आॅस्ट्रेलिया के सूने चर्च से जगी चिंता
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आॅस्ट्रेलिया के सूने चर्च से जगी चिंता

Written byArchiveArchive
Jul 31, 2017, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 31 Jul 2017 10:56:11

यूरोप और अमेरिका की भांति आस्ट्रेलिया में भी अब नास्तिकों की संख्या बढ़ रही है। सर्वेक्षण संस्थाओं के मतानुसार यह प्रवृत्ति र्इ्रसाइयत भविष्य की बाबत कोई आकर्षक तस्वीर प्रस्तुत नहीं करती

 मोरेश्वर जोशी
यूरोप और अमेरिका के साथ ही अब आॅस्ट्रेलिया में भी ईसाई समुदाय के अल्पसंख्यक होने की एक रिपोर्ट आई है। वहां की स्थिति यूरोप और अमेरिका से अधिक गंभीर है। इन तीनों महाद्वीपों में आक्रामक सेकुलरिज्म उफान पर है। दूसरी तरफ जिहादी आतंकवाद संगठित और आक्रामक होता दिखाई देता है। 2 माह पहले ब्रिटेन में एक सर्वेक्षण में स्पष्ट हुआ है कि वहां ईसाई अल्पसंख्यक हो चुके हैं। तो अमेरिका के 19 राज्यों में इसी स्थिति का चित्र सामने आया था।
इस सबके बीच, आॅस्ट्रेलिया को लेकर वहां के  मीडिया में महत्वपूर्ण खबरें पिछले एक साल से आ ही रही हैं। वहां की रैशनलिस्ट सोसाइटी आॅॅफ आॅॅस्ट्रेलिया द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण में कुछ आंकड़े सामने आए हैं। यह रिपोर्ट एक वर्ष पुरानी है। बेशक, इन संस्थाओं की पूर्ववर्ती रिपोर्ट कितनी सच्ची हंै, इस बारे में उनकी विश्वसनीयता की जांच होनी चाहिए। वैसे, इसके अनुसार उस देश के 45 प्रतिशत लोगों ने यह स्पष्ट किया है कि वे किसी भी मत में विश्वास नहीं करते। रैशनलिस्ट सोसाइटी की अध्यक्षा डॉ. मेरेडिथ ने इस सर्वेक्षण के बारे में कहा कि 6-7 साल पहले ही यह स्थिति बन गई थी, लेकिन जनगणना में इस तरह से प्रश्नों की रचना न होने के कारण यह बात स्पष्ट नहीं हुई। लेकिन अब यह होता दिख रहा है। उस जनगणना में व्यक्ति का जन्मजात मत कौन सा है, इसकी तो पूछताछ हुई थी, लेकिन क्या वह व्यक्ति वर्तमान में अपने उस मत में विश्वास करता है, इस पर वह चुप था। सोसाइटी द्वारा किए सर्वेक्षण में स्पष्ट हुआ है कि उस देश के 22 प्रतिशत लोगों ने उसमें ‘नो रिलीजन’ कहा है और 45 प्रतिशत लोगों ने कहा है कि वे ‘ईसाई’ हैं। इसमें और 13.4 प्रतिशत लोगों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है जिसमें उन्होंने कहा है कि वे आध्यात्मिक तो हैं, लेकिन किसी मत का पालन नहीं करते।
आॅस्ट्रेलिया में एक मध्यम चरण की जनगणना अगले महीने से शुरू हो रही है जिसमें यह चित्र और उभर कर आएगा। इस बार लगता है ‘नो रिलिजन’ का आंकड़ा न्यूनतम 44 प्रतिशत होगा। इस संदर्भ में ब्रिटेन, वेल्स और न्यूजीलैंड के भी आंकड़े दिए गए हंै। ब्रिटेन में 2011 में 25 प्रतिशत लोगों ने ‘नो रिलीजन’ लिखा था, 2014 में यह संख्या 48.5 प्रतिशत थी। आॅस्ट्रेलिया के पड़ोसी देश न्यूजीलैंड में 2013 की जनगणना के अनुसार 42 प्रतिशत लोगों ने ‘नो रिलीजन’ की तरफ संकेत किया था।
2011 में आस्ट्रेलिया में ‘नो रिलीजन’ चुनने वालों की संख्या में वृद्धि हुई थी, भले ही ईसाइयों की संख्या के हिसाब से वह सीमित थी। उस समय जो सर्वेक्षण कराया गया था उसमें 60.9 प्रतिशत यानी एक करोड़ 14 लाख लोगों ने  कहा था कि उनका मत ईसाई है और 29.2 प्रतिशत लोगों ने कहा था कि वे ईसाई नहीं थे। लेकिन 2013 में इसमें काफी अंतर आया। उस समय की सर्वेक्षण रिपोर्ट में इस संदर्भ में वहां के समाचारपत्र डेली न्यूज ने 19 अक्तूूबर 2015 को श्रीमती क्रिस्टीना जोन्स द्वारा प्रस्तुत अध्ययन रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें उन्होंने कहा है कि आॅस्ट्रेलिया में 2010 की जनगणना के अनुसार 67 प्रतिशत लोग ईसाई हैं, लेकिन यह अनुपात हर