समरसता के मंत्रदाता
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समरसता के मंत्रदाता

Written byArchiveArchive
May 1, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 01 May 2017 12:12:31

 

रपट 'समरसता के साधक' इस बात की पुष्टि करती है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक बालासाहब देवरस का जीवन ऐसा उज्ज्वल प्रकाश पुञ्ज है, जिससे देश को दिशा और ऊर्जा मिलती  रहती है। यह देश की पूर्वाग्रही व संकीर्ण राजनीति ही रही कि इस राष्ट्रभक्त व्यक्तित्व को भुला दिया गया। जबकि बालासाहब ने सामाजिक समरसता और हिन्दुत्व को विशाल स्वरूप देकर समाज को मजबूत बनाया।

—मनोहर मंजुल, प.निमाड़ (म.प्र.)

ङ्म श्री देवरस निष्पक्ष, निर्भीक व सच कहने वाले व्यक्ति थे। स्वयंसेवकों के प्रति उनका लगाव उनके व्यक्तित्व को और उच्च शिखर पर पहुंचा देता था। उन्होंने देश को जोड़ने का जो मंत्र दिया, आज समाज को उसे अपनाने की जरूरत है उनके द्वारा दिये गए विचार सूत्र समाज को प्रेम और स्नेह के बंधन में बांध सकते हैं।

—बी.एल.सचदेवा, आईएनए बाजार(नई दिल्ली)

 

जनता का संदेश

रपट 'साख पर मुहर' (26 मार्च, 2017) से स्पष्ट है कि चार राज्यों में हुए चुनावों के परिणामों से मतदाताओं ने यह संदेश दिया है कि देश का मिजाज बदल रहा है। अब मतदाता झूठी सहानुभूति, भय के वातावरण और तुष्टीकरण की राजनीति से ऊपर उठकर देश और समाजहित में योगदान देना चाहते हैं। जो दल झूठी राजनीति करके अब तक राज करते आए थे, उनकी दुकानें बंद होती नजर आ रही हैं। ये दल और इनके नेता सिर्फ एक ही वर्ग को अपना हितैषी मानते थे और उनके ही 'कल्याण' वाली योजनाओं पर काम करते थे।

—अश्वनी जांगड़ा, महम (हरियाणा)

 

ङ्म नोटबंदी के समय विपक्षी दलों ने देश में एक भयावह माहौल खड़ा करके जनता को डराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां तक कि इनके द्वारा इसके सफल होने में कई रोड़े भी अटकाए गए। ऐसे लोगों का यह मानना कि जनता कुछ जानती नहीं है, उनकी भूल ही है। जनता ने सब देखा है और सेकुलर दलों द्वारा की जाने वाली राजनीति को वह अच्छे से जानती है। जनता ने विधानसभा चुनाव में उसी का परिणाम दिया है। खैर, अब भी इन दलों को समझ आ जाए तो ठीक होगा।

—अनूप राठौर, मेल से

 

केरल हिंसा पर चुप्पी क्यों?

साक्षात्कार '… देश तोड़ने का षड्यंत्र' (26 मार्च, 2017) अच्छा लगा। एक साल पहले जेएनयू में जिस तरह षड्यंत्रपूर्ण तरीके से देश तोड़ने की बात की गई, उस जहर को फिर से देश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में फैलाने की साजिश रची जा रही है। जो लोग ऐसे जहर को फैलाते हैं, वे विचारों की आजादी की दुहाई देते नहीं थकते। लेकिन केरल में जब संघ के कार्यकताओं की हत्या होती है तो इन लोगों के मुंह सिल जाते है।

           — प्रो.बी.बी.तायल, विकासपुरी(नई दिल्ली)

 

जिहादी मानसिकता

रपट 'शिशु मंदिरों से शत्रुता?' (26 मार्च, 2017) से यही बात उभरकर सामने आती है कि पश्चिम बंगाल सरकार जानते-बूझते विद्या भारती द्वारा संचालित समस्त स्कूलों जो सभी सरकारी औपचारिकताओं को पूरा करते हैं, को बंद करने की बात कर रही है। लेकिन यही सरकार मदरसों, जहां जिहाद की फसल फलती-फूलती है, को संरक्षण देती है। आखिर ममता सरकार क्या विद्यालयों को भी सांप्रदायिकता का गढ़ बनाना चाहती है? दरअसल वह राज्य के स्कूलों में अपने हिसाब से पढ़ाना चाहती है। यह वही सरकार है जो छात्रों को 'ग' से 'गणेश' के स्थान पर 'ग' से 'गधा' पढ़ा रही है। इससे समझा जा सकता है कि ममता सरकार के दिमाग में क्या है।

—शमिता राय, भागलपुर(बिहार)

 

ङ्म देश को स्वतंत्रता मिले 70 साल हो गए लेकिन हिन्दू अभी भी पराए हैं। देश के अधिकतर दलों ने उनकी सदैव ही उपेक्षा की और अपमानित करने का कुचक्र रचा। वैसे हम हिन्दुओं की भी कुछ कमजोरियां हैं, क्योंकि यह जाति सदैव से गुलामी की मार खाती आई है। उसने इसका परिणाम भी भोगा है। बंगाल का धूलागढ़ इसका उदाहरण है। घर के घर जला दिए गए, महिलाओं पर अत्याचार हुआ, संपत्ति जलाई गई पर देश में कहीं भी कोई शोर सुनाई नहीं दिया। अगर यही मुस्लिमों के

साथ हुआ होता तो क्या ऐसा ही सन्नाटा पसरा होता?

—आनंद मोहन भटनागर, लखनऊ (उ.प्र.)

 

ङ्म ममता बनर्जी राज्य में तुष्टीकरण की जहरीली राजनीति कर रही हैं। मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं के घर जलाये जा रहे हैं लेकिन वे चुप्पी साधे बैठी हैं। तो वहीं आज जब पूरे देश में मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक और हलाला जैसे मुद्दों पर खुलकर सड़क पर उतर पुरुषों के विरुद्ध आक्रोश व्यक्त रही हैं, ऐसी स्थिति

में ममता बनर्जी की तरफ से इस विषय

पर कोई भी प्रतिक्रिया न देना, उनकी

नीयत और सोच पर प्रश्नचिन्ह खड़े

करता है।

                —सरिता राठौर, आंबेडकरनगर(दिल्ली)

छोड़ो बत्ती लाल

नेता या अफसर सभी, दिखते हैं बेहाल

आया है आदेश अब, छोड़ो बत्ती लाल।

छोड़ो बत्ती लाल, बीच जनता से आये

तो फिर हूटर-बत्ती से क्यों कार सजाए ?

कह 'प्रशांत' कुछ लोग दिख रहे हैं दुखियारे

लेकिन कुछ ने खुशी-खुशी ये यंत्र उतारे॥

— 'प्रशांत'

 

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