पांच दुश्मनों को ढेर करने वाले भिवानी के ही कंपनी हवलदार मेजर देलूराम को भी विक्टोरिया क्रॉस मिला। बर्मा में एक अहम चोटी से दुश्मनों को खदेड़ने वाले रोहतक के जमादार अब्दुल हफीज विक्टोरिया क्रॉस जीतने वाले पहले मुस्लिम सिपाही बने। पंजाब रेजिमेंट में भिवानी के सूबेदार रामस्वरूप सिंह ने एक पैर घायल होने के बावजूद कई जापानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा और वीरगति को प्राप्त हुए। उन्हें विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया। भिवानी के ही 5वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड के कंपनी हवलदार मेजर छैलूराम ने 19 अप्रैल, 1943 की रात को डिजेबल गार्सी में अदम्य साहस का परिचय दिया। दुश्मनों ने छैलूराम की बटालियन के अग्रगामी दल का रास्ता रोक दिया और कंपनी कमांडर भी घायल हो गए। तब छैलूराम ने न केवल 3-4 दुश्मनों को ढेर कर बटालियन का रास्ता साफ किया, बल्कि घायल होने के बावजूद अलग-अलग मोर्चों पर जवानों का हौसला बढ़ाते रहे और आखिरी सांस तक कंपनी की कमान संभाले रखी। सरकार ने उन्हें विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया।
बर्मा की कलादान घाटी भी संघर्ष का अहम बिंदु रही। यहां तोपखाना रेजिमेंट के हवलदार उमराव सिंह (झज्जर) को दुश्मन का सामना करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। उनके सभी साथी मारे गए और वे खुद भी बुरी तरह घायल हो गए। दोनों तरफ का गोला-बारूद समाप्त हो गया। तब उन्होंने लोहे के सरिये से जापानियों का मुकाबला किया और 8 दुश्मन सैनिकों को ढेर कर दिया। उमराव सिंह को विक्टोरिया क्रॉस और इसी युद्ध में रेवाड़ी के सूबेदार मेजर सूरत सिंह को मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया। इस युद्ध में हरियाणा के अधिकारियों व सैनिकों को 5 विक्टोरिया क्रॉस, 12 मिलिट्री क्रॉस, 2 आईओएम, 8 आईडीएसएम, 6 एमएम व 5 मेंशन इन डिसपैचिज तथा एक बीएसओ से सम्मानित किया गया। 1947 में आजाद होते ही पाकिस्तान के साथ भारत का युद्ध हुआ, जिसमें हरियाणा के वीरों की मदद से ही 4 कुमाऊं रेजिमेंट के मेजर सोमनाथ शर्मा ने आजाद भारत का प्रथम सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र जीता। इस युद्ध में हरियाणा के 8 सैनिकों को महावीर चक्र (3 को परणोपरांत), 33 को वीर चक्र दिए गए। दो महावीर चक्र व 8 वीर चक्र केवल भिवानी के सैनिकों ने जीते।
1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान लद्दाख में 18 हजार फुट की ऊंचाई पर प्रतिकूल परिस्थितियों और अभावों के बावजूद 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी ने दुश्मनों का मुकाबला किया। इस कंपनी में हरियाणा के 120 जवान व अफसर थे तथा मेजर शैतान सिंह इसके कमांडर। शैतान सिंह ने 35 सिपाहियों की एक पलाटून का नेतृत्व जमादार सूरजा (उत्तर), जमादार हरिराम को दर्रा तथा जमादार रामचंद्र को मध्य की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी। नायक रामकुमार यादव को मोर्टर की जिम्मेदारी मिली। 18 नवंबर को चीनी सेना के साथ चुशूल सेक्टर में घमासान लड़ाई के दौरान चार्ली कंपनी ने सैकड़ों चीनी सैनिकों को मार गिराया। जब गोला-बारूद खत्म हो गया तो वीर सैनिक निहत्थे ही लड़े। पहलवान सिंह राम ने तो दुश्मन के कई सैनिकों को उठा-उठाकर चट्टानों पर फेंक दिया। चार्ली कंपनी के अफसर व जवान शत्रुओं से जूझते हुए वीरगति को प्राप्त हुए तब चीनी सेना को विजय मिली, किंतु भारी जान-माल के नुकसान के उपरांत। इस युद्ध में झज्जर के विंग कमांडर जगमोहन नाथ सहित चार को महावीर चक्र, स्क्वाड्रन लीडर एएस