तिब्बत के स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा भारत का नैतिक कर्तव्य
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तिब्बत के स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा भारत का नैतिक कर्तव्य

Written byArchiveArchive
Sep 11, 2017, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 11 Sep 2017 10:11:56

पाञ्चजन्य
वर्ष: 1४  अंक: 6
15 अगस्त ,1960
इतिहास के पन्नों से

तिब्बत में चीनी नर-पिशाचों का तांडव, संपूर्ण सभ्य विश्व के लिए चुनौती
सन् 1954 में देहली में बैठकर श्री चाऊ ने तिब्बत के आन्तरिक स्वशासन के सम्मान की घोषणा की थी। पंचशील के सिद्धांतों की घोषणा की थी। उस पंचशील के घोषणापत्र की स्याही सूखने से पूर्व ही तिब्बत के आंतरिक मामलों के सभी केन्द्रों पर और जन-जीवन के प्रत्येक पहलू पर अपनी लाल फौज बैठाकर चीन में तिब्बत के तथाकथित स्वशासन को पूर्णतया भंग कर दिया।
इसके साथ ही 10 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुई अत्याचार और नरसंहार की आंधी (पं. नेहरू के शब्दों में 'हंगरी के बाद दूसरा सबसे बड़ा नरसंहार') की घटनाएं कुछ अत्यंत विश्वस्त और गोपनीय सूत्रों से प्राप्त हुई हैं। उसके अनुसार सारा तिब्बत एक सैनिक शिविर में परिणत हो गया है। तिब्बती मूल जाति को योजनाबद्ध छल-बल सहित नपंसुकता के इंजेक्शन लगाकर समाप्त किया जा रहा है, दस सहस्र से भी अधिक लोगों का क्रूरता से वध कर दिया गया और अभी तैयारी 'समिति' द्वारा प्रकाशित जनगणना में लाखों तिब्बतियों को गायब कर दिया गया है। यहां तक कि भारत आने वाले शरणार्थियों की आंखें फोड़ना, हाथ काटना उस तथाकथित बहु प्रचलित , 'सुधारों' की पृष्ठभूमि है। अत: इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पेंकिंग, तिब्बतियों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने में बुरी तरह असफल हुआ है।
दूसरी बात, जिस श्रम के सम्मान की बात यह कम्युनिस्ट करते हैं, तिब्बत में इन्हीं लोगों ने वृद्ध निरीह लामाओं से 18 घंटे तक एक दिन में बलात कठोर श्रम लिया है, एक दिन में 190 और प्रत्येक बार 500 गज तक पत्थर उठवाए हैं। इस प्रकार धर्म और व्यक्ति स्वातंत्र्य को समाप्त कर चीन तिब्बतियों के स्वतंत्रता-आंदोलन को दबाना चाहता है।
इधर तिब्बत के हनन पर भारत की आश्चर्यजनक तटस्थता के फलस्वरूप विश्व की प्रभावी सहानुभूति से वंचित तिब्बती देशभक्तों ने अपनी सारी शक्ति एकत्र कर शक्तिशाली चीनी शासन से निर्णायक युद्ध में झोक दी है। शांतिप्रिय लोगों को इतने बड़े पैमाने पर चीनियों के खिलाफ शस्त्र उठाना पड़ा, यह एक तरफ तिब्बतियों की अदम्य देशभक्ति तथा दूसरी तरफ चीन की क्रूरतम अमानुषिकता का प्रमाण है।
सन् 1951 में समझौते के विरुद्ध जब चीन ने तिब्बती सेना अपनी फौज से मिला ली तब 8 बटालियन से भी अधिक सैनिक, राकेट और बख्तरबंद गाडि़यां 8 हवाई अड्डे, हजारों बमवर्षकों की चीनी शक्ति का प्रतिरोध करने के लिए सारे तिब्बत में जन क्रांति भड़क उठी। केवल खम्पा ही नहीं तो आमेदो, होरपा गोलिक और हान आदि तिब्बत की सभी जातियों के लगभग 2 लाख तिब्बती पूर्व से पश्चिमी तिब्बत में लासा तक, दक्षिण पश्चिम में नेपाल की सीमा, उत्तर शिगात्सगे से खैवट जोग तक चीनी सेनाओं से संघर्षरत है। तिब्बतियों को निश्चित करना है कि क्या वह सदैव को अपना समाज, अपना भाग्य चीनी ताना-शाहों को सौंप देंगे? क्या आजादी के मूल्य पार खरीदी हुई शान्ति चीन की भूख शांत कर सकेगी? और क्या चीन किसी समझौते के सम्मान की गारण्टी दे सकता है?

