बात और रीत भारत की ही सही
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बात और रीत भारत की ही सही

Written byArchiveArchive
Jun 5, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 05 Jun 2017 12:00:35

 

विश्व पर्यावरण दिवस पर हर बार सबसे ज्यादा जताई जाने वाली चिंता है— दुनिया गर्म हो रही है! ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं! कई जगह समुद्री जल स्तर बढ़ रहा है!
ठीक, किन्तु इनसान का ‘पारा चढ़ने’ की रफ्तार तो इससे भी ज्यादा है! राजनीति विज्ञानी सैमुअल पी. हंटिग्टन ने 1996 में अपनी पुस्तक उ’ं२ँ ङ्मा उ्र५्र’्र९ं३्रङ्मल्ल२ में भविष्य का खाका खींचते हुए कहा था कि शीत युद्ध के बाद विश्व ऐसी स्थितियों की ओर बढ़ता जाएगा जहां संघर्ष के कारक राजवंश या देश नहीं, बल्कि विचार, सभ्यता और लोगों के तौर-तरीके होंगे। क्या यही नहीं हो रहा?
देश भौगोलिक असर और प्रसार का दायरा बदल रहे हैं। साम्यवादी चीन अब दुनिया के सबसे बड़े साहूकार की भूमिका में आने को उतावला है तो अमेरिका दुनिया भर की चौधराहट न करते हुए अपने को सिर्फ अमेरिका तक समेटने की बात कर
रहा है। कट्टर मजहबी मान्यताएं और बाकियों के हिस्से के संसाधन निगलने के विस्तारवादी तौर-तरीके यही तो कर रहे हैं? जैसे-जैसे प्रकृति की हरी चादर छीज रही है, धरती का ताप बढ़ रहा है। इस्लामी आतंक, बाजारवाद और विस्तारवाद की काली छाया आकार बढ़ा रही है, मानवता का संताप बढ़ रहा है!
’    काबुल में 31 मई को 90 लाशें गिरीं। दुनिया को रमजान मुबारक कहने का इस्लामी आतंकियों का यह वीभत्स तरीका है।
’    लगभग उसी वक्त अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते पर कुनमुनाया। सिर्फ अपनी चिंता करने का यह उसका बेफिक्री भरा तरीका है।
’    इस मौके पर जर्मनी जैसे ही अमेरिका से छिटका तो सहलाने के बहाने चीन ने उसे लपक लिया। मौकों को आहिस्ता से अपनी जकड़बंदी में लेना—यह ड्रैगन का खास तरीका है।
सवाल है—ये तरीके किसके हित में हैं? दहशत, अकड़ या पैंतरेबाजी एक क्षण को तो चौंका सकती है, किन्तु यह सिलसिला कब तक चल सकता है?
’    आर्थिक लाभ के ललचाऊ झुनझुने थमाते हुए क्षेत्रीय आकांक्षाओं और प्रभुसत्ताओं की अवहेलना करता चीन, पर्यावरण मुद्दे पर जी-7 में पड़ती दरार से बेपरवाह अमेरिका, बाकियों को निगलता-निशाना बनाता इस्लामी उन्माद…दुनिया कब तक यह दंश और हेकड़ी सहन करेगी? ज्यादा नहीं.. क्योंकि आर्थिक आतंकवाद, मजहबी नफरत और संसाधनों की बेतहाशा लूट दुनिया को जिस राह पर धकेल रही है, उसमें सब विनाश की छाया देख रहे हैं।
ऐसे में रास्ता क्या है? रास्ता है।
हंटिग्टन ने यदि ‘संघर्ष’ देखा था तो प्रख्यात इतिहासकार आर्नोल्ड टॉयनबी ने मानवता के लिए भविष्य की राह देखी थी।
टॉयनबी का कथन है कि बीसवीं सदी के अंत तक विश्व पर पश्चिमी प्रभुत्व रहेगा किन्तु 21वीं सदी में भारत उन देशों को जीत लेगा जिन्होंने कभी उसे पराजित किया था। और भारत की यह जीत अध्यात्म के बल पर होगी, हथियारों के बल पर नहीं।
टॉयनबी का स्पष्ट विचार था कि मानवता को यदि आत्मविनाश से बचना है तो उसे पश्चिमी तौर-तरीके से प्रारंभ हुए अध्याय का समापन भारतीय रीति से करना ही होगा।
बात सच होती दिख रही है। दुनिया भारतीय राजनय में संस्कृति की सुगंध अनुभव कर रही है। आतंकवाद का मुद्दा हो या जलवायु परिवर्तन से जुड़े संवेदनशील प्रश्न हों, भारत के रुख में ‘सही होने’ का वजन दुनिया महसूस कर रही है।
पूर्व की ओर देखने, सक्रिय होने के साथ भारत युद्ध की बजाय बुद्ध का आह्वान कर रहा है। यूरोप में भारत की पहल को अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। भारत अपनी धरती पर संसाधनों के पूर्णत: उचित प्रयोग के लिए नवोन्मेष और सहज न्यायपूर्ण वितरण की कड़ियां जोड़ रहा है। ऐसे में जापान, अमेरिका, यूरोप, रूस.. दुनिया के पाले चाहे कोई हों, दांव लगाता कोई दिखे, लेकिन विश्व मान रहा है कि बात और रीत भारत की ही सही है।
प्रतिस्पर्धा के चलते बाकियों से बेखबर, संघर्षों में हांफते हुए जड़बुद्धि हुई दुनिया को आगे की राह देखनी है तो संघर्ष भले सभ्यताओं का हो, चाहे किसी वाद की मृत्यु हो, जीवित तो भारत के ही विचार-दर्शन को रहना है। एकात्मवाद को
रहना है।
जलवायु हो या मानवता—ताप-संताप
के इस चढ़ते पारे को थामने के लिए हिमालय
ही चाहिए।

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