विलियम तथा हिसार के विंग कमांडर सूर्यकांत बधवार सहित 18 को वीर चक्र से नवाजा गया। मेजर शैतान सिंह का शौर्य तो प्रसिद्ध है ही। वे आखिर तक अपने पैर से मशीनगन चलाते रहे। उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। चीन से युद्ध के बाद अभी भारतीय सेना संभली भी नहीं थी कि 1965 में पाकिस्तान ने हमला कर दिया। तब हरियाणवी सैनिकों ने हाजीपीर दर्रा व डोगराई में अपूर्व वीरता का परिचय दिया। मेजर रणजीत सिंह दयाल, विंग कमांडर जगमोहन नाथ तथा हिसार के एयर मार्शल प्रेमपाल सिंह को महावीर चक्र प्रदान किया गया। इस युद्ध में हरियाणा के सैनिकों ने 6 महावीर चक्र, 21 वीर चक्र व कई सैन्य पदक प्राप्त किए।
70 के दशक में भारतीय सेना सशक्त हो चुकी थी। इसी दौरान पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में राजनीतिक अस्थिरता के बीच शेख मुजीबुर्रहमान ने विद्रोह कर दिया, जिससे 1971 में एक बार फिर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ। इसमें मेजर विजय रतन चौधरी को महावीर चक्र, जबकि  3 ग्रेनेडियर्स के मेजर होशियार सिंह (सोनीपत) को परमवीर चक्र मिला। युद्ध में सूबे के 10 सैनिकों को महावीर चक्र, 42 वीर चक्र, 6 सेना चक्र, 4 वायुसेना तथा दो को नौसेना चक्र से नवाजा गया। इसके अतिरिक्त समय-समय पर होने वाले सैन्य अभियानों में भी हरियाणवी सैनिकों ने वीरता का परिचय दिया। इनमें नायक उमराव सिंह (गुड़गांव) 1952, ब्रिगेडियर गोबिंद सिंह (रोहतक) 1961, हवलदार लखमीचंद (भिवानी) 1967, नायब सूबेदार अमर सिंह (रेवाड़ी) 1972 में वीर चक्र व ब्रिगेडियर राय सिंह यादव (रेवाड़ी) को 1967 में महावीर चक्र मिला। महेंद्रगढ़ के सूबेदार जसवंत सिंह को 1982 में शौर्य चक्र और सूबेदार महावीर सिंह यादव को 1984 में आॅपरेशन ब्लू स्टार के दौरान मरणोपरांत कीर्ति चक्र दिया गया। इसी तरह 1984 में हिसार के ले. रामप्रकाश को अशोक चक्र व रोहतक के ब्रिगेडियर महावीर सिंह बल्हारा को 1986 में कीर्ति चक्र मिला। 1988 में झज्जर के सूबेदार होशियार सिंह व कर्नल दलवीर सिंह, महेंद्रगढ़ के नायक महावीर सिंह यादव तथा 1989 में नायक महावीर सिंह व नायक राजबीर, कुरुक्षेत्र के विंग कमांडर विश्वनाथ प्रकाश व फरीदाबाद के ले. राजेंद्र सिंह को वीर चक्र से नवाजा गया। आॅपरेशन पवन के दौरान 1990 में रेवाड़ी के हवलदार अजीत सिंह यादव (मरणोपरांत) व 1991 में पंचकुला के मेजर चंद्र बल्लभ शर्मा को वीर चक्र मिला। 1993 में रोहतक के लांस नायक राकेश सिंह, 1994 में महेंद्रगढ़ के सूबेदार सज्जन सिंह यादव को आॅपरेशन रक्षक के दौरान तथा रोहतक के मेजर राजीव कुमार जून को अशोक चक्र प्रदान किए गए। इसी तरह रोहतक के कप्तान सुनील खोखर को 1994 में आॅपरेशन मेघदूत के दौरान मरणोपरांत वीर चक्र, 1994 में रेवाड़ी के मेजर धर्मेश यादव को आॅपरेशन रक्षक, 1997 में रोहतक के ही मेजर सज्जन सिंह गहलोत को शौर्य चक्र, 1998 में कुरुक्षेत्र सिपाही बलबीर सिंह को मरणोपरांत कीर्ति चक्र, भिवानी के मेजर जोगिंद्र सिंह व रोहतक के कर्नल एम.एस. कादियान को 2000 में कीर्ति चक्र मिला।
1999 में कारगिल आॅपरेशन विजय में हिसार के मेजर बी.के. सहरावत, महेंद्रगढ़ के नायब सूबेदार जोगिंद्र सिंह यादव, भिवानी के नायक रणधीर सिंह व लांस नायक रामकुमार, गुड़गांव के मेजर विकास वोहरा को वीर चक्र तथा झज्जर के कप्तान बलवान सिंह को महावीर चक्र, जबकि काफी सैनिकों को सेना पदक व मेंशन इन डिस्पैचिज मिले।
(लेखक अंबाला कैंट शासकीय पीजी कॉलेज में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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