''असम के दंगों में बाहर से प्रेरणा पाने वाले तत्वों का हाथ''
''निष्पक्ष जांच और केन्द्रीय हस्तक्षेप आवश्यक''- पं.दीनदयाल उपाध्याय

मैंने दस दिनों तक असम के दंगाग्रस्त क्षेत्रों का निरीक्षण कर जो दृश्य देखे उससे मेरा मस्तक लज्जा से झुक गया। मैं सोचता हूं कि क्या सचमुच हमारे देशवासी इतनी नीचता पर उतर सकते हैं।
ये शब्द हैं जनसंघ के महामंत्री पं. दीनदयाल उपाध्याय के, जो उन्होंने असम के दौरे से लौटकर एक वक्तव्य में कहे।
आपने आगे कहा कि यद्यपि इन घटनाओं को 'भाषाई' दंगे, यह नाम दिया गया हैं परन्तु 'राज्य भाषा' बनाने के प्रश्न से इसका कोई संबंध नहीं था। असमिया भाषा को वैधानिक रीति से राजभाषा तथा अन्य भाषाओं को योग्य संरक्षण के प्रश्न पर असम घाटी में कहीं भी मतभेद नहीं है। हां, कुछ मुट्ठीभर गैरजिम्मेदार तथा उग्र लोगों के पास इस आंदोलन का नेतृत्व इसीलिए चला गया कि विचारशील तथा राष्ट्रवादी तत्वों ने अपने को इससे दूर रखने का प्रयत्न किया। असमियों द्वारा जिन कारणों की 'गहराई' की बात कही जाती है उसका वास्तव में 'राज्य भाषा' से कुछ दूर का भी संबंध नहीं है।
असम सरकार के इस कथन से कि ये दंगे जनता के एकाएक उबाल का परिणाम हैं, इस बात से मैं सहमत नहीं। दंगाइयों की समान क्रियाएं, एक ही प्रकार की उड़ायी गई अफवाह यह सिद्ध करती है कि यह एकाएक नहीं, परंतु पूर्ण योजना बद्ध दिमाग की उपज है। इन दंगों में मुसलमानों ने जो पार्ट अदा किया है वह विशेष ध्यान देने योग्य है। असमी, यू.पी. बंगाली, सभी मुसलमानों ने लूट आदि अत्याचार में खुलकर भाग लिया है। बंगाली हिंदुओं के घर जले हैं पर उसी बीच रहने वाले मुस्लिम घर सुरक्षित हंै, यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र गोटेश्वर और नवगांव में दिखायी देता है। दंगाई भीड़ में 25 प्रतिशत से अधिक हिंदुओं का अनुपात नहीं था। यह बात इससे स्पष्ट है कि देवताओं की मूतियां भ्रष्ट हुई हैं और रामकृष्ण मिशन पर हमले हुए हैं, गायें जलाई गई हैं। इन्हीं कारणों से 'बंगाली हिंदू यह केड़ा' आंदोलन बन गया था।
सरकार अपने कर्तव्य में पूर्ण असफल रही है।  असम घाटी में तो कुछ दिन मानो सरकार थी ही नहीं। जहां भी स्थनीय अधिकारियों ने कहीं कठोर पग उठाए हैं वहां स्थिति नियंत्रण में रही है। राजनीतिक दलों का रवैया भी प्रशंसनीय नहीं रहा है। लोगों को भड़काने में भी कुछ लोगों का हाथ रहा है इस बात के विश्वसनीय कारण हैं।

पराधीनता में न सुख, न शांति
स्वतंत्रता मानव और राष्ट्र की स्वाभाविक आकांक्षा है। पराधीनता में न सुख है, न शांति। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता भी चाहिए। शासन का व्यक्ति और समष्टि के प्राकृतिक हित में हस्तक्षेप न करना तथा सदैव उसके अनुकूल चलना राजनीतिक स्वतंत्रता है। अर्थ के भाव-रूप अथवा अभाव-रूप से मनुष्य के हित में विघ्न न होना आर्थिक स्वतंत्रता है। समाज का व्यक्ति के स्वाभाविक विकास में बाधक न होकर साधक होना ही सामाजिक स्वतंत्रता है। इन स्वतंत्रताओं के राष्ट्रगत हुए बिना वे व्यक्ति को प्राप्त नहीं हो सकतीं। राज्य के सब अंगों द्वारा अपने-अपने कर्तव्य का पालन करने से सबको स्वतंत्रता प्राप्त होती है। लोकतंत्र के समान स्वतंत्रता भी अविभाज्य है। बिना शासनिक स्वतंत्रता के अन्य दो स्वतंत्रताएं हो नहीं सकतीं।
—पं. दीनदयाल उपाध्याय (विचार-दर्शन, खण्ड-7, पृ. 62)

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