रोको रोहिंग्या
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रोको रोहिंग्या

Written byArchiveArchive
Sep 11, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 11 Sep 2017 10:56:11

 

भारत में रोहिंग्या घुसपैठियों की बढ़ती आबादी सुरक्षा के लिहाज से चिंताजनक है। इसको देखते हुए केंद्र सरकार ने सभी राज्यों से कहा है कि वे इनकी पहचान कर इन्हें भारत से बाहर करने में मदद करें

अरविंद शरण
भारत सरकार ने राज्य सरकारों से कहा है कि वे अवैध रूप से भारत में रह रहे रोहिंग्या घुसपैठियों की पहचान करें। इससे अनेक सेकुलरों के पेट में दर्द हो रहा है। वे कह रहे हैं कि मानवीय आधार पर रोहिंग्याओं को भारत में रहने दिया जाए। लेकिन सरकार को इनके बारे में जो जानकारी मिल रही है वह चिंताजनक है। आतंकवादी संगठन इन घुसपैठियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए सरकार का मानना है कि इन लोगों को देश से बाहर करना ही होगा।
आगे बढ़ने से पहले 2011-12 के दौर में चलते हैं। केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार थी। उन्हीं दिनों रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश के रास्ते भारत में प्रवेश कर रहे थे। सरकार ने उन्हें रोकने के लिए  कुछ नहीं किया। उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि ये विदेशी घुसपैठिए जम्मू से लेकर हैदराबाद तक बस चुके हैं। हाल के वर्षों में भारत में इनकी जनसंख्या काफी बढ़ी है और उसी तेजी से सुरक्षा के प्रति चिंताएं भी। केंद्र सरकार ने खतरे की इस आहट को गंभीरता से लिया और केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने हाल ही में संसद को बताया कि भारत रोहिंग्याओं को वापस म्यांमार भेजने का इरादा रखता है।
भारत में घुस आए रोहिंग्या घुसपैठियों की आबादी कितनी है, इसकी ठीक-ठीक जानकारी नहीं है। लेकिन सरकार का अनुमान है कि ये तकरीबन 40,000 हैं जिनमें से लगभग 16,500 ऐसे हैं जिन्हें संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग से शरणार्थी का दर्जा मिला हुआ है। ये देशभर में फैले हुए हैं लेकिन दिल्ली का कालिंदी कुंज, हरियाणा का नूंह, तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर का सांबा इनकी ‘पॉकेट’ बन गए हैं। दिक्कत की बात यह है कि म्यांमार की सेना रोहिंग्या मुसलमानों के साथ जो कुछ भी कर रही है, आतंकवादी संगठन उसे इस्लाम पर हमले के तौर पर प्रस्तुत करते हैं और इसका बदला लेने की मंशा भी जताते हैं। हमारे लिए चिंता की बात यहां से शुरू होती है। ऐसे कई संकेतक हैं जो रोहिंग्या मुसलमानों और आतंकवाद को एक-दूसरे पर असर डालने वाले कारक के तौर पर सामने लाते हैं। वर्ष 2013 में बोधगया में आतंकवादी हमला हुआ था और तब जांच में कुख्यात आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोयबा की भूमिका सामने आई थी। बेशक इस घटना में दो लोग घायल हो गए थे और उस दृष्टि से यह कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन इसे जिस मंशा के साथ अंजाम दिया गया था, वह निश्चित रूप से खतरे की घंटी बजाने वाली थी। यह हमला म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ हो रही ज्यादती का बौद्धों से बदला लेने के लिए किया गया था और इसकी साजिश लश्कर ने रची थी। पिछले साल सर्दियों के दौरान कश्मीर में हुई एक घटना भी कान खड़े करती है। तब मुठभेड़ में दो विदेशी आतंकवादी मारे गए थे, जिनमें एक मूलत: म्यांमार का रहने वाला था। रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों से हाफिज सईद के संगठन जमात उद दावा के संपर्क की बात भी यदा-कदा सामने आती रही है। इस कारण जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में बढ़ती रोहिंग्या आबादी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। राज्य में इनकी आबादी करीब 14,000 है और पिछले दो साल के दौरान इनकी संख्या तेजी से बढ़ी है। ये लोग गरीबी में जीवन-यापन कर रहे हैं और इनमें से कई नशीले पदार्थों की तस्करी जैसी गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त हैं। इनकी गरीबी ही इनके आतंकवादियों के हाथ का खिलौना बन जाने की आशंका पैदा करती है। जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक एस.पी. वैद्य कहते हैं, ‘‘यह बहुत ही गरीब तबका है और पैसे के लिए इससे गलत काम कराया जा सकता है। इन्हें कट्टरवाद की ओर भी धकेला जा सकता है। ऐसे में गलत मकसद से इनके इस्तेमाल की आशंका तो है ही।’’ रोहिंग्याओं की गैरकानूनी गतिविधियों को लेकर जम्मू में स्थानीय लोगों में काफी नाराजगी है और वे इन्हें निकाल बाहर करने की मांग कर रहे हैं। राज्य सरकार ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए कैबिनेट उपसमिति बनाकर समस्या से निबटने के उपाय सुझाने को कहा है। वैद्य कहते हैं, ‘‘देखें, समिति क्या उपाय निकालती है। एक बार सरकार के स्तर से फैसला हो जाए, तो चीजें स्पष्ट हो जाएंगी।’’

