विश्व को भारतीयता का उपहार है बाहुबली
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विश्व को भारतीयता का उपहार है बाहुबली

Written byArchiveArchive
May 8, 2017, 12:00 am IST
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दिंनाक: 08 May 2017 12:59:06

एक गायक के तौर पर बाहुबली की टीम का हिस्सा रहे कैलाश खेर ने यह लेख मुंबई से विशेष रूप से ‘पाञ्चजन्य’ के लिए भेजा है। इसे हम लगभग मूल रूप में ही प्रकाशित कर रहे हैं

 कैलाश खेर

बाहुबली-2 की आज पूरे देश और दुनिया में धूम है। यह ऐसा शाहकार है, एक ऐसी क्रियात्मकता है, जिसे मैं सिनेमा से ऊपर मानता हूं। सिनेमा में कला के नाम पर सतही चीजें बहुत परोसी गई हैं। हमारी पीढ़ियों को बड़े-बड़े ख्वाब दिखाए जाते हैं कला के नाम पर। उन सबका यह एक जवाब मिला है जिसमें छोटे गांवों से लेकर तड़क-भड़कदार जीवनशैली में पल रहे धनाढ्य लोगों तक को सबके पूर्वज कहानियां सुनाते रहे हैं। परियों की कहानी, देवलोक की कहानी, हंसों के वाहन पर, रथ पर सवार राजकुमारी की कहानी। देवता लोग चंवर डुलाते हैं। तो ऐसी कहानियां, ऐसा आध्यात्मिक प्रभाव लिए हुए किंवदंतियां सुनते सब हैं अपने-अपने स्तर पर, लेकिन जब वे वास्तविक जीवन को देखते हैं तो उससे इनका कोई लेना-देना नहीं होता। पहली ऐसी फिल्म बनी है, जिसमें आध्यात्मिकता, पौराणिकता, भारतीयता सभी को ध्यान में रखा गया है। इसके अलावा रिश्तों, भावनाओं को ध्यान में रखा गया है। जो व्यक्ति जिस अवस्था में जहां है, उसको वहीं रहते हुए प्रेम के भावों का का एहसास होता है। इन सब बातों का ध्यान रखा गया है।
पहले भी हमारे देश में तमाम बड़ी-बड़ी फिल्में बनी हैं लेकिन उन सबमें संपूर्ण भारतीयता नहीं थी। यह पहली फिल्म है जिसमें इतने समर्पण से ऐसी कल्पनाएं की गई हैं जो लगता नहीं कि कल्पनाएं हैं। थोड़ा महाभारत भी दिखता है इसमें, थोड़ा रामायण का भी प्रतिबिंब झलकता है। थोड़ी सम्राट अशोक की झलक आती है तो थोड़ी गौतम बुद्ध की। चाणक्य की झलक आती है तो हमारे गुरुकुल और मोएंजोदरो की सभ्यता की इसमें दिखती है। शुरू में जो हमारी इंजीनियरिंग थी, उसकी भी झलक है। हमारी कूटनीति, रणनीति, युद्ध कौशल, राजनीति, समाज-नीति, रीति-रिवाजों को निभाने के ढंग, छल-नीति, चल-नीति… इन सारी नीतियों का बहुत ही अच्छे से अध्ययन करके कथानक में पिरोया गया है और बड़े सुंदर ढंग से सिनेमा के परदे पर उसका प्रस्तुतीकरण हुआ है। बाहुबली में थोड़ी झलक आती है सत्यार्थ प्रकाश के यमाचार्य और नचिकेता की। इसमें सीख बहुत है और जहां सीख है, वही असली भारत है। कारण यह कि भारत विद्वानों का देश रहा है, गुणवानों का देश रहा है। दुनिया में प्रगति कर चुके और सामर्थ्य वैभव में काफी आगे निकल चुके बहुत से देशों के लोग यहां आए। वे तब आए जब उन्होंने सब कुछ पा लिया और तब वे शांतिबोध के लिए, ज्ञानबोध के लिए भारत की ओर उन्मुख होते गए।