दिन बदलता दिख रहा है। अमेरिका की संस्था ‘पीयू’ ने संभावना जताई थी कि दुनिया की ईसाई जनसंख्या 2050 में अपना बहुसंख्यक दर्जा खो देगी। लेकिन यूरोप, अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया में देखें तो वे आज ही ईसाई के तौर पर अल्पसंख्यक जैसे बन गए हैं। हालांकि ‘पीयू’ संगठन ने जो संभावना जताई थी, वह उक्त संभावना से काफी अलग थी। वर्तमान में मुसलमानों की संख्या 160 करोड़ है और ईसाइयों की 220 करोड़। इससे एक यह जानी जा सकती है कि जनसंख्या के आधार पर महाशक्ति होने के इस खेल में कौन सा घटक क्या कर रहा है, यह देखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पश्चिमी देशों, जो आज की तारीख में महाशक्ति हैं, की स्थिति कितनी गंभीर हो चुकी है, यह अब हर दिन नए नए प्रमाणों से स्पष्ट हो रहा है। दूसरी ओर, आज आइएसआइएस के जिहाद से त्रस्त पश्चिमी यूरोप के लोग बड़े पैमाने पर अन्य देशों के साथ-साथ और आॅस्ट्रेलिया में भी शरणार्थी के तौर पर जा रहे हैं। उनका बड़े पैमाने पर कन्वर्जन जारी है। इस संदर्भ में आॅस्ट्रेलिया के एक विचारक ग्रेग शेरिडन का बयान सारी दुनिया में चर्चित है। उनका कहना है कि ‘‘विश्व में यूरोप, अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया ही ऐसे क्षेत्र हैं जहां पंथ का अस्तित्व तेजी से समाप्त हो रहा है। इन इलाकों को छोड़कर विश्व के अन्य हिस्सों में अन्य मत-पंथ तो फल-फूल रहे ही हैं, लेकिन उन हिस्सों में  ईसाई मत भी फैल रहा है। किसी समय महाशक्ति रहे इन क्षेत्रों में अब ईसाई मत बड़े पैमाने पर संदर्भहीन होता जा रहा है।         ऐसा यद्यपि पिछले 3-4 साल से ज्यादा दिखने  लगा है, पर यह प्रक्रिया पिछले 120 वर्ष      से जारी है।’’
वे आगे कहते हैं कि ‘‘आज दुनिया के उन देशों के लोगों की मानसिकता क्या है, इससे चर्च नेतृत्व कोसों दूर है। परिवार नियोजन के नियम, तलाक के कानून, गर्भपात के नियम, ईशनिन्दा कानून, संडे ट्रेडिंग, समलैंगिक विवाह और उनके द्वारा गोद लिए बच्चों के प्रश्न ही 21वीं सदी में सामाजिक हालात के विषय बने हुए हंै, ये वे प्रश्न हैं जिन्हें चर्च समझ नहीं सकता। पिछले 60 वर्ष से इसका प्रत्यक्ष असर दिख रहा है। 1954 में आॅस्ट्रेलिया में 74 प्रतिशत लोग रविवार को प्रार्थना करने चर्च जाते थे। वर्तमान में यह संख्या 10 प्रतिशत से कम है। पिछले 120 वर्षों में जो नहीं जगे, उनसे जगने की उम्मीद करना कहां तक सही है, यह अब लोगों को तय करना होगा।’’ ग्रेग के इस लेख पर दुनिया के हजारों लोगों ने टिप्पणी करना शुरू कर दिया है। भारत को इस स्थिति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए क्योंकि यह हमारे लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है। ‘ईसाई मत ही सच्चा है’, यह कहकर उन्होंने दुनिया में नरसंहार और लूट का अपना एजेंडा चलाया था। यद्यपि चर्च संगठनों का दावा है कि दुनिया में जो ईसाईकरण हुआ है वह मिशनरियों की ‘सेवा’ के बूते हुआ है, लेकिन ‘इन्क्विजीशन’ का इतिहास, जिसमें दुनिया के सबसे भयानक नरसंहार शामिल हैं, मुखर होकर बोलता है। प्रत्यक्ष आॅस्ट्रेलिया में 1901 के कानून के अनुसार किसी को भी ईसाई कन्वर्जन कराने की अनुमति नहीं है।  लेकिन चर्च ने ईसाई चरमपंथियों की सहायता से ही तीन चौथाई दुनिया पर कब्जा किया था।
आज भी चर्च की मदद से दुनिया के कई देशों में आंतरिक हस्तक्षेप जारी है। भारत में जारी जिहाद, उग्रवाद, विद्रोही कार्रवाइयों    और पृथकतावाद को भी हथियारों की रसद इन्हीं मिशनरी संगठनों ने कथित तौर पर जुटाई है। इसलिए आज चर्च की सत्ता वाले   देशों में उनकी स्थिति क्या है, यह जानना आवश्यक है।    

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