मतदाता पहचानपत्र और राशन कार्ड
वैसे हर रोहिंग्या मुसलमान की पहचान करना कोई आसान काम नहीं है। कारण, इनमें से कितने ही मतदाता पहचान पत्र से लेकर राशन और आधार कार्ड तक बनवा चुके हैं। इस तरह की बात कश्मीर से लेकर हैदराबाद और नूंह तक हुई जांच-पड़ताल में सामने आती है। हैदराबाद पुलिस को तो इस बात की भी आशंका है कि इन घुसपैठियों में से कुछ कुख्यात आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के जाल में भी फंस चुके हैं और कुछ संदिग्ध लोगों के खिलाफ तहकीकात की जा रही है। घरेलू स्तर पर जरूरत इस बात की है कि रोहिंग्या घुसपैठियों पर निगरानी रखी जाए, इनसे जुड़े मामलों के आंकड़े एकत्र किए जाए। क्योंकि जब तक इन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तैयार नहीं होती, यह सब तो करना ही होगा।

कूटनीतिक पहल
रोहिंग्या घुसपैठियों को वापस भेजने की राह कूटनीतिक पहल से ही संभव है। दिक्कत यह है कि म्यांमार में अशांति है। आए दिन वहां हिंसक झड़पें होती रहती हैं। ऐसे में क्या संभव है कि वहां बिना न्यूनतम स्तर की शांति बहाल हुए रोहिंग्या मुसलमानों को भेजा जा सके? जब भी संयुक्त राष्ट्र की तरफ से किसी को शरणार्थी का दर्जा दिया जाता है तो उसकी बड़ी कठिन प्रक्रिया होती है। तमाम तरह की जांच-पड़ताल की जाती है। बेशक भारत ने शरणार्थी समझौते पर दस्तखत नहीं किए हैं, लेकिन यहां तमाम देशों के शरणार्थी तो रहते ही हैं। ऐसे में एक सूरत तो यह हो सकती है कि सबसे पहले अवैध आव्रजकों को वापस भेजने की कोशिश की जाए। लेकिन यह काम भी कूटनीति की मदद से ही संभव हो सके। यह मामला नाजुक तो है ही क्योंकि अगर जल्दबाजी में म्यांमार पर जरूरत से अधिक दबाव बनाया गया तो इसके अप्रिय परिणाम भी हो सकते हैं। पूर्व राजनयिक योगेंद्र कुमार कहते हैं, ‘‘म्यांमार के रखाइन इलाके में भारत कई परियोजनाएं चला रहा है। इसके अलावा भारत पूर्वोत्तर राज्यों में लाखों डॉलर खर्च करके कलादान परिवहन गलियारा बना रहा है। यह एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। भारत कभी नहीं चाहेगा कि इस गलियारे पर कोई आंच आए। अगर रखाइन में अशांति रहेगी तो इसकी छाया हमारी इस परियोजना पर भी पड़ सकती है। सतर्कता इसलिए भी जरूरी है कि अलकायदा और लश्कर जैसे आतंकवादी संगठनों की रोहिंग्या मुसलमानों पर नजर है। वे इनका इस्तेमाल करने की फिराक में हैं। प्रधानमंत्री मोदी भी मानते हैं कि इस क्षेत्र में म्यांमार का एक अलग ही महत्व है और वह भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकता है।’’

संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन ने विगत में कई मौकों पर जातीय संघर्ष और रोहिंग्या मुसलमानों पर सेना के अत्याचार पर नाराजगी जताते हुए म्यांमार सरकार को चेताया। मानवाधिकार संगठन और विश्व जनमत के दबाव का यह असर हुआ कि सितंबर 2016 में संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान की अगुआई में एक आयोग बना जिसने चंद दिन पहले ही अपनी अंतिम रपट दी है। 24 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता स्टीफन डुजेरिक ने न्यूयॉर्क में संवाददाताओं से बातचीत में कहा, ‘‘रखाइन पर सलाहकार आयोग की व्यापक रपट जारी होने का हम स्वागत करते हैं जिसमें पहचान और नागरिकता पर जोर दिया गया है और सभी लोगों की यहां-वहां जाने-रहने की आजादी की मांग की गई है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि आयोग ने हिंसा की मूल वजहों को समाप्त करने और जातीय संघर्ष को मिटाने की बात कही है। योगेंद्र कुमार इसे एक सकारात्मक पहल के रूप में देखते हैं और कहते हैं, ‘‘घाव पुराना हो तो इलाज में समय लगता है। जब तक वहां रह रहे सभी समुदायों के हितों की बात नहीं होगी, शांति की राह नहीं निकलेगी। अब भारत को अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ानी होगी।’’ वैसे, कोफी अन्नान आयोग का हिंसा की मूल वजहों को खत्म करने पर जोर देने का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि जो पक्ष सेना के जुल्म की तेज आवाज में दबकर रह गया, वह सामने आ जाएगा। हकीकत यह है कि वहां रोहिंग्या मुसलमानों द्वारा बौद्धों पर तरह-तरह के जुल्म का लंबा इतिहास रहा है। वैसे इसकी बुनियाद मुख्य रूप से 15वीं शताब्दी में पड़ी जब बंगाल के सुल्तान जलालुद्दीन मोहम्मद शाह थे। उन्होंने रखाइन से भागकर आए वहां के शासक सू मून की मदद की थी। जलालुद्दीन से सैन्य मदद पाकर सू मून ने 15वीं सदी के मध्य में रखाइन के राजाओं को हराया, लेकिन सुल्तान ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए रखाइन में बड़ी संख्या में मुस्लिमों को भेज दिया। इसके बाद लगभग 100 साल तक बंगाल में पुर्तगाल के लुटेरों का आतंक रहा और इससे बचने के लिए लोग बर्मा के निकटवर्ती इलाके रखाइन में जमते गए। जैसे ही रखाइन में मुसलमानों की संख्या ठीक-ठाक हुई, उन्होंने बौद्धों पर तरह-तरह के अत्याचार करने शुरू कर दिए। बाद में जब अंग्रेजों का शासन आया तो उन्होंने ‘बांटो और राज करो’ की अपनी पुरानी नीति पर चलते हुए बौद्धों और रोहिंग्या मुसलमानों को आपस में उलझाए रखा। अरसे तक अत्याचार सहने के बाद अब बौद्ध भी हिंसक हो गए थे। अंग्रेजों के जाने के बाद एक बार फिर रोहिंग्या मुसलमानों ने जमकर उत्पात मचाया। एक अनुमान के मुताबिक महीनों तक चले दंगे में हजारों बौद्धों का कत्ल हुआ।
आखिर बौद्ध कब तक अत्याचार सहते। उन्होंने कुछ साल से रोहिंग्या मुसलमानों की बदमाशी का जवाब देना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों इन रोहिंग्याओं ने म्यांमार की सेना की एक टुकड़ी पर हमला किया था। मीडिया रपट के अनुसार हमलावरों का आका सऊदी अरब में है। इन हमलावरों और उनके समर्थकों के विरुद्ध म्यांमार की सेना कार्रवाई कर रही है। कहा जा रहा है कि अब तक 200 रोहिंग्या अतिवादी और नागरिक मारे जा चुके हैं। इसलिए वे लोग जान बचाने के लिए बांग्लादेश की ओर भाग रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश उन्हें अपने यहां आने से रोक रहा है। आशंका है कि वे लोग भारत की ओर रुख करेंगे। अत: भारत को सजग रहना होगा।   

टकराव का मैदान भारत क्यों!