भारत हमेशा से पूरे विश्व को दिशा दिखाता रहा है। बेशक ढांचागत व्यवस्था, टेक्नोलॉजी, धन-धान्य—ये सब न हो, लेकिन भारत के पास जीवन शैली, रिश्तों को निबाहने का धर्म, बड़ों का सम्मान और आतिथ्य धर्म—यह सब युगों-युगों से अनन्य रहा है। इसी का आकर्षण रहा है भारत की संस्कृति, जीवनशैली, रहन-सहन देखकर जो भी लोग भारत में आए और बाद में भारत पर राज किया, उन्होंने यहां अपनी-अपनी छाप छोड़ी, यह सोचकर कि इनकी संस्कृति और प्रकृति को विकृत कर दो। इनका स्वभाव बदल दो। इस वजह से हमारे साहित्य और कला में जो संपूर्ण भारतीयता की नैसर्गिक सुगंध है, हमारी भाषा, शिल्प, बोलियां वे बहुत कम अपने मूल स्वरूप व स्वभाव में रह गई थीं। इस कारण साहित्य-कला-नाटकों में कहीं न कहीं उनका प्रतिबिंब आता था। तो जो भारतीय कह कहकर सिनेमा बने भी हैं, उनमें भी कहीं न कहीं अपूर्ण भारतीयता थी। पहली बार बाहुबली में हमारी परंपराएं, जीवन-धर्म, मान मर्यादा, बड़ों का सम्मान है। पहली बार इसमें शत्रु यानी विलेन को भी दिखाया तो आप उससे भी घृणा नहीं कर रहे। जब आप सिनेमा से बाहर आते हैं तो आप उस शत्रु से भी, जिसने चाल चलकर एक युद्ध रचा और जिससे विखंडित हो गया एक बना-बनाया साम्राज्य माहिष्मती, उस खलनायक से घृणा नहीं करते। उसका भी सम्मान करने का जी चाहता है। तकनीक, कथानक, निर्माण और संदेश—सभी स्तरों पर बाहुबली एक विश्वस्तर की फिल्म है जिससे बहुत लोगों को, खासकर सिनेमा बनाने वालों और कलाकारों को तो सीख मिलेगी ही, पर जो कला के विद्यार्थी हैं, कलाप्रेमी हैं उनकी ‘केस स्टडी’ के लिए एक बहुत बड़ी चीज निर्देशक एस.एस. राजमौलि ने निर्मित की है। इस फिल्म से जुडेÞ सभी लोग, खासकर हिंदी स्वरूप के गीत एवं संवाद लेखक मनोज मुंतशिर, संगीत निर्देशक, जिन्हें हम हिंदी क्षेत्र में एम.एम. करीम कहते हैं और जो दक्षिण में किरवानी नाम से जाने जाते हैं, फिल्म से जुड़े सभी कलाकार विशेष रूप से प्रभास, राणा दग्गुबाती, सत्यराज, अनुष्का शेट्टी, रम्या कृष्णन-ये सब बहुत मंझे हुए लोग हैं और अपनी-अपनी भूमिकाओं में इन्होंने अपना शत प्रतिशत योगदान किया है, उसे जिया है। बाहुबली का प्रभास का किरदार मेरा चहेता किरदार है।
बाहुबली-1 में तीन गानों में मेरी आवाज थी और बाकी तीन गाने अलग-अलग गायकों ने गाये थे। उन गीतों की भी बहुत चर्चा हुई थी। पहली बार किसी फिल्म में शिव तांडव स्तोत्र बजा था। उसका इतना प्रभाव हुआ कि पूरे विश्व में आज तक लोग उसे याद करते हैं। सोशल साइट्स पर लोग मुझसे अनुरोध करते हैं कि कृपया आप इसे पूरा गाइये। दरअसल शिव तांडव स्तोत्र के तेरह बंध हैं और फिल्म में केवल पांच ही गाये गए थे। तो पिछली बार जब मैं बाहुबली के संगीतकार एम.एम. करीम से मिला तो मैंने उन्हें बताया कि शिव तांडव स्तोत्र की इस प्रकार की फीडबैक आ रही है। वे प्रसन्नता से हंसने लगे और कहा कि हम फिल्म के अलावा भी इसे आपके साथ तैयार करेंगे। यह भी बहुत ही ऐतिहासिक बात है। पहली बार किसी फिल्म में एक गीत ऐसा आया जिसमें रोमांटिक गाने में संस्कृत के बंध इस्तेमाल किए गए हैं।