हर्ष वी. पंत
म्यांमार के लिए भारत उसका सबसे बड़ा पड़ोसी देश है। जब रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति वहां की सरकार का नजरिया सख्त हो गया और उनके लिए वहां जीना कठिन हो गया, तो वे जान बचाने के लिए भारत आने लगे। लेकिन भारत अरसे तक इस ओर से आंखें मूंदे रहा और इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में वैध-अवैध तरीके से घुस आने के बाद ये रोहिंग्या मुसलमान यहां-वहां बसने लगे।’’ मनमोहन सरकार इन लोगों को शरणार्थी नहीं, बल्कि अवैध आप्रवासी मानती थी। वर्तमान केंद्र सरकार का अनुमान है कि पिछले दो साल के दौरान रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी में चार गुना वृद्धि हुई है और इस कारण सरकार के कान खड़े हुए हैं। एक ठोस शरणार्थी नीति न होने के कारण इतनी बड़ी संख्या में किसी दूसरे देश से लोगों का आना दो तरह से नुकसानदेह है। पहला, इससे समाज पर एक अतिरिक्त दबाव पड़ता है। दूसरा, सुरक्षा के लिए भी यह एक खतरनाक पहलू हो जाता है। वैसे भी, वर्ष 2013 में बोधगया में आतंकवादी हमला महज इसलिए हुए कि वे रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ म्यांमार में सेना की कार्रवाई का बदला लेने के लिए बौद्धों को ‘सबक’ सिखाना चाहते थे। अब ऐसे में इस सवाल का उठना लाजिमी है कि म्यांमार की धरती पर रोहिंग्या मुसलमानों के उत्पात का मैदान आखिर भारत क्यों बने?
(लेखक किंग्स कॉलेज, लंदन में रक्षा अध्ययन विभाग में प्रोफेसर हैं)

2013 में बोधगया में आतंकवादी हमला महज इसलिए हुआ कि आतंकी रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ म्यांमार में सेना की कार्रवाई का बदला लेने के लिए बौद्धों को ‘सबक’ सिखाना चाहते थे।  ऐसे में सवाल का उठना लाजिमी है कि म्यांमार की धरती पर रोहिंग्या मुसलमानों के उत्पात का मैदान आखिर भारत क्यों बने?

यह बहुत ही गरीब तबका है और पैसे के लिए इससे गलत काम कराया जा सकता है। इन्हें कट्टरवाद की ओर भी धकेला जा सकता है। ऐसे में गलत मकसद से इनके इस्तेमाल की आशंका तो है ही।
—एस. पी. वैद्य, पुलिस महानिदेशक, जम्मू-कश्मीर

रखाइन में भारत कई परियोजनाएं चला रहा है। इसके अलावा पूर्वोत्तर राज्यों में लाखों डॉलर का कलादान परिवहन गलियारा बना रहा है। अगर रखाइन में अशांति रहेगी तो इसकी छाया हमारी इस परियोजना पर भी पड़ सकती है।
— योगेंद्र कुमार,  पूर्व राजनयिक