इस फिल्म में बहुत सारे ऐतिहासिक कार्य हुए हैं। पहली बार हमारी आस्थाओं, मान्यताओं, सोच का उपहास नहीं उड़ाया गया बल्कि गौरव और धरोहर के तौर पर प्रस्तुत किया गया है। पहली बार भारत की स्थिति को मजबूरी, लाचारी, गरीबी में ढालकर नहीं दिखाया गया। मैं इसको बहुत ही गौरवमय, गरिमामय पल कहूंगा। बाहुबली-2 फिल्म इतनी उच्चस्तरीय है कि अब हॉलीवुड वाले भी  हमारी फिल्मों की ओर थोड़ा उन्मुख होकर देखेंगे। वैसे भी विश्व से समस्त देश भारत की ओर उन्मुख  होकर इसलिए देखते हैं कि भारत के पास अकूत आध्यात्मिक शक्ति है। और असल में वही संपूर्ण मनुष्यता के काम आती है। वही जीवनशैली बनती है। योग, ध्यान, समाधि, यम, नियम, प्राणायाम—इस तरह की चीजें सिर्फ भारत के पास हैं। भारत की शक्ति दिव्य शक्ति है, अमूल्य शक्ति है। इन सभी चीजों को कला, मनोरंजन, कल्पनाशीलता के माध्यम से दर्शाना अपने में बड़ा प्रयोग है।
फिल्म बताती है कि कटप्पा केवल एक गुलाम सेनापति नहीं है जो पीढ़ियों से राजपरिवार की सेवा करता आ रहा है। उसकी भावनाएं हैं, भक्तिभाव है जिसने उसे माहिष्मती साम्राज्य से अटूट रखा है। फिल्म में यह भी देखिए कि सरकारी कर्मचारी आज के कर्मचारियों की तरह नहीं हैं कि केवल तनख्वाह ली और काम किया। वहां एक भावनात्मक रिश्ता भी है जो नौकरी से इतर है, जिसकी खातिर व्यक्ति बड़े से बड़ा बलिदान देने को सहज तैयार हो जाता है। और फिर जब अमरेंद्र बाहुबली दिव्यसेना को एक धनुष से तीन तीर छोड़ना सिखाता है तो संस्कृत का श्लोक बोलता है जिसमें बताया जाता है कि तीर पकड़ते समय हाथों की उंगलियों को कैसे रखना है, मध्यमा कहां होगी, कनिष्ठा का उपयोग कैसे करना है। तो यह सब हमारी विरासत में रहा है। हमारे धर्म, संस्कृति में एक एक चीज परिभाषित है जो जीवन में काम आती है चाहे युद्धकला हो, संबंध या राजनीति।
मैं बाहुबली के अद्भुत संगीत, भाषा, क्रियात्मकता, संवादों और शैली के लिए इस फिल्म के गुणवत्ता के भरे कलाकारों की टीम को, निर्देशन की टीम को, डीओपी की टीम को, वीएफएक्स की टीम को बधाई देता हूं। भारत के लोगों को भारतीय होने के लिए बधाई देता हूं। हमारा जो इतना गूढ़ रहस्यात्मक इतिहास है इस पर मैं गर्व करता हूं। नमन है इस धरती को जहां कण-कण में इतिहास रचने वाले लोग उत्पन्न हुए हैं, जहां हम संगीत और चित्रण से लोगों के हृदय को छू सकते हैं। ‘जय जयकारा’ गाने को लेकर लोगों ने वृहद स्तर पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं।
ज्यादातर का कहना है कि वे जबसे इस गीत को सुन रहे हैं उनकी आत्मा उसमें रम रही है। मैं कहता हूं कि भारतीय संगीत, धर्म-दर्शन, भारतीय  स्वांग शैली, नाटक शैली, अन्य नाट्य विधाएं बहुत समृद्ध हैं-यह बात बाहुबली और संपूर्ण विश्व में उसके अभूतपूर्व स्वागत से सिद्ध हुई है। मैं ‘पाञ्चजन्य’ के पाठकों को बहुत-बहुत नमस्कार करता हूं और भारतीय होने पर परमात्मा को धन्यवाद देता हूं।    ल्ल

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