मामला बेहद खतरनाक  
ब्रिगेडियर  (से. नि.) आर.पी. सिंह

जब एक देश से लोगों का दूसरे देश में पलायन होता है तो स्वाभाविक रूप से सीमा के आसपास के इलाकों में इनकी बसावट ज्यादा होती है, लेकिन रोहिंग्या मुसलमानों के मामले में तो हालत ही कुछ और है। वे नूंह-मेवात आ जाते हैं। हैदराबाद पहुंच जाते हैं। और तो और, जम्मू-कश्मीर तक आ धमकते हैं। क्या यह बात गले से उतर सकती है कि जो समुदाय जान बचाने के लिए म्यांमार से भाग रहा हो, वह सीधे जम्मू-सांबा में आ बसेगा जिसकी बगल में आए दिन पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का खूनी खेल खेला जा रहा हो और इसकी आंच कभी भी उन तक पहुंच सकती है? एक बार जब वे भारत में घुस ही गए तो उनके लिए इससे अधिक सुरक्षित विकल्प भी तो थे? फिर उन्होंने हिंसाग्रस्त घाटी के पास के इलाकों को ही क्यों चुना?  अकेले जम्मू-कश्मीर में इनकी आबादी चौदह हजार से ऊपर हो चुकी है। रोहिंग्या मुसलमानों की बसावट का यह तरीका क्या स्वाभाविक है? मुझे नहीं लगता। म्यांमार के रखाइन प्रांत से बांग्लादेश आना, फिर बांग्लादेश सीमा पार कर भारत में घुसना और यहां आकर खास इलाकों में बस जाना, यह सब आनायास नहीं हो सकता। मेरा मानना है कि इन लोगों को भेजा जाता है, और जब भी कोई काम निरंतरता के साथ होता है तो उसका कोई मकसद जरूर होता है। इसलिए भारत की सुरक्षा के लिहाज से रोहिंग्या मुसलमानों का मामला बेहद खतरनाक है।         
हैरत की बात यह है कि अलकायदा, लश्कर-ए-तोयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के अलावा भी तमाम मुस्लिम विद्वान रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे ‘जुल्म’ को इस्लाम पर हमले के तौर पर प्रस्तुत करते हैं। अगर यह पूरे मुस्लिम समुदाय पर हमला है तो ये रोहिंग्या भारत जैसे किसी गैर-मुस्लिम देश में क्यों घुस आते हैं? उन्हें तो किसी मुस्लिम देश में ही जाना चाहिए था, जिससे वे सुरक्षित रह पाते। एक बात समझ लीजिए, मुसलमानों का बौद्धों से पुराना बैर रहा है। छठी शताब्दी तक पूरे मध्य एशिया में बौद्ध मत फैल चुका था। बामियान समेत जगह-जगह बुद्ध की प्रतिमाएं थीं। मुसलमानों को यह इस्लाम के लिए खतरा लगता था और इस कारण वे बौद्धों को देखना नहीं चाहते थे। रोहिंग्या मुसलमानों की बौद्धों के प्रति आक्रामकता की यह बड़ी वजह थी। उन्होंने बौद्धों पर बहुत जुल्म किए। बौद्ध तो तब आक्रामक हुए जब रखाइन में रोहिंग्या मुसलमान इन बौद्ध लोगों की तो छोड़िए, बौद्ध भिक्षुओं तक की हत्या करने लगे। भारत के लिए चिंता की एक बात यह भी है कि इस समुदाय में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई भी पैठ बना चुकी है। पाकिस्तान में आतंकवाद और आईएसआई का चोली-दामन का साथ रहा है। कोई आश्चर्य नहीं कि कल रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर भी ऐसी ही कोई बात सामने आ जाए। खतरनाक बात तो यह है कि पिछले दो साल के दौरान भारत में घुस आने वाले रोहिंग्याओं की आबादी में बड़ी तेज वृद्धि
हुई है। सरकार ने इन्हें वापस भेजने की बात कही है, लेकिन यह काम तुरत-फुरत में नहीं होने वाला। इसके लिए कई स्तर पर तैयारी करनी होगी। कूटनीतिक पहलू तो है ही, घरेलू स्तर पर भी हमें कई मोर्चों पर काम करना होगा। इसमें सबसे जरूरी है इनके बारे में पूरे देश से जानकारी इकट्ठा करना क्योंकि ये छोटे-छोटे गुटों में कहां-कहां तक फैल चुके हैं, कहना मुश्किल है। फिर इन पर पैनी नजर रखना। जब तक ये हमारे यहां हैं, इन पर नजर तो रखनी पड़ेगी।  (लेखक रक्षा विशेषज्ञ हैं)

दोषी है संप्रग सरकार  
राम बहादुर राय

वर्ष 1971 में बांग्लादेश बना था। तभी वहां से बड़ी संख्या में घुसपैठिए भारत आए थे और उसी का विस्फोट हुआ 1980 के असम आंदोलन में। असम के लोगों को लगा कि उनकी संस्कृति और अस्मिता खतरे में है। वहां के लोगों के मनो-मस्तिष्क में वह डर अब भी बना हुआ है। यूपीए की सरकार ने यह सब देखा, समस्याओं को जाना भी। उस समय भास्कर कुमार मित्रा म्यांमार में भारत के राजदूत थे। उन्होंने सरकार को एक रपट दी थी और एक कार्य योजना भी बताई थी। उसमें उन्होंने यह सलाह दी थी कि कि म्यांमार से इस मामले पर बात की जाए। तब वहां जुंटा का शासन था। म्यांमार में औपचारिक रूप से लोकतंत्र के स्थापित हो जाने के बाद आज भी वहां बंदूक के बल पर वही लोग शासन कर रहे हैं। मित्रा का सुझाव था कि इलाके को लेकर एक समझौता होना चाहिए और एक ऐसे क्षेत्र की पहचान की जानी चाहिए जहां रोहिंग्या मुसलमानों को बसाया जा सके ताकि उन्हें अपने तरीके से रहने और जीवन जीने का अधिकार मिले। रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी तत्कालीन बर्मा के रखाइन और उसके पास के इलाकों में सदियों से रह रही है। आज के बांग्लादेश वाले हिस्से से बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान समय-समय पर जाकर रखाइन में बसते रहे। इनके स्थानीय लोगों से संघर्ष की बात अक्सर सामने आती रही है और खास तौर पर बौद्धों के खिलाफ ये काफी आक्रामक रहे हैं। म्यांमार के ‘फौजी शासन’ का रुख रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति बहुत ही कठोर रहा है। उन पर तरह-तरह के अत्याचार किए गए। जब वहां सख्ती हुई तो ये भागकर कई देशों में चले गए। भारत में भी आए और यहां के कई हिस्सों में फैल गए। दो हफ्ते पहले गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने संसद में बयान दिया कि हम रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजेंगे। भारत सरकार की नजर में ये विदेशी घुसपैठिए हैं।
कायदे से यह पहल पूर्व की संप्रग सरकार के दौरान होनी चाहिए थी। अगर वे अपने राजदूत के सुझाव मान लेते तो आज बात कुछ और होती। लेकिन संप्रग सरकार समस्या को समझते हुए भी हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। उसकी अकर्मण्यता के कारण रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा दिन-ब-दिन बड़ा और बड़ा होता रहा। अब आज की सरकार को कदम उठाने पड़ रहे हैं और वह वही कदम उठा रही है जो उठाए जाने चाहिए थे। इसी के तहत सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने की बात कही है। लेकिन इस घोषणा के बावजूद कुछ विवाद बने हुए हैं। पहला, उनकी संख्या क्या है। गृह राज्यमंत्री के मुताबिक भारत में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या करीब 40,000  है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग में पंजीकरण है 16.5 हजार का। जबकि नागरिक संगठनों का एक मोटा अनुमान है कि चार-पांच राज्यों में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों की संख्या 80,000  से 1,00000 के बीच है। दूसरा, जिन रोहिंग्या मुसलमानों ने अवैध तरीके से मतदाता पहचानपत्र और राशन कार्ड वगैरह बनवा लिए हैं, उनकी पहचान कैसे हो? अब तो कई संगठनों ने इनको वापस भेजने के लिए आंदोलन भी शुरू कर दिया है। जम्मू-कश्मीर से इनको निकालने के लिए विश्व हिंदू परिषद और कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी आंदोलन कर रही है। इसी मुद्दे को लेकर इस साल फरवरी में वहां उच्च न्यायालय में याचिका डाली गई है। फिर रोहिंग्या मुसलमानों की एक बड़ी संख्या तेलंगाना में है, हरियाणा में है, उत्तर प्रदेश में है, राजस्थान में है।  दिल्ली के कालिंदी कुंज में उनकी कॉलोनी बनी हुई है। कई जगहों पर इनकी बसावट है। ऐसे में इनकी पहचान करना, फिर इन्हें म्यांमार वापस भेजने की कूटनीतिक जमीन तैयार करना एक चुनौती भरा काम है। लेकिन सरकार की मंशा स्पष्ट है और वह इसके उपाय भी निकालेगी, ऐसा मानना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष हैं